अर्जुन ने किस कारण से आत्महत्या की कोशिश की थी? जब अर्जुन की भावुकताने उसे संकट में डाल दिया 

अर्जुन ने किस कारण से आत्महत्या की कोशिश की थी? जब अर्जुन की भावुकताने उसे संकट में डाल दिया
DINESH MALVIYA 

मित्रो,

धर्म पुरण मे आपका स्वागत है।

आज हम द्वापर युग के महानतव धनुर्धर अर्जुन की भावुकता से जुड़े कुछ प्रसंग लेकर आपके सामने उपस्थित हुये हैं।

मित्रो, भारत के इतिहास मे द्वापर युग बहुत महत्वपूर्ण है। इसके अंत के बाद ही वर्तमान कलियुग का आगमन हुआ। इसका सबसे  बड़ा महत्व यह है कि इसमेभगवान ने सौलह कलाओं के साथ कृष्ण के रूप मे अवतार लिया।

द्वापर युग मे एक से एक बढ़कर वीर योद्धा हुये,जिन्हें युद्ध मे हराना लगभग असंभव जैसा था। इनमे मगध नरेश जरासंध, चेदिराज शिशुपाल, मथुरा नरेश कंस, सिन्धु नरेश जयद्रथ आदि जैसे महावीर शामिल थे। लेकिन इन वीरों की सबसे बड़ी कमी यह थी कि ये क्रूर, अत्याचारी,अनाचारी और हृदयहीन थे।

इनके विपरीत एक ऐसा योद्धा हुआ जो वीरता और बल मे इन सबसे कहीं अधिक श्रेष्ठ था,लेकिन उसके सीने मे एक बहुत भावुक दिल धड़कता था। यह महावीर कोई और नहीं, कुन्ती का तीहरा पुत्र अर्जुन था। वह भगवान श्रीकृष्ण का परम सखा और उनका कृपापात्र था।

हालांकि भावुकता एक श्रेष्ठ मानवीय गुण है, लेकिन इसमे बह जाने से जीवन संकट मे पड़ जाता है। इस पर उपयुक्त नियंत्रण रखना बहुत ज़रूरी है।

इस एपीसोड मे हम उन प्रसंगों की चर्चा करेंगे जिनमे अतिभावुकता के कारण स्वयं अर्जुन के प्राण तो संकट मे पड़े ही, लेकिन महायुद्ध मे पाण्डव पराजय की कगार पर पहुँच गये।

अपने भावुक और प्रेमपूर्ण स्वभाव के कारण ही बचपन से ही अर्जुन भीष्म पितामह, गुरु द्रोण और आगे चलकर श्रीकृष्ण का प्रिय रह था,लेकिन अनेक अवसरों पर इसी भावुकता ने उसे कमज़ोर बना दिया।

महाभारत युद्ध शुरू होने को था। दोनो पक्षों की सेनाएँ आमने सामने खड़ी थीं। युद्ध किसी भी क्षण शुरू हो सकता था। ठीक इसी मौके पर अर्जुन का मन शत्रुसेना मे अपने भाई बंधुओं, पितामह भीष्म,गुरुजनों आदि को देखकर भावुक हो उठा। अपनी भावुकता मे बहकर उसने युद्ध करने से ही इनकार कर दिया। अपना धनुष और अन्य शस्त्र उतारकर रख दिये।

ज़रा सोचिये कि पाण्डव सेना का सबसे बड़ा आधार अर्जुन ही थख। कौरवों की सेना उनकी सेना से बहुत बड़ी थी। साथ ही उस समय के लगभग सभी महानतम योद्धा कौरवों की ओर से लड़ रहे थे। अर्जुन के पराक्रम  का ही पाण्डवों को सबसे बड़ा भरोसा था।

ऐसे नाज़ुक क्षण मे अर्जुन के भावुक हो जाने का मतलब था, पाण्डवों और सत्य
 की पराजय। 

वो तो भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश देकर उसे अपने कर्तव्य से नहीं भटकने दिया, वरना इतिहास ही अलग होता।

इसके बाद युद्ध के दौरान उसने पितामह और द्रोणाचार्य से वैसा युद्ध नहीं किया जिसके लिए वह जाना जाता था। उसे पता था कि इन दोनो का वध किये बिना युद्ध जीतना असंभव है,फिर भी वह भावुक बना रहा।

अर्जुन ने  बहुत मजबूरी मे श्रीकृष्ण के सुझाव को मानकर शिखंडी को सामने किया। इस कारण पितामह ने शस्त्र त्याग दिये। अर्जुन ने निहत्थे पितामह को मार तो दिया, लेकिन ख़ूब रोया और पछताया।

इसी तरह अपने सेनापति और साले धृष्टद्युम्न द्वारा निहत्थे द्रोणाचार्य का वध किये जाने पर वह क्रोध से भर उठा। उसने धृष्टद्युम्न को मारने के लिये शस्त्र तक उठा लिया। श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर ने उसे बहुत मुश्किल से शांत किया।

इसके बाद चक्रव्यूह मे अपने पुत्र अभिमन्यु के अनीतिपूर्ण वध के लिये सिन्धु नरेश जयद्रथ को सबसे बड़ा दोषी मानकर वह उसके वध का संकल्प लेता है। लेकिन यहाँ भी वह भावुकता मे बड़ी ग़लती कर बैठता है। वह शपथ लेता है कि यदि सूर्यास्त से पहले वह जयद्रथ का वध नहीं कर पाया, तो अग्नि मे प्रवेश कर प्राण दे देगा। अगर भगवान श्रीकृष्ण ने युक्तिपूर्वक सूर्यास्त का भ्रम पैदा न किया होता तो वह सूर्यास्त से पहले जयद्रथ का वध नहीं कर पाता। उसे अग्नि प्रवेश करना पड़ता। उस समय तक युद्ध काफी हद तक पाण्डवों के पक्ष मे आ चुका था। अर्जुन के अग्नि प्रवेश से वे लगभग जीता हुआ युद्ध हार जाते।

इसी तरह की भावुकता में अर्जुन ने एक बार और अपने प्राण संकट में डाल दिये थे।

वह द्वारकापुरी गया हुआ था। वहाँ एक ब्राह्मण ने श्रीकृष्ण को बताया कि जब जब मेरे यहां पुत्र जन्म लेते हैं, तब तब काल उनका हरण कर लेता है।  अब उसके यहाँ चौथा पुत्र होने वाला है। उसने इसकी रक्षा का अनुरोध किया। श्रीकृष्ण यज्ञ की दीक्षा ले चुके था। अर्जुन ने कहा कि यह दायित्व उसे सौंप दिया जाये।

अर्जुन उस बालक की रक्षा नहीं कर पाया। इस पर ब्राह्मण ने उसका तिरस्कार किया।

इस कार्य में असफल हो जाने पर अर्जुन बहुत लज्जित हुआ। उसने भावुकता में अग्नि में प्रवेश कर प्राण त्यागने का निश्चय किया।

उसे श्रीकृष्ण ने ऐसा करने से रोका और ब्राह्मण के बच्चों को वापस लाये। भगवान यदि अर्जुन को नहीं रोकते तो वह अग्नि में प्रवेश कर जाता।

इस प्रकार अर्जुन ने भावुकता पर नियंत्रण न कर पाने से अनेक बार स्वयं और दूसरों के सामने जीवन का संकट उपस्थित कर दिया। ईश्वर यदि सहायता नहीं करते तो उसके जीवन की रक्षा संभव नहीं थी।

गस प्रसंग से यही शिक्षा मिलती है कि भावुकता अच्छी चीज़ है लेकिन उस पर नियंत्रण ज़रूरी है।

देखते रहिये धर्म पुराण। अगले एपीसोड मे हम किसी नये प्रसंग को लेकर उपस्थित होंगे।

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