क्या आज्ञाचक्र के जागरण ने बनाया श्रीनिवास रामानुजन को महान गणितज्ञ

भारत के सार्वकालिक पाँच महानतम गणितज्ञों में शामिल श्रीनिवास रामानुजन ने अपनी प्रतिभा का लोहा पूरी दुनिया में मनवाया| उनके जैसी प्रतिभा युगों में पैदा होती है| कुल 33 वर्ष की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कहने से पहले उन्होंने अपनी गणितीय प्रतिभा से पूरे विश्व को चमत्कृत कर दिया| योग और आध्यात्मिक दर्शन के जानकार मानते हैं कि ऐसा चमत्कार केवल तभी होता है जब मनुष्य का आज्ञाचक्र सक्रिय हो|

मैथेमैटिकल जीनियस रामानुजन होते थे बार बार फेल

रामानुजन के बारे में जो जानकारी मिली है, उससे पता चलता है कि गणित के प्रश्न हल करते समय उनकी दोनों आँखें ऊपर चढ़ जाती थीं और उनकी मुद्रा विशेष तरह की हो जाती थी| इससे स्पष्ट है कि उनका आज्ञाचक्र सक्रिय था| गणित के जिन प्रश्नों को हल करने में बड़े से बड़े गणितज्ञों को आठ-आठ घंटे लग जाते थे, उन्हें वे पलक झपकते ही हल कर देते थे| कई बार तो ऐसा भी होता था कि प्रश्न पूरा सुने बिना ही वह उसे हल कर देते थे| उनके समय के महान गणितज्ञ इंग्लेण्ड के प्रोफेसर हार्डी उनकी प्रतिभा के इतने कायल हुए कि उन्होंने उन्हें इंग्लेण्ड बुला लिया| रामानुजन के प्रमेय इतने अद्भुत हैं कि जिन्हें उनकी मृत्यु के कई वर्ष बाद समझा जा सका और हर के प्रमेय सही साबित हुआ|

रामानुजन का योगदान- रामानुजन और उनके द्वारा अधिकांश कार्य अभी भी वैज्ञानिकों के लिए अबूझ पहेली हैं। उनका वह पुराना रजिस्टर जिस पर वे अपने प्रमेय और सूत्रों को लिखा करते थे 1976 में अचानक ट्रिनीटी कॉलेज के पुस्तकालय में मिला। करीब एक सौ पन्नों का यह रजिस्टर आज भी वैज्ञानिकों के लिए एक पहेली बना हुआ है। इस रजिस्टर को बाद में रामानुजन की नोट बुक के नाम से जाना गया। मुंबई के टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान द्वारा इसका प्रकाशन भी किया गया है। रामानुजन के कार्य करने की एक विशेषता थी। रामानुजन का आध्यात्म के प्रति विश्वास इतना गहरा था कि वे अपने गणित के क्षेत्र में किये गए किसी भी कार्य को आध्यात्म का ही एक अंग मानते थे। वे धर्म और आध्यात्म में केवल विश्वास ही नहीं रखते थे बल्कि उसे तार्किक रूप से प्रस्तुत भी करते थे। वे कहते थे कि “ उस गणित का मेरे लिए कोई महत्त्व नहीं है जिससे मुझे आध्यात्मिक प्राप्ति नहीं होती हो”| उनके इस वक्तव्य से स्पष्ट होता है कि उनका आज्ञाचक्र सक्रिय था, जिसके बिना कोई व्यक्ति इतना विलक्षण हो ही नहीं सकता|

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जीवन परिचय- श्रीनिवास रामानुजन का जन्म 22 दिसम्बर 1887 को तमिलनाडु के इरोड में हुआ और 26 अप्रैल 1920 को वह परलोक सिधार गये| रामानुजन को गणित में कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं मिला, लेकिन उन्होंने अपनी प्रतिभा और लगन से गणित के क्षेत्र में अद्भुत अविष्कार किए और भारत का गौरव बढ़ाया|

रामानुजन बचपन से ही विलक्षण थे। उन्होंने खुद से गणित सीखा और जीवन में गणित के 3,884 प्रमेयों का संकलन किया। उन्होंने गणित और बीजगणित प्रकलन की प्रतिभा के बल पर बहुत से मौलिक और अपारम्परिक परिणाम निकाले, जिनसे प्रेरित शोध आज तक हो रहा है|हालाकि हाल में इनके सूत्रों को क्रिस्टल-विज्ञान में प्रयुक्त किया गया है। उनके कार्य से प्रभावित गणित में हो रहे काम के लिये रामानुजन जर्नल की स्थापना की गई है।

बचपन- रामानुजन का बचपन मुख्य रूप से प्राचीन मंदिरों के लिए विख्यात कुंभकोणम में बीता| बचपन में रामानुजन का बौद्धिक विकास सामान्य बालकों से अलग था यह तीन वर्ष तक बोलना भी नहीं सीख पाए|इससे सबको चिंता हुई कि कहीं यह गूंगे तो नहीं हैं। जब उन्होंने स्कूल एडमीशन लिया तो भी पारंपरिक शिक्षा में इनका मन नहीं लगा। रामानुजन ने दस वर्ष की उम्र में प्राइमरी परीक्षा में जिले में सबसे ज्यादा अंक प्राप्त किये| वह आगे की शिक्षा के लिए टाउन हाईस्कूल गये। रामानुजन को सवाल पूछना बहुत पसंद था। उनके प्रसवाल टीचर्स को बहुत अटपटे लगते थे। मसलन -संसार में पहला पुरुष कौन था? धरती और बादलों के बीच की दूरी कितनी है? उन्होंने स्कूल में ही कालेज के स्तर के गणित को पढ़ लिया। हाईस्कूल की परीक्षा पास करने के बाद उन्हें गणित और अंग्रेजी मे अच्छे अंक लाने के कारण सुब्रमण्यम छात्रवृत्ति मिली और कालेज की शिक्षा के लिए प्रवेश भी मिला।

रामानुजन का गणित के प्रति प्रेम इतना बढ़ गया था कि वे दूसरे विषयों पर ध्यान ही नहीं देते थे। यहां लिहाजा ग्यारहवीं कक्षा की परीक्षा में वह गणित को छोड़ कर बाकी सभी विषयों में फेल हो गए| उनको छात्रवृत्ति मिलनी बंद हो गई। गरीब घर के रामानुजन के लिए यह बड़ा मुश्किल वक्त था| उन्होने गणित कि कुछ ट्यूशन दीं और अकाउन्ट्स का काम भी किया। कुछ समय बाद उन्होंने फिर से बारहवीं कक्षा की प्राइवेट परीक्षा दी और फ़ैल हो गए। इस तरह उनकी पारंपरिक शिक्षा समाप्त हो गयी|

संघर्ष- स्कूल छोड़ने के बाद पाँच साल का समय इनके लिए बहुत हताशा भरा था। रामानुजन के पास न नौकरी थी और न किसी संस्थान या प्रोफेसर के साथ काम करने का मौका। लेकिन ईश्वर पर उनका अटूट विश्वास और गणित के प्रति अगाध श्रद्धा ने उन्हें आगे बढ़ने के लिए सदैव प्रेरित किया। विपरीत परिस्थितियों में भी वह गणित के शोध करते रहे।

शादी और साधना- रामानुजुन का 1908 में उनका विवाह जानकी नामक कन्या से हुआ| वह नौकरी की तलाश में मद्रास आए। बारहवीं की परीक्षा उत्तीर्ण न होने की वजह से इन्हें नौकरी नहीं मिली| इसी समय किसी के कहने पर रामानुजन वहां के डिप्टी कलेक्टर श्री वी| रामास्वामी अय्यर से मिले। अय्यर गणित के बहुत बड़े विद्वान थे। यहां पर श्री अय्यर ने रामानुजन की प्रतिभा को पहचाना और जिलाधिकारी रामचंद्र राव से कह कर इनके लिए 25 रूपये मासिक छात्रवृत्ति दिलवा दी| वृत्ति पर उन्होंने मद्रास में एक साल रहकर “बरनौली संख्याओं के कुछ गुण” शीर्षक से अपना पहला शोधपत्र प्रकाशित किया। यह शोध पत्र जर्नल ऑफ इंडियन मैथेमेटिकल सोसाइटी में प्रकाशित हुआ था। इसके बाद उन्होंने मद्रास पोर्ट ट्रस्ट में क्लर्क की नौकरी की। उन्हें गणित कि साधना के लिए काफी समय मिलता था। रामानुजन रात भर जाग कर गणित के नए-नए सूत्र लिखते थे|

प्रोफेसर हार्डी से सम्पर्क– रामानुजन के पकुछ शुभचिंतकों ने रामानुजन के द्वा कार्यों को लंदन के प्रसिद्ध गणितज्ञों के पास भेजा। पर उन्हें कुछ विशेष सहायता नहीं मिली| लेकिन लोग रामानुजन को थोड़ा बहुत जानने लगे थे। इसी समय रामानुजन ने अपने संख्या सिद्धांत के कुछ सूत्र प्रोफेसर शेषू अय्यर को दिखाए तो उनका ध्यान विश्व भर में प्रसिद्द गणितज्ञ लन्दन के प्रोफेसर हार्डी की तरफ गया। हार्डी के शोधकार्य को पढ़ने के बाद रामानुजन ने बताया कि उन्होने प्रोफेसर हार्डी के अनुत्तरित प्रश्न का उत्तर खोज निकाला है। अब रामानुजन का प्रोफेसर हार्डी से पत्रव्यवहार शुरू हुआ। रामानुजन के जीवन में एक नया मोड़ आया| हार्डी ने गणित के इस अनमोल हीरे हो पहचान लिया| रामानुजन और प्रोफेसर हार्डी की मित्रता दोनो ही के लिए फायदेमंद साबित हुई। प्रोफेसर हार्डी ने उस समय के विभिन्न प्रतिभाशाली व्यक्तियों को 100 के पैमाने पर आंका था। अधिकांश गणितज्ञों को उन्होने 100 में 35 अंक दिए और कुछ विशिष्ट व्यक्तियों को 60 अंक दिए। लेकिन उन्होंने रामानुजन को 100 में पूरे 100 अंक दिए थे।

शुरू में रामानुजन ने जब अपने शोधकार्य को प्रोफेसर हार्डी के पास भेजा तो पहले उन्हें भी पूरा समझ में नहीं आया। जब उन्होंने अपने मित्र गणितज्ञों से सलाह ली तो वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि रामानुजन गणित के क्षेत्र में एक दुर्लभ प्रतिभा हैं| उनके कार्य को ठीक से समझने और उसमें आगे शोध के लिए उन्हें इंग्लैंड आना चाहिए। लिहाजा उन्होने रामानुजन को कैंब्रिज आने को कहा|

इंग्लॅण्ड यात्रा- पैसा नहीं होने के कारण रामानुजन ने प्रोफेसर हार्डी के कैंब्रिज आने के आमंत्रण को अस्वीकार कर दिया। प्रोफेसर हार्डी को इससे निराशा हुई लेकिन उन्होनें किसी भी तरह से रामानुजन को वहां बुलाने का निश्चय किया। इसी समय रामानुजन को मद्रास विश्वविद्यालय में शोध वृत्ति मिल गई| लंबे पत्रव्यवहार के बाद धीरे-धीरे प्रोफेसर हार्डी ने रामानुजन को कैंब्रिज आने के लिए राज़ी कर लिया। प्रोफेसर हार्डी के प्रयासों से रामानुजन को कैंब्रिज जाने के लिए आर्थिक सहायता भी मिल गई। रामानुजन ने इंग्लैण्ड जाने के पहले गणित के करीब 3000 से भी अधिक नये सूत्रों को अपनी नोटबुक में लिखा|

इंग्लैण्ड की इस यात्रा से उनके जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन आया। उन्होंने प्रोफेसर हार्डी के साथ मिल कर उच्चकोटि के शोधपत्र प्रकाशित किए। अपने एक विशेष शोध के कारण इन्हें कैंब्रिज विश्वविद्यालय द्वारा बी|ए| की उपाधि भी मिली। लेकिन वहां की जलवायु और रहन-सहन की शैली उनके अधिक अनुकूल नहीं थी और उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा। डॉक्टरों ने इसे क्षय रोग बताया। उस समय क्षय रोग की कोई दवा नहीं होती थी और रोगी को सेनेटोरियम मे रहना पड़ता था। रामानुजन को भी कुछ दिनों तक वहां रहना पड़ा। वहां इस समय भी यह गणित के सूत्रों में नई नई कल्पनाएं किया करते थे।

रॉयल सोसाइटी से जुड़ाव- रामानुजन को रॉयल सोसाइटी का फेलो नामित किया गया। गुलाम भारत के किसी अश्वेत व्यक्ति को रॉयल सोसाइटी की सदस्यता मिलना बहुत बड़ी बात थी। रॉयल सोसाइटी के पूरे इतिहास में इनसे कम आयु का कोई सदस्य आज तक नहीं हुआ है। रॉयल सोसाइटी की सदस्यता के बाद यह ट्रिनीटी कॉलेज की फेलोशिप पाने वाले पहले भारतीय भी बने। ऐसा लग रहा था कि सब कुछ बहुत अच्छा हो रहा है,लेकिन रामानुजन कि सेहत लगातार बिगड़ रही थी|उन्हें डॉक्टरों की सलाह पर भारत लौटना पड़ा। भारत आने पर इन्हें मद्रास विश्वविद्यालय में प्राध्यापक की नौकरी मिल गई। रामानुजन अध्यापन और शोध कार्य में फिर से रम गए।

भारत लौटने पर भी उनकी हालत गंभीर होती जा रही थी। बीमारी की दशा में भी इन्होने मॉक थीटा फंक्शन पर एक उच्च स्तरीय शोधपत्र लिखा। रामानुजन द्वारा प्रतिपादित इस फलन का उपयोग गणित ही नहीं बल्कि चिकित्साविज्ञान में कैंसर को समझने के लिए भी किया जाता है।

मृत्यु- तैंतीस साल की छोटी उम्र में ही में रामानुजन के विदा की घड़ी आ ही गई। 26 अप्रैल1920 के सुबह वह अचेत हो गए और दोपहर होते होते उन्होने प्राण त्याग दिए।


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