क्या कहती है भारतीय ज्ञान परम्परा? भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरु,आदि शंकर ने सीखा एक चाण्डाल से, स्वामी विवेकानंद ने सफाईकर्मी और वैश्या से भी सीखा

भारत की ज्ञान परम्परा में कहा गया है कि ज्ञान कहीं भी,किसी से भी मिले, उसे ग्रहण करना चाहिए. इस सम्बन्ध में भगवान दत्तात्रेय, आदि शंकराचार्य और स्वामी विवेकानंद के उदाहरण सामने आते हैं. भगवान दत्तात्रेय ने अपने जीवन में 24 गुरु बनाये थे.उनका कहना है कि जिससे जितना सीखने को मिले, ग्रहण करने का प्रयास करना चाहिए। उनके 24 गुरुओं में कबूतर, पृथ्वी, सूर्य, पिंगला, वायु, मृग, समुद्र, पतंगा, हाथी, आकाश, जल, मधुमक्खी, मछली, बालक, कुरर पक्षी, अग्नि, चंद्रमा, कुमारी कन्या, सर्प, तीर (बाण) बनाने वाला, मकडी़, भृंगी, अजगर और भौंरा (भ्रमर) हैं.
उनके गुरुओं में पिंगला नाम की वेश्याभी थी. उससे उन्होंने यह सबक लिया कि हमें केवल पैसों के लिए नहीं जीना चाहिए। जब वह वेश्या धन की कामना में सो नहीं पाती थी, तब एक दिन उसके मन में वैराग्य जागा और उसे समझ में आया कि असली सुख पैसों में नहीं बल्कि परमात्मा के ध्यान में है.तब कहीं उसे सुख की नींद आई।
आदि शंकराचार्य से जुड़ा एक प्रसंग है. वह भारत भ्रमण के दौरान काशी पहुंचे उन्होंने वहाँ शमशान के चंडाल को अपना गुरु बनाया था. उस वक्त के समाज में चांडाल अस्पृश्य माने जाते थे. कहते हैं कि आदि शंकराचार्य काशी में एक शमशान से गुजर रहे थे जहां उनका सामना चांडाल से हो गया. उन्होंने चाण्डाल से सामने से हटने को कहा. जवाब में चांडाल हाथजोड़ कर बोला क्या हटाऊं, शरीर या आत्मा, आकार या निराकार. शंकराचार्य सुनकर सन्न रह गये. कहते हैं कि स्वयं काशी विश्वनाथ उस चाण्डाल के रूप में आये थे.

 

अमेरिका की धर्म संसद में सनातन धर्म की सही और सटीक व्याख्या कर विश्व को इस धर्म का वास्तविक रूप बतलाने वाले स्वामी विवेकानंद के जीवन में भी इस प्रकार की दो घटनाएं हुयीं. योद्धा सन्यासी स्वामी. उन्होंने किन-किन कठिनाइयों को झेला और किस-किस से क्या-क्या सीखा इसे उन्होंने स्वयं अपने संस्मरणों में लिखा है.
स्वामीजी ने लिखा है कि एक बार वह आगरा से वृन्दावन पैदल जा रहे थे. वृन्दावन करीब दो मील दूर था कि मैंने देखा कि एक व्यक्ति सड़क के किनारे चिलम पी रहा था. मुझे भी चिलम पीने की इच्छा हुयी. मैंने उस व्यक्ति से कहा- “ भाई, क्या तुम मुझे चिलम का एक काश लगवा सकते हो?” उसके चेहरा पर बड़ा संकोच छा गया और उसने कहा-“ श्रीमान, मैं एक सफाईकर्मी हूँ.” मेरे ऊपर पुराने संस्कारों का प्रभाव था. मैंने तत्काल अपने कदम वापस खींच लिए और अपनी यात्रा पर चल पड़ा.
मैं कुछ ही दूर चला था कि मेरे मन मन विचार आया कि मैं तो एक सन्यासी हों, जिसने जाति, परिवार, मान-सम्मान और सब चीजों को त्याग दिया है. उस व्यक्ति ने जैसे ही बताया कि वह सफाईकर्मी है तो मैंने यह सोच कर उसकी चिलम पीने से इनकार कर दिया कि यह उसके द्वारा छू गयी थी.
मैं तत्काल करीब आधा मील चलकर वापस उसके पास गया. वह उसी जगह बैठा था. मैंने उससे कहा- “मेरे मित्र, कि जल्दी चिलम में तम्बाकू भरो. मैंने बड़ी ख़ुशी के साथ एक काश लगाया और वृन्दावन की ओर चल पड़ा. मेरे भीतर से आवाज़ आई कि जब कोई व्यक्ति सन्यासी हो जाता है तो वह धर्म, जाति आदि की सभी सीमाओं को लांघ जाता है. सन्यास धर्म का निर्वाह बहुत कठिन होता है.
स्वामी विवेकानंद ने अपने जीवन का एक बहुत प्यारा संस्मरण लिखा है. इसके अनुसार, उन्होंने नया-नया सन्यास लिया था. उनके घर का रास्ता वेश्याओं की गली से होकर जाता था. उनमें सन्यासी होने का गर्व था और वह उस गली से बचने के लिए कई मील का चक्कर लगाकर घर पहुँचते थे. उन्होंने लिखा है कि वह उन्हें बाद में समझ आया कि यह भी एक तरह से वेश्याओं के प्रति आकर्षण ही था, वरना सन्यासी के मन में यह भेद क्यों होना चाहिए?
एक और संस्मरण में उन्होंने लिखा है कि वह राजस्थान में खेतड़ी महाराज के मेहमान थे. महाराज ने उनकी विदाई के दिन अपनी परम्परा के अनुसार उनके लिए विदाई -समारोह का आयोजन किया. गाने के लिए बनारस से एक वैश्या को बुलाया गया. जब स्वामीजी को यह बात पता चली तो उन्होंने समारोह में जाने से इनकार कर दिया और अपने टेंट में ही बैठे रहे. वैश्या को यह बात पता चलने पर उसने बहुत ही कातर भाव से एक भजन गाया- प्रभु मोरे अवगुण चित न धरो…समदरसी है नाम तिहारो नाम की लाज धरो. उसमें आगे एक बंद आता है जिसका भाव यह था कि एक लोहे का टुकड़ा पूजाघर में होता है और एक लोहे का टुकड़ा कसाई के द्वार पर भी पड़ा होता है. दोने ही लोहे के टुकड़े होते हैं. लेकिन पारस तो दोनों को स्पर्श करके सोना बना देता है. वह दोनों में कोई भेद नहीं करता.
वैश्या ने यह भजन इतने भाव में डूबकर गाया कि स्वामी विवेकानंद भीतर तक कांप गये. वह टेंट से निकल कर दौड़ते हुए वहाँ पहुंचे जहाँ वैश्या भजन गा रही थी. स्वामीजी ने लिखा है कि जब उन्होंने उस वैश्या को देखा तो उनके मन में उसके प्रति न कोई आकर्षण था और न कोई विकर्षण. उस दिन मैंने जाना कि मेरे अन्दर सन्यास का जन्म हुआ. विकर्षण भी आकर्षण का ही रूप है. मुझे उस वैश्या में भी माँ ही दिखाई दी.
ये दोनों प्रसंग इस बात को प्रतिपादित करते हैं कि हमें किसीसे भी सीखने में गुरेज नहीं करना चाहिए. यही भारत की ज्ञान परम्परा है|

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