क्या शरीर का ध्यान रखना अविवेक है? आइए जानते हैं इसका सही अर्थ

क्या अपने शरीर की सेवा करना अविवेक है ? अनेक ग्रंथों में कहा गया है कि यह शरीर मल-मूत्र, अस्थि, मज्जा आदि से भरा है, लिहाजा: अपवित्र है। इसे सहज रूप से गंदा और हेय कहा गया है। दूसरी ओर शास्त्रों और संतों द्वारा मानव शरीर की महिमा का मुक्त-कंठ से गुणगान किया गया है। संत तुलसीदास ने ही रामचरित मानस में इसे साधन का धाम और मोक्ष का द्वार बताते हुये कहा है कि मानव शरीर बहुत दुर्लभ है, जिसे पाने को देवता भी तरसते हैं। उनके अनुसार दैवी सम्पदाओं से भरपूर यह शरीर पाकर भी जो व्यक्ति अपना परलोक नहीं सुधारता वह आत्महंता है।

ये दोनों बातें विरोधाभासी लगती हैं, लेकिन दोनों बातों को उनके संदर्भ में समझने पर वे दोनों ही सही हैं।

रामचरित मानस में लक्ष्मण द्वारा श्रीराम और सीता की सेवा की प्रशंसा करते हुए तुलसीदास ने कहा है कि-

सेवहिं लखन सीय रघुवीरहिं

जिमि अविवेकी पुरूष सरीरहिं।।

अर्थात, लक्ष्मण जी (वनवास के दौरान) सीताजी और श्रीराम की इस तरह सेवा करते हैं, जिस तरह अविवेकी पुरूष शरीर की सेवा करता है।

जब शरीर को सहज ही अपवित्र कहा गया है, तब उसका आशय शरीर से आसक्ति को हटाना और मानव को इसे सिर्फ भोगों के लिए उपयोग करने के प्रति हतोत्साहित करना है। लेकिन जब इस शरीर को दुर्लभ, साधन धाम और मोक्ष का द्वार कहा जाता है, तब उसका उद्देश्य मानव को इस शरीर का उपयोग ईश्वर प्राप्ति और चेतना की ऊँची अवस्था प्राप्त करने के लिए करने को प्रेरित करना है।

लक्ष्मण के लिए सीता और राम सर्वस्व हैं। इसी भावना से उन्होंने उनकी ऐसी सेवा की, जिसका उदाहरण कहीं और मिलना मुश्किल है। इसी तरह विवेकहीन व्यक्ति अपने शरीर को सबकुछ मान कर रात-दिन उसकी सेवा में जुटा रहता है।

अविवेकी आखिर कहते किसे हैं ? अविवेकी उसे कहते हैं जो शरीर में आत्मभाव रखता है। यानि, जिसमें नित्य और अनित्य तथा भंगुर और शाश्वत की तमीज नहीं है। उसके लिए यह शरीर सिर्फ भोग का साधन है। शास्त्र और संतों का मत इसके लिए एकदम विपरीत है। उनके अनुसार मनुष्य जन्म के अलावा जितनी भी योनियां हैं, सभी केवल कर्मों का फल भोगने के लिए मिलती हैं। उनमें परमात्मा को प्राप्त करने के लिए जीव कोई साधन नहीं कर सकता। मानव इन सब योनियों में इसलिए श्रेष्ठ है, क्योंकि उसके पास विवेक है। यदि विवेक ही नहीं तो मानव अन्य योनियों से किस प्रकार अलग हैं? सदग्रंथ और संत कहते हैं कि मानव शरीर ऐसा दुर्लभ, रहस्यमय और दैवीय सम्पदाओं से भरा भंडार है, जिसका उपयोग कर मानव इसी जीवन को दिव्य बना सकता है।

लिहाजा, उन्होंने शरीर को स्वस्थ, स्वच्छ, पवित्र और सुन्दर रखने को मानव का परम कर्तव्य माना है। इसीके लिए उन्होंने योग जैसे विज्ञान का विकास किया। किन्तु, अविवेकी पुरूष की तरह शरीर को ही सब कुछ मान कर वे उसकी गुलामी को निन्दनीय मानते हैं। ऐसा करने वाले व्यक्ति को “तनपोषक” कहा जाता है, जिसे एक प्रकार की गाली माना जा सकता है।

भाव यह है कि अपने शरीर में आत्मभाव रखना उचित नहीं है। इससे कर्तापन और अभिमान का विकास होता है। इसी कारण हम अपनी दिव्यता और भीतर छुपे आत्म तत्व का दर्शन नहीं कर पाते। इस तत्व को देखने पर यही शरीर हमें देवालय प्रतीत होने लगता है। तुलसी दास ने ही लिखा है कि “ईश्वर अंस जीव अविनासी, चेतन अमल सहज सुखरासी”। अर्थात जीव ईश्वर का अंश, अविनाशी, चेतन, मल रहित और सहज ही सुखों का भंडार है। लेकिन कर्तापन के अभिमान के चलते इस चेतन एवं शुद्ध आत्मा पर संस्कारों का आवरण चढ़ गया है, जिससे वह दिखाई नहीं देता। हम जो कुछ देखते हैं, बोलते हैं, सुनते हैं, करते हैं उसके संस्कार निरंतर हमारे चित्त पर जमा होते जा रहे हैं। हम हर पल संस्कार पर संस्कार इकट्ठे कर रहे हैं। इसका कारण हमारी आसक्ति है। आसक्ति रहित कर्म से संस्कार नहीं बनते।

हम कोल्हू के बैल की तरह काम में लगे हैं, परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं, धन-सम्पत्ति अर्जित कर रहे हैं और अपने तथा परिवार को सुखी बनाने के लिए क्या नहीं कर रहे. इसमें कुछ भी अनुचित या गलत नहीं है। यह करना हमारा कर्तव्य है। लेकिन यह हम आसक्ति और कर्तापन के अभिमान के साथ कर रहे हैं, कर्मयोग की तरह नहीं। इसी कारण हमारा संस्काराशय निरंतर बढ़ता जा रहा है और हम अपने स्वरूप को पूरी तरह भूले हैं। ऐसी स्थिति में सुख तो किसी को मिल ही नहीं सकता। जिसे आमतौर पर सुख समझा जा रहा है, वह भी आगे दु:ख का ही कारण बनेगा ही.

इस तरह आसक्ति के साथ हम मैं-मैं करते, रोते, झीकते, दु:ख और क्लेश भोगते संसार से विदा हो जाते हैं। न शास्त्र की सुनते न संत की बात पर कान देते। हम इसी तरह अपने लिए निरंतर दु:खों का निर्माण करते चले जाते हैं। परिणाम यह होता है कि मोक्ष का द्वार और साधनों का धाम यह शरीर हमारे लिए व्याधियों, क्लेशों और कष्टों का घर बन जाता है। हम इस पवित्र शरीर में जाने क्या-क्या खाने और न खाने योग्य ठूंसते चले जा रहे हैं, जिससे यह निरंतर बीमारियों का घर बन रहा है। अगर हम अपने शरीर के देवालय होने कि अनुभूति कर लें, तो यह शरीर देवालय महसूस होने लगेगा और हम इसमें कुछ भी डालने से पहले उसकी उपयुक्तता का ध्यान रखेंगे। यह अनुभूति इतनी आसान नहीं है। लेकिन जब तक हमें स्वयं अनुभूति नहीं हो जाती, तब तक शास्त्र और अनुभूति-सम्पन्न संतों के वचन ही हमारे लिए प्रमाण हैं।

श्वेताश्वतरोपनिषद में कहा गया है कि

“”अंगुष्ठमात्र: पुरूषोदन्तरात्मा। सदाजनानां ह्मदये सन्निविष्ट:

अर्थात, अंगुष्ठमात्र परिमाण वाले अन्तर्यामी परम पुरूष परमेश्वर सदा ही मनुष्यों के ह्रदय में सम्यक प्रकार से स्थित है। इस बात पर श्रद्धा रखते हुए हम यह मान सकते हैं कि हममें ईश्वर का निवास है और यह शरीर उसका मंदिर है। इस अर्थ में मंदिर को साफ-सुथरा, पवित्र रखना हमारा परम कर्तव्य है। हमें अपने भीतर उस सत्ता की खोज करनी चाहिए जिससे हमारा, शरीर, मन, बुद्धि सभी क्रियाशील हों, जो इन सभी का प्रेरक है और जिसकि ओर और शास्त्र इंगित कर रहा है।

हम जब उस परम सत्ता को अपने भीतर अनुभव करने लगेंगे, तो वह हमें सभी में दिखायी देने लगेगी। यही जीवन की सबसे ऊँची अवस्था और उच्चतम जीवन-दर्शन है। इसे प्राप्त करने में शरीर हमारा साधन है। इसलिए इसकी साल-सम्हाल तो करना है, लेकिन अविवेकी पुरूष की तरह इसकी गुलामी नहीं।

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