क्या हैं कालों के काल महाकाल? काल के कपाल में छिपे जीवन के अद्भुद सूत्र!

महाकाल का मानवजाति को क्या है सन्देश ?

जाने जन्म, मृत्यु, जरा ब्याधि के गुप्त रहस्य !

कर्ता करे न कर सकै,शिव करै सो होय। तीन लोक नौ खंड में,महाकाल से बड़ा न कोय.

अकाल मृत्यु वो मरे जो कर्म करे चांडाल का,

काल उसका क्या करे जो भक्त हो महाकाल का

आँधी तूफान से वो डरते है, जिनके मन में प्राण बसते है ।

वो मौत देखकर भी हँसते है, जिनके मन में महाकाल बसते है ।

काल का भी उस पर क्या आघात हो …. जिस बंदे पर महाकाल का हाथ हो..!!

महाकाल के बारे में ये बातें यूँ ही नहीं कही जाती कालों के काल महाकाल सिर्फ एक मूर्ति नहीं हैं मूर्ति तो एक एक प्रतीक प्रतिमान है लकिन इसके पीछे छिपे हैं समय,काल,अकाल जन्म और मृत्यु जैसे जीवन व श्रृष्टि के अनंत रहस्य आज हम महाकाल से जुड़े ऐसे ही कुछ अनछुए पहलुओं पर बात करेंगे | सबसे पहले सुनते हैं मानव जाति से क्या कह रहे हैं महाकाल?

मैं महाकाल हूं खंडहर हो गए लोकों  को नष्ट कर नव सृजन करता हूँ |

देखो मैं पूरी शक्ति के साथ खड़ा हुआ हूं, इसलिए तू उठ खड़ा हो और महान यश का लाभ कर, सब कुछ पहले ही किया जा चुका है, तू  केवल निमित्त मात्र बन |

महाकाल का ये सन्देश साफ़ है, हर एक व्यक्ति को सिर्फ उनकी इस रचना में एक छोटी सी भूमिका निभानी है | उन पर विश्वास रखना है और अपने काम को अच्छे ढंग से करते हुए, हर अच्छे बुरे परिणाम को सहज स्वीकार करना है, उसकी भक्ति में लगे हुए व्यक्ति को बहुत ज्यादा चिंता नहीं करनी, बीएस अपना कर्म करते जाना है |

श्रीमहाकाल की सृष्टि की आदि से अंत तक सत्ता अनंत है , उज्जैन के श्रीमहाकालेश्वर काल के अधिष्ठाता के रूप हैं , काल-गणना के प्रवर्तक, वह विश्वात्मा जिसकी शक्ति हर जगह है, काल की शक्ति ही मानव की नियति का निर्माण करती है |

समय कभी रुकता नहीं , और समय महाकाल के अधीन है इसलिए उनका काम रुकता नहीं, जबसे महाकाल ने अपने हाथों में दुनिया की बागडोर थामी है, संसार की समस्त शक्तियां एकजुट होकर उनके संकल्प की पूर्ति के लिए दिन-रात जुटी हुई है|

महाकाल स्वयं को दो रूपों में प्रकट करते हैं अपने पहले रूप में वह रूद्र होते हैं और  दूसरे में शिव | रूद्र की विनाशलीला शिव के सृजन के लिए भूमि तैयार करती है|

श्री महाकालेश्वर सृष्टि की शुरुआत से लेकर अंत तक की काल-यात्रा के प्रतिबिंब हैं| ईश्वरीय प्रकाश का स्वरूप हैं| उनका उद्देश्य है मनुष्य की प्रकृति में फेर बदल कर नया इंसान गढ़ना और इस धरती पर  स्वर्गीय युग लाना|

दुनिया ने महाकाल के रूद्र रूप के अनेक नजारे उनके तांडव के रूप में देखे|

लगा जैसे महा प्रलय आने वाला है, लेकिन रुद्र के क्रियाकलापों से लग रहा है कि अब वक्त बदलने लगा है|

महाकाल की लीला अनोखी है,, अद्भुत है, अलौकिक है|

उनका उन्मुक्त ईश्वरीय प्रकाश और बिखरने वाला है|

यह महाकाल ही हैं जिनके अंदर सामर्थ्य है, रूद्र के तीव्र तांडव में छिपे हुए शिव सृजन की  |

जिस तरह मानव अपनी उत्पत्ति से लेकर आज तक अनेक सुखद व दुखद घटनाओं से गुजरा है, उसी तरह महाकाल का ये भौतिक स्वरुप  भी अनेक आधात-प्रतिघात के बाद आज नवसृजन के दौर से गुजर कर निखर चुका है|

पृथ्वी की उत्पत्ति से लेकर आज तक की महाकाल की यात्रा अविश्वसनीय रूप से परिवर्तनशील है|

महाकाल इस पूरे समाज को उस परिवर्तन की प्रक्रिया से गढ़ रहे हैं, जो भविष्य की सतयुगी  पीढ़ी का निर्माण करेगी|

हम सबके अंदर महाकाल ने आंतरिक और बाह्य ऐसी परिस्थितियां पैदा कर दी हैं जिनके दबाव में आकर कोयले रुपी मानव को हीरा बनना ही पड़े|महाकाल की अपरिवर्तनीय योजना का केंद्र है व्यक्ति, और परिधि है समाज|

यह महाकाल की ही शक्ति है जो धरती से लाखों गुना भारी भरकम नक्षत्रों को उनकी कक्षा में घुमाती है| ऐसी आसानी से जैसे कोई बालक गेंद घुमाता हो|

कालों के महाकाल के लिए असंभव क्या है? असंभव को भी संभव करने में वो सिद्धहस्त है|

उज्जैन में  विराजमान महाकाल, सिर्फ उज्जैन के नहीं है वह पूरी दुनिया के हैं जो लोग संसार को उपलब्ध करना चाहते हैं उनके लिए  महाकाल उमा महेश्वर के रूप में विराजित हैं|

योगी और तपस्वी के लिए महाकाल आदियोगी के रूप में विराजित है, वे योगी के रूप में अचलेश्वर हैं|

काल के तीन अर्थ होते हैं एक समय, दूसरा अंधकार और तीसरा मृत्यु,  इन पर विजय दिलाने में समर्थ कालों के काल महाशिव को महाकाल भी कहा जाता है| पूरी दुनिया निरंतर गति कर रही है, एक चक्र की तरह एक वर्तुल में सब कुछ गति में है, अपनी धुरी पर और किसी दूसरे केंद्र के चारों ओर हर एक परमाणु समय की उर्जा से निरंतर गति कर रहा है| सब कुछ चक्र की तरह घूम रहा है| और यह चक्र जिस अंतराल में घूमता है, उस अंतराल को समय कहते हैं, और यह सब कुछ जहां घटित हो रहा है, वह आकाश है| हम सब उस महाकाल के कारण ही अस्तित्व में है, यदि महाकाल ना होते तो हमारा जीवन ना होता, हम सबका आधार वह काल ही है|  महाकाल सृष्टि के चक्र के प्रवर्तक हैं|  महाकाल के सामने सृष्टि बहुत छोटी है, इतने बड़े ब्रह्मांड में हमारी धरती एक परमाणु की तरह  है| बाकी चारों तरफ खाली स्थान है, अंधकार है, स्पेस है|

महाकाल की गोद में ही यह सृष्टि घटित होती है| यह जगत बनता है और बिगड़ता है| महाकाल अपने परिवार के साथ संसार की गति को परिलक्षित करते हैं| लेकिन जब वैराग्य घटित होता है तो ज्योतिर्लिंग के रूप में विशुद्ध स्वरूप में, वैराग्य के पथ प्रदर्शक बन जाते हैं| जीवन चक्र के अंदर भी महाकाल है जो शिव के रूप में हैं|  और जीवन चक्र के बाहर भी महाकाल है जो ज्योतिर्लिंग के रूप में है|

कालचक्र की शुरुआत महाकाल से होती है। प्रलय काल में सारा संसार अंधेरे में डूबा था और महाकाल ने ब्रह्माजी को सृष्टि का निर्माण करने को कहा।

ध्यान देने योग्य बात है कि द्वाद्वश ज्योतिर्लिंगों में सिर्फ महाकालेश्वर ही दक्षिणमुखी हैं। दक्षिण दिशा यमराज का स्थल है और यम पर महाकाल की दृष्टि उन्हें नियंत्रित करने के लिए है। काल का अर्थ समय है और महाकाल का समय पर नियन्त्रण है। काल या समय के समक्ष मनुष्य और देवता दोनों ही नतमस्तक हैं। जब काल की गति वक्र होती है, उस समय राजा हरिश्चन्द्र को भी चाण्डाल की चाकरी करनी पड़ती है। इसलिए समय अतिबलवान है। पर, इस काल पर अगर किसी का शासन स्थापित है, तो वह हैं महाकाल के रूप में शिव। इसलिए शिव की स्तुति में, शिव का अभिषेक कर भक्त अपने जीवन को आरोग्य, रस, रूप, गंध से सिंचित करने की कामना करते हैं और पूर्ण आयु को प्राप्त कर उन्हीं में विलीन होने की इच्छा प्रकट करते हैं। महाकाल की अर्चना जीवन के श्रेष्ठतम समय के आरम्भ का सूत्रपात है। जीवन अनगिनत क्षणों का संयोग है और प्रत्येक क्षण को पूर्णता के साथ जीना ही जीवन का आनन्द है। अक्सर हम आगामी समय की दुविधा को लेकर चिन्तित रहते हैं, पर उत्तर तो हमेशा समय के गर्भ में है। महाकाल रूप में शिव एक परिपूर्ण स्वस्थ जीवन का आशीष देते हैं और अंतकाल में शिव में विलीन होकर जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होने का आश्वासन। इसी में जीवन की श्रेष्ठता है, क्योंकि भौतिक प्रगति व आध्यात्मिक उन्नति के बीच समन्वय स्थापित हो जाता है।

धर्मग्रंथ कहते हैं-कालचक्र प्रवर्तको महाकाल: प्रतापन:। अर्थात कालचक्र के प्रवर्तक

महाकाल अत्यंत प्रतापी हैं।

-अतुल विनोद पाठक

ATUL VINOD



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