विशेष लेख : आस्था और अंधविश्वास…… बहस जारी है , किस पर करें विश्वास ?

कुछ ऐसे विषय हैं जिन पर तब से बहस चल रही है जबसे दुनिया बनीं, और शायद रहती दुनिया तक चलती रहेगी. इनमें एक विषय आस्था बनाम अंधविश्वास है। दुनिया के किसी भी कोने में न आस्थावानों की कमी है और न उन्हें अंधविश्वासी कहने वालों की। दोनों के बीच बहस-मुबाहिसे कभी किसी घटना विशेष के संदर्भ में बहुत तीखे हो जाते हैं, तो कभी इसके अभाव में सुप्त पड़े रहते हैं, लेकिन खत्म कभी नहीं होते।

ऐसा पूरी दुनिया में होता है। अल्पज्ञानी भले ही कहते हों कि जिसे अंधविश्वास कहा जाता है वह भारत में सबसे ज्यादा है और आस्था का सैलाब भी सर्वाधिक यहीं है; लेकिन यह सच नहीं है। इंसान और उसकी फितरत सब जगह एक जैसी है। हाँ, यह ज़रूर है कि देश, काल, परिस्थिति, शिक्षा, संस्कृति आदि के कारण उनके बाहरी स्वरूप में अंतर होता है, लेकिन उनके मूल में एक ही प्रवृत्ति काम करती है।

कुछ वर्ष पहले जर्मनी के कॉलेगन विश्वविद्यालय के शोधकर्ता अपने अध्ययन में इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि लकी चार्म (टोटका) बहुत कारगर होता है। लकी चार्म वे उस वस्तु को कहते हैं, जिसे आप अपने लिये शुभफलदायी या लकी मानते हैं। इन विद्वानों के अनुसार लकी चार्म अपने पास रखने से व्यक्ति का आत्मविश्वास बढ़ता है। आत्मविश्वास ही तो जीवन में सफलता की सबसे महत्वपूर्ण कुंजी है। कोई खिलाड़ी किसी खास कपड़े, जूते या अन्य किसी चीज को पहनकर मैदान में उतरता है, कोई विद्यार्थी किसी देवता विशेष के दर्शन कर अथवा किसी रंग विशेष का लॉकेट या अंगूठी धारण करता है, तो कोई किसी भी महत्वपूर्ण काम को करने से पहले किसी मंत्र का उच्चारण करता है या किसी को याद करता है।

कथित तर्कवादी ऐसी बातों की खिल्ली उड़ाते हैं। उनका इस तरह खिल्ली उड़ाना जीवन की गूढ़ता, मानव मन की गहराई तथा विषय की गहनता के प्रति उनकी कम समझ का ही परिणाम है। इनमें से अधिकतर तो सिर्फ अपने को बुद्धिमान कहलाने भर के लिये ऐसा करते हैं; उन्हें न इस विषय से कुछ लेना-देना होता है और न वे इसकी तह में जाना चाहते।

मैं अनेक ऐसी घटनाओं का साक्षी रहा हूँ, जिनमें बहुत छोटी-सी टोटका कही जाने वाली बात ने वह कर दिखाया, जो चमत्कार से कम नहीं। मेरी छोटी बेटी मेरी वृद्ध माँ अर्थात उसकी दादी के साथ वर्षों से एक कमरे में रहती थी। माँ का स्वर्गवास हो गया। हमने कुछ दिन बेटी को उस कमरे में नहीं सोने दिया। कुछ दिनों बाद हमें लगा कि अब उसके मन से दादी की याद और मृत्यु के समय के भयोत्पादक दृश्य धुंधले हो गये होंगे। हमने उससे पुन: उस कमरे में सोने को कहा। पहले दिन वह बहुत डरी रही। वह लगातार उदास, सहमी और भयभीत दिखाई देती रही। हमने पूछा कि ऐसा क्यों है, तो बोली कमरे में डर लगता है; ऐसा लगता है कि दादी पास में खड़ी हैं।

हमने उसे बहुतेरा समझाया, पर उस पर कोई खास सकारात्मक प्रभाव नहीं हुआ। हमें एक युक्ति सूझी। हमने उसे सुंदरकांड का गुटका दिया और कहा कि इसमें हनुमानजी का वास है। इसे अपने तकिये के नीचे रखकर सो जाओ, वे तुम्हारी रक्षा करेंगे। उसने ऐसा ही किया। दूसरे ही दिन  से प्रभाव परिलक्षित होने लगे। उसका डर न जाने कहां काफूर हो गया और अब वह अकेली उस कमरे में पढ़ती है, सोती है और बहुत सहज-स्वाभाविक ढंग से अपनी दिनचर्या करती है।

इस घटना को देखने के अलग-अलग ढंग हो सकते हैं। धार्मिक रुझान वाला व्यक्ति इसे हनुमानजी की शक्ति मानेगा और अविश्वासी तर्कशील व्यक्ति इसे मनोवैज्ञानिक प्रभाव। लेकिन हमारी बिटिया पर सकारात्मक प्रभाव तो हुआ ही। इसे कौन झुठला सकता है? कोई कुछ माने या न माने लेकिन यह तो मानना ही होगा कि उस छोटी-सी किताब को सिरहाने रखने से उसका आत्मविश्वास बढ़ा।

यही बात हर इस तरह की घटना के बारे में कही जा सकती है।

हमारे देश में ऐसा कोई गांव, शहर अथवा कस्बा नहीं है, जहाँ कुछ लोगों के सिर कोई देवी या देवता की छाया आने की बात नहीं कही जाती हो। इन्हें अंधविश्वास कहकर ख़ारिज कर देना बहुत आसान है, लेकिन समाज में इन लोगों के योगदान को समझने के लिये कुछ तह में जाने की जरूरत है। पहले हम गांवों की बात लें। आज आधुनिक युग में भी हमारे गांवों में चिकित्सा सुविधाएं मीलों तक उपलब्ध नहीं हैं। किसी के बीमार पड़ने पर स्थानीय वैद्य या हकीम कहे जाने वाले कथित या वास्तविक चिकित्सक पर ही निर्भरता होती है। उनकी दवा-दारू से ठीक हो गये तो ठीक, वरना देवी-देवता की कृपा का ही अंतिम सहारा होता है। शारीरिक बीमारियों में तो ये लोग उतने प्रभावी नहीं होते, लेकिन मानसिक विकारों में उनकी युक्तियां काफी कारगर होती देखी गयी हैं।

 

कोई कथित देवी-देवता ताबीज दे देता है, तो कोई भभूत; कोई शरीर के किसी अंग में धागा बांध देता है, तो कोई किसी मंत्र का जाप या ग्रंथ का पाठ करने को कह देता है। इन युक्तियों का काफी प्रभाव होता देखा गया है। अब बताइये कि जहां मीलों तक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध न हों; और यदि हों भी तो इतनी महंगी कि गांव का गरीब उनका लाभ ही न ले सके,  तो ऐसी स्थिति में ये “”देवी-देवता” अगर कुछ मददगार हो जाते हैं, तो किसी को क्या ऐतराज होना चाहिये? लेकिन है। कुछ लोग तो इसे बिना सोचे-समझे सिर्फ अंधविश्वास और पाखंड कहे चले जा रहे हैं। वे यह नहीं सोचते कि सदियों से चली आ रही इन बातों को शायद हमारे पूर्वजों ने सुविचारित ढंग से मनोवैज्ञानिक प्रभाव के लिये शुरू कर उनकी विश्वसनीयता और स्वीकार्यता बढ़ाने के लिये उन्हें धार्मिक रंग दे दिया हो। आज गांवों में चिकित्सा सुविधाएं और चिकित्सक हैं नहीं। उनका कोई अन्य विकल्प भी सरकारें उपलब्ध नहीं करा पा रहीं.ऐसी स्थिति में इन “”देवी-देवताओं” का सहारा भी यदि छिन जाए, तो क्या होगा, यह सोचने की बात है। यह सच है कि ये “”देवी-देवता” चिकित्सा विज्ञान का विकल्प नहीं हो सकते, लेकिन वह चिकित्सा विज्ञान पहले गांव तक पहुंचे तो सही।

गांव अपनी जगह। गांव के लोगों को अनपढ़, नासमझ और अंधविश्वासी कहने का फैशन सदियों से चल रहा है। लेकिन शहरों में, पढ़े-लिखे लोगों के बीच भी ऐसी बातों की कमी नहीं है। अच्छे-अच्छे पढ़े-लिखे लोग ज्योतिषियों, भविष्यवक्ताओं तथा बाबाओं के सामने घुटने टेके बैठे मिल जाएंगे। कोई उन्हें अंधविश्वासी कह ले, लेकिन ये भी अंधविश्वासी नहीं हैं। जीवन में कभी न कभी ऐसा कठिन समय आता है, जब सब कुछ विपरीत होने लगता है। सोने को हाथ लगाओ तो मिट्टी हो जाता है; अपने-पराये हो जाते हैं; सब कुछ हमारी आशाओं-अपेक्षाओं के विरुद्ध होने लगता है। चीजों को ठीक करने की हमारी हर कोशिश विपरीत असर देने लगती है। ऐसे समय अच्छे-अच्छे सुशिक्षित और तर्कशील लोग ज्योतिषियों, भविष्यवक्ताओं, बाबाओं आदि की शरण में जाते हैं- “”आरत के चित रहहि न चेतू”।

ये लोग उन्हें कुछ युक्तियां-उपाय बताते हैं- कोई ताबीज या अँगूठी देता है, तो कोई मंत्र, कोई किसी धर्मग्रंथ का पाठ करने को कह देता है, तो कोई किसी चीज का दान या उपयोग करने की सलाह देता है। इन सब चीजों से और कुछ होता हो या नहीं, लेकिन पीड़ित का आत्मविश्वास तो बढ़ता ही है। यही आत्मविश्वास उसकी स्थितियों में सुधार का कारक बनता है। वरना लोग क्यों इन ज्योतिषियों, भविष्यवक्ताओं और बाबाओं के ज़िन्दगीभर के लिये मुरीद हो जाते हैं? आत्मविश्वास के बढ़ने से व्यक्ति के स्वयं के भीतर सुप्त शक्तियां जागने लगती है और उसमें नयी शक्ति एवं क्षमता का संचार होता है।

दरअसल, मानव के चेतन, अचेतन और अवचेतन मन के रहस्य इतने गूढ़ और जटिल हैं कि इनकी समझ हर किसी को नहीं हो सकती- उन लोगों को तो बिल्कुल ही नहीं, जो सिर्फ दृश्य जगत को ही सब कुछ मानकर “”यथार्थवादी” बने घूम रहे हैं। उन्हें अंदाजा भी नहीं है कि आँखों से जो दिखाई पड़ता है या पड़ सकता है, वह अस्तित्व का रेत के कण बराबर अंश भी नहीं है। मानव मन की ग्रंथियां इतनी जटिल हैं कि उन्हें सुलझाना आसान नहीं है।

यह बात भी खूब प्रचारित की जाती है कि तांत्रिक, ओझा, ज्योतिष, भविष्यवक्ता, बाबा आदि लोगों से पैसा ऐंठते हैं। यह बात अधिकतर लोगों के विषय में सही भी है। लेकिन, क्या आधुनिक चिकित्सक, मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सक इससे पूरी तरह अछूते हैं?

अब मुझ पर यह इल्जाम मढ़ा जा सकता है कि मैं अंधविश्वास को बढ़ावा दे रहा हूँ। लेकिन यह बात समझ ली जानी चाहिये कि किसी भी प्रकार का विश्वास अंधविश्वास ही है। कोई ईश्वर पर विश्वास करता हो या किसी अन्य अदृश्य शक्ति पर, सच पूछो तो उसके पास इसका कोई आधार नहीं है। हर विश्वास अंधा होता है।

सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण के समय खगोलविज्ञानियों तथा ज्योतिषियों के बीच तर्क-वितर्क की खूब घमासान होती है। पिछले कुछ समय से तो इसे टेलीविजन पर सीधा दिखाया जा रहा है। एंकर भी दोनों पक्षों को उकसाने में कोई कसर नहीं छोड़ते।

कितनी स्पष्ट बात है कि खगोलविज्ञानी से यह उम्मीद करना व्यर्थ है कि वह सार्वजनिक रूप से यह कह देगा कि ग्रहण का मानव-जीवन पर असर होता है या कि ग्रहण के सूतक के दौरान कुछ खाना-पीना नहीं चाहिये या कि ग्रहण के बाद स्नान-दान आदि करना चाहिये। इसी तरह उनके प्रतिपक्ष में बैठे सज्जनों से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे सदियों से चली आ रही शास्त्रोक्त बातों के विरुद्ध कुछ कहें। दोनों की बहस अनिर्णीत रह जाती है।

यहां यह समझने जैसी बात है कि सदियों पहले हमारे बुजुर्गों ने ग्रहण के दौरान कुछ सावधानियां बरतने के नियम क्यों बनाये? क्या खगोलविज्ञानी यह चेतावनी नहीं देते कि नंगी आँखों से ग्रहण मत देखो? उन्होंने इसके लिये विशेष चश्मे बनवाये हैं या फिर एक्स-रे फिल्में उपलब्ध कराई हैं। क्या प्राचीन समय में ये चीजें उपलब्ध थीं? अगर नहीं, तो फिर ग्रहण के दुष्प्रभाव से बचने का कोई उपाय तो बताना ही था। अत: कह दिया कि घर से मत निकलो, कुछ बनाओ-खाओ नहीं, भगवान का भजन-ध्यान करो। इसमें क्या गलत था और क्या गलत है? अगर किसी की आस्था शास्त्र के वाक्यों में है और वह ग्रहण के दौरान शास्त्रोक्त बातों का पालन करता है तो वह अंधविश्वासी कैसे हो गया? क्या जिस तरह खगोलविज्ञानियों को शास्त्र में लिखे को नकारने का हक है तो क्या उसी प्रकार आस्थावानों को शास्त्रविधि को मानने का हक नहीं है? यह तो अपना-अपना चुनाव है। फिर, उनके ऐसा करने से किसी को क्या नुकसान है?

यहां एक बात और कहना चाहूंगा। विज्ञान निरंतर खोज और शोध करता है। आज की स्थिति में वह कहता है कि ग्रहण के दौरान खाने-पीने से कुछ नुकसान नहीं होता और गर्भवती स्त्रियों के बाहर निकलने पर उन पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता। मान लीजिये आगे चलकर किसी वैज्ञानिक को कोई ऐसी चीज पता लग जाए, जिससे वह सत्य सिद्ध हो जाए तो सदियों से शास्त्र कह रहे हैं, तो ऐसे में क्या होगा?

यहां मैं तर्क की अवहेलना नहीं कर रहा हूँ। भारतीय दर्शन में तर्क को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। तर्क का एक पूरा दर्शन और शास्त्र है। यह कहा गया है कि हर चीज को तर्क की कसौटी पर कसा जाना चाहिये। लेकिन जीवन में ऐसा बहुत कुछ है, जो तर्कातीत है। जीवन को सिर्फ विज्ञान और तर्कों के सहारे नहीं जिया जा सकता। इसमें भावना, आस्था, विश्वास और रहस्य न हों तो जीवन का आनंद ही खत्म हो जायेगा। जीवन दो दूनी चार का गणित नहीं है। यह विज्ञान का सूत्र भी नहीं है। जीवन एक अनंत रहस्य है, जिसे पूरी तरह जानने में आज तक कोई सफल नहीं हो सका। रही बात आस्था और अंधविश्वास पर बहस की, तो यह सदा चलती रहेगी।

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