वेदों के अनुसार मनाये शादी की सालगिरह : विवाह – दिवस विधि

यूं तो हम शादी की सालगिरह बहुत जश्न से मनाते हैं, इसमें कोई बुराई भी नहीं है, लेकिन शादी की सालगिरह पर वैदिक परंपरा का भी पालन कर लिया जाए तो सोने पे सुहागा हो सकता है, बस कुछ मिनट देकर आप बैदिक परंपरा से अपनी शादी की सालगिरह को और ज्यादा महत्वपूर्ण बना सकते हैं और इस अवसर का आध्यात्मिक लाभ भी ले सकते हैं | 

 

जिस दिन विवाह की वर्षगांठ हो, उस दिन पति – पत्नी मिलकर आत्म निरीक्षण करें। अपनी उन्नति, प्रेम, आर्थिक स्थिति, पारिवारिक स्थिति आदि का चिन्तन करके आगे की योजना बनायें। उन समस्त कारणों को दूर करने का संकल्प करें, जिनसे विवाद होता है। इस प्रकार अपने गृहस्थ जीवन को आनन्दमय बना कर सुखी रहें।

 

इस दिन स्नानादि के बाद श्रद्धापूर्वक अग्निहोत्र स्विष्टकृत् आहुति से पहले तक की विधि करके, निम्नलिखित आहुतियाँ प्रदान करें –

ओ३म्। समञ्जन्तु विश्वे देवाः समापो हृदयानि नौ।

सं मातरिश्वा सं धाता समु देष्ट्री दधातु नौ स्वाहा॥ 

ऋग्वेद १०. ८५. ४७

भावार्थ – इस यज्ञ में उपस्थित सभी विद्वानों ! आपके सामने हम विश्वास पूर्वक घोषणा कर रहे हैं कि हम दोनों के हृदय इस प्रकार मिले हुए हैं जैसे जल से जल मिल जाता है। ईश्वर की कृपा से हम आगे भी इसी प्रकार एक – दूसरे से प्रेम करते रहें।विश्व की समस्त दिव्य शक्तियाँ हमें प्रेम के मार्ग पर चलाती रहें।

ओ३म्। गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्तं मया पत्या जरदष्टिर् यथासः। भगोऽ अर्यमा सविता पुरन्धिर् मह्यं त्वादुर् गार्हपत्याय देवाः स्वाहा॥         ऋग्वेद १०. ८५. ३६

भावार्थ – हम दोनों ने एक – दूसरे का हाथ सम्पूर्ण ऐश्वर्य को प्राप्त करते हुए जीवन पर्यन्त साथ रहने के लिए ग्रहण किया है।सकल संसार को उत्पन्न करके धारण करने वाले ईश्वर और आप सबके सामने एक बार फिर निश्चय पूर्वक कह रहे हैं कि हम सम्पूर्ण जीवन इस गृहस्थ आश्रम में साथ रहेंगे।

ओ३म्। मम व्रते ते हृदयं दधामि मम चित्तमनुचित्तं ते अस्तु।

मम वाचमेकमना जुषस्व प्रजापतिष्ट्वा नियुनक्तु मह्यम्॥  

पारस्कर गृह्य सूत्र १. ८. ८

भावार्थ – हम दोनों का अन्तःकरण परस्पर अनुकूल बना रहे।हमारा विचार एक सा हो। हम एक – दूसरे की बात को ध्यान से सुनें।हे ईश्वर ! इस प्रकार हम एक – दूसरे के सहायक बने रहें।

ओ३म्। सह नाववतु सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै स्वाहा॥  

तैत्तिरीयोप. ब्रह्मानन्दवल्ली अनु. 1

भावार्थ – हे परमेश्वर ! हम दोनों का भरण – पोषण और पालन साथ – साथ करो। हम दोनों साथ – साथ ही बल और उत्साह को प्राप्त करें। हम दोनों का चिन्तन तेजस्वी और सफल होवे और हम कभी भी एक – दूसरे से द्वेष न करें।

इन आहुतियों के बाद गायत्री मन्त्र से आहुतियाँ व स्विष्टकृत् आहुति देकर अग्निहोत्र की सब विधि पूर्ण करें।

आशीर्वाद – पति – पत्नी दोनों हाथ जोडक़र प्रभु से उन्नति की कामना करते हुए बैठे रहें। अन्य सभी उपस्थित सदस्य फूल अथवा चावल हाथ में लेकर खड़े हो जायें। पुरोहित के साथ निम्नलिखित मन्त्रों का उच्चारण करके इनको आशीर्वाद दें और इनके ऊपर फूलों अथवा चावलों की वर्षा करें।

ओ३म्। इहैव स्तं मा वियौष्टं विश्वम् आयुर् व्यश्नुतम्।

क्रीळन्तौ पुत्रैर् नप्तृभिर् मोदमानौ स्वे गृहे॥ 

ऋग्वेद १०. ८५. ४२

ओ३म् सौभाग्यम् अस्तु। ओ३म् शुभं भवतु।

ओ३म् स्वस्ति। ओ३म् स्वस्ति। ओ३म् स्वस्ति॥ 

भावार्थ – हे दम्पती यजमान ! तुम दोनों सदा साथ रहते हुए पूर्ण आयु प्राप्त करो। तुम्हें कभी भी वियोग न सहना पड़े। पुत्र, पौत्र और नातियों के साथ अपने घर में सदा आनन्द मनाते रहो। तुम्हारा भाग्य सदा फलता – फूलता रहे। तुम्हारा सदा शुभ हो और सदा कल्याण हो, कल्याण हो, कल्याण हो।


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