जैन धर्म के 24 वे तीर्थंकर: महावीर स्वामी

जैन धर्म के 24 वे तीर्थंकर: महावीर स्वामी

भगवान महावीर जीने वर्धमान नाम से भी जाना जाता, वो जैन धर्म के 24 वे तीर्थंकर थे। महावीर स्वामी विश्व के उन महात्माओं में से एक थे जिन्होंने मानवता के कल्याण के लिये राजपाट को छोड़कर तप और त्याग का मार्ग अपनाया था। जैन धर्म के परंपरा में ऐसा माना जाता है की बिहार के राज घराने मे ईसापूर्व 6 शताब्दी में भगवान महावीर का जन्म हुआ था। उसके बाद 30 वर्ष तक उन्होंने लोगो को उपदेश किए। बहुत से लोगों यह का मानना है की महावीर के जिंदगी के बारे में जानकारी पूर्णतः ज्ञात नहीं।
अनेकान्तवाद, स्यादवाद और नायवाद के सिद्धांत उन्होनेही दिए। महावीर द्वारा दी गयी शिक्षा का संकलन गौतम स्वामी ने किया और इसे अगमास कहते है। महावीर द्वारा सिखाये गए अगमास के जीवित संस्करण में जैन धर्म के कुछ मुलभुत पाठ है। महावीर स्वामी की प्रतिमा हमेशा खडी या बैठी हुई अवस्था में और उनके निचे एक शेर दिखाई देता है। जिस दिन उनका जनम हुआ वो दिन महावीर जन्म कल्याणक (महावीर जयंती) के रूप में मनाया जाता है। भगवान महावीर का जनम इक्शवाकू वंश के राजा सिद्धार्थ और महारानी त्रिशाला के घर पर ईसापूर्व 599 के निर्वाण संवत चैत्र माह के तेरावे दिन हुआ था।उन्हें सब राजकुमार वर्धमान कह के बुलाते थे। आज भी लोग इस महीने में महावीर जयंती मनाते है। ज्यादातर इतिहासकारों का यह मानते है की महावीर का जनम वैशाली राज्य के क्षत्रियकुंड में हुआ था जो की आज के बिहार में स्थित है। बचपन में वर्धमान शांत स्वभाव के थे परन्तु काफ़ी बहादुर भी थे।उनमें महानता के लक्षण दृष्टिगत होने लगे थे। कठिन परिस्थितियों में उन्होंने कई बार साहस भरे कृत्यों को प्रदर्शित भी किया। राजकुमार होने की वजह से उनका बचपन सारे सुख मिले लेकिन इन सब बातो का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
उन्होंने अपनी जिंदगी सादगी में गुजारी। अपने मातापिता के आदेशानुसार उन्होंने बहुत ही कम उम्र में राजकुमारी यशोदा से विवाह किया। उन्हें उसके उपरांत एक लड़की हुई जिसका नाम प्रियदर्शना था।महावीर के विवाह के बारे में हर स्त्रोत के भिन्न दृष्टिकोन है। दिगंबर परंपरा के अनुसार महावीर अविवाहित थे। लेकिन श्वेताम्बर परंपरा के अनुसार उनकी शादी यशोदा से हुई थी और उन्हें एक लड़की भी थी जिसका नाम प्रियदर्शना था। जैन सूत्रों के अनुसार ईसापूर्व 527 में बिहार के पावापुरी में महावीर की मृत्यु हुई और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई। ऐसा माना जाता है की मोक्ष के पश्चात उनकी आत्मा सिद्ध हो गयी थी यानि की उनकी आत्मा ने शुद्ध रूप की प्राप्ति कर ली थी। ऐसा भी माना जाता है की महावीर ने जहा पर निर्वाण की प्राप्ति कर ली थी वहा पर एक जैन मंदिर है जिसका नाम “जल मंदिर” है।30 साल की उम्र में उन्होंने सांसारिक जीवन का त्याग कर दिया और अध्यात्मिक जागरूकता पाने की चाह में उन्होंने घर भी छोड़ दिया और उन्हें यह महसूस हुआ की यह केवल आतंरिक अनुशासन के माध्यम से संभव हो सकता है। इसलिए उन्होंने गंभीर तपस्या और भौतिक तपत्व का जीवन जीना शुरू किया। अगले साडे बारा वर्ष तक जम्बक में एक विशाल वृक्ष के नीचे उन्होंने गहन ध्यान और कड़ी तपस्या करने के बाद उन्हें कैवल्याज्ञान की प्राप्ति हुई। कैवल्यज्ञान प्राप्ति के बाद उन्होंने अहिंसा, सत्य, अस्तेय(चोरी ना करना), ब्रह्म्हचार्य (शुद्ध आचरण) और अपरिग्रह (गैर लगाव) की सिख दी जो की अध्यात्मिक प्राप्ति के लिए आवश्यक है। एक साल तक उन्होंने एक ही वस्त्र पहने थे और उसके पश्चात उन कपड़ो का भी त्याग कर दिया निर्वस्त्र रहने लगे। उन्होंने ठान लिया था की वो कोई भी संपत्ति साथ में नहीं रखेंगे फिर चाहे वो पानी पिने के लिए कटोरा भी क्यों ना हो। वो अपने हाथों के खोखलो में ही दान लिया करते थे। महावीर अहिंसा का कड़ा पालन किया करते थे। कीड़े उनके शरीर पर रेंगते थे और उन्हें काटा भी करते थे लेकिन महावीर उन कीड़ो को कोई हानी नहीं पहुचाते। वो अपने तपस्या के शांतिपूर्ण जीवन की सारी शारीरिक परेशानियों को शांतिपूर्वक सहन करते थे। लोग उनके निर्वस्त्र और घायल शरीर को देखकर अचरज हो जाते थे और उनका अपमान भी करते थे। फिर भी वो अपना किया हुआ अपमान धैर्यपूर्वक सहन करते थे। तीस वर्ष तक महावीर स्वामी ने त्याग, प्रेम एवं अहिंसा का संदेश फैलाया। जैन धर्म के वे 24 वें तीर्थकर थे।

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