अधर्म की धर्म से लड़ाई 900 साल पुरानी है।

 जेहादियों से 963 वर्ष का युद्ध

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बीता 5 अगस्त 2020 के दिन, विक्रम संवत् २०७७ की भाद्रपद के कृष्णापक्ष की द्वितीया भारत के इतिहास में "गौरवशाली दिवस" के रूप में अंकित हो चुकी है , जिसे हमारी पीढ़ियाँ याद रखेगीं।

1024 में महमूद गजनवी ने जब सोमनाथ मंदिर का विध्वंस किया था तब उसके साथ उसका भांजा सालार मसूद भी साथ आया था ।

महमूद गजनवी के बाद सालार मसूद भी अपने बाप सालार शाह अपने अपने लश्करों के साथ भारत को लूटने और इस्लाम फैलाने के लिए आया था क्योंकि सोमनाथ कई बार लुटा जा चुका था इसलिए इसबार उसने हिंदुओं के सब्स बड़े तीर्थ स्थल अयोध्या की ओर रुख किया ।

1037 में अयोध्या पर हमला कर जन्मभूमि का विध्वंस किया पर जल्द महाराजा सुहेलदेव के प्रतिकार हुआ जिस कारण वो मस्जिद बनाने में कामयाब न हो सका और बहराइच से 7 km दूर घाघरा नदी के तट को जेहादी सेना की लाशों से पाट दिया एक भी सैनिक जिंदा अरब-ईरान न लौट सका और जेहादी अगले 200 साल तक भारत तरफ आने की हिम्मत न जुटा सके।

युद्ध के बाद जन्मभूमि पर राममंदिर पुनः स्थापित किया गया। 200 साल बाद फिर से हमले शुरू हुए ।समय समय पर कई हमलों के बाद जेहादी 1528 में आकर सफल हुए और बाबर के आदेश पर मंदिर तोड़ दिया गया उसपर बाबर के यार बाबरी के नाम की मस्जिद बनाई गई।

1528 ,राममंदिर के विध्वंस को 4 लाख 30 हजार की जेहादी फौज को लेकर निकला मीरकासिम का सामना सबसे पहले महाराजा महताब सिंह के नेतृत्व में 1 लाख 74 हजार की सेना ने किया , 23 दिनों तक भीषण युद्ध किया जिसमें सभी रामभक्त बलिदान हुए।

इतिहासकार कनिंघम अपने लखनऊ गजेटियर के 66वें अंक के पृष्ठ 3 पर लिखता है की एक लाख चौहतर हजार हिंदुओं की लाशें गिर जाने के पश्चात मीरबाँकी अपने मंदिर ध्वस्त करने के अभियान मे सफल हुआ और उसके बाद जन्मभूमि के चारो और तोप लगवाकर मंदिर को ध्वस्त कर दिया गया..

इसके 3 माह बाद 1528 में ही , अवध के सूर्यवंशी क्षत्रियों के कुलगुरु देवीदीन पाण्डेय के नेतृत्व में जो महताब सिंह के साथ युद्ध मे थे के 70 हजार हिन्दु योद्धाओं ने रामजन्मभूमि की मुक्ति के लिए जबरदस्त धावा बोला , बाबर सेना से लगातार 5 दिन युद्ध चला । जिसमें मीर कासिम जख्मी हुआ पर सभी रामभक्त बलिदान हो गए।

पाण्डेय जी के बलिदान के 15 दिन बाद हंसवर के महाराज रणविजय सिंह ने 25 हजार सैनिकों के साथ मीरबाँकी की विशाल और शस्त्रों से सुसज्जित सेना से रामलला को मुक्त कराने के लिए आक्रमण किया । 10 दिन तक युद्ध चला और महाराज जन्मभूमि के रक्षार्थ वीरगति को प्राप्त हो गए। जन्मभूमि में 25 हजार हिन्दुओं का रक्त फिर बहा।

1530-1556 , हुमायूँ काल में 10 युद्ध । इतिहासविद् डॉ. रवीश कुमार का कहना है कि हुमायूं के शासनकाल में श्रीराम मंदिर को वापस पाने के लिए रानी जयराज कुंवारी एवं स्वामी महेश्वरानन्द जी के नेतृत्व में कई 10  भीषण युद्ध हुए।हंसवर के महाराज रणविजय सिंह के बलिदान के बाद उनकी पत्नी महारानी जयराज कुमारी ने रामलला की मुक्ति का युद्ध अपने हाथों में ले लिया

उन्होंने सेना में तीन हजार नारियों सहित 65 हजार की सेना और रानी के गुरु स्वामी महेश्वरानंद की रामभक्त सन्यासियों की 24 हजार की सेना के साथ हुमायूँ सेना से 10 वें भीषण युद्ध में महारानी सफल हुई और रामजन्मभूमि पर हिंदुओं का पुनः अधिकार हो गया।परन्तु लगभग दो महीने बाद हुमायूँ ने पूरी ताकत से शाही सेना फिर भेजी , इस युद्ध में स्वामी महेश्वरानंद और रानी कुमारी जयराज कुमारी लड़ते हुए 45 हजार की सेना के साथ बलिदान हुई ।

1556-1605, रानी जयराज कुमारी और स्वामी महेश्वरानंद जी के बाद यद्ध का नेतृत्व स्वामी बलरामचारी जी ने अपने हाथ में ले लिया।और गांव गांव में घूम कर रामभक्त हिन्दू युवकों और सन्यासियों की एक मजबूत सेना बनाई इन्होंने अकबर काल में 23 बार आक्रमण किये जिसमें से कम से कम 15 बार स्वामी बलरामचारी ने जन्मभूमि पर अपना अधिकार कर लिया मगर ये अधिकार अल्प समय के लिए रहता था थोड़े दिन बाद

बड़ी शाही फ़ौज आती थी और जन्मभूमि पुनः मुगलों के अधीन हो जाती थी..जन्मभूमि में लाखों हिन्दू बलिदान होते रहे। रामभक्तों के लगातार हमलों से भयभीत आतंकित होकर अकबर ने श्रीराम जन्मभूमि परिसर के अन्दर तीन गुम्बदों वाले तथाकथित मस्जिद के ढांचे के सामने एक चबूतरे का निर्माण कर उसपर प्रभु श्रीराम का मन्दिर बनवाकर बेरोकटोक पूजा करने की अनुमति दे दी थी। यही स्थान बाद में राम चबूतरे के नाम से विख्यात हुआ।

इस कूटनीति के कारण हिंदुओं का रोष कुछ कम हो गया और मानसिंह आदि के कारण कोई बड़ा विद्रोह नहीं हुआ। औरंगजेब  1658-1707 उसने समस्त भारत से काफिरों के सम्पूर्ण सफाये का संकल्प लिया था। अयोध्या मे मंदिरों को तोड़ने के लिए जबांज खाँ के नेतृत्व में एक बड़ी सेना भेज दी थी, जिसका प्रतिकार समर्थ गुरु श्रीरामदासजी महाराज के शिष्य श्री वैष्णवदास जी और उनकी निपुण चिमटाधारी साधुओं की सेना ने उर्वशी कुंड नामक जगह पर

जाबाज़ खाँ की सेना से सात दिनों तक भीषण युद्ध किया । चिमटाधारी साधुओं के चिमटे के मार से मुगलों की सेना भाग खड़ी हुई। इस प्रकार चबूतरे परस्थित मंदिर की रक्षा हो गयी। इस युद्ध में 30 से ज्यादा रामभक्तों का बलिदान हुआ।इस युद्ध  इसमें ठाकुर सरदार गजराज सिंह और राजेपुर के कुँवर गोपाल सिंह तथा सिसिण्डा के ठाकुर जगदंबा सिंह आदि प्रमुख थे।

1660 ,जाबाज़ खाँ की पराजित सेना को देखकर औरंगजेब बहुत क्रोधित हुआ और उसने जाबाज़ खाँ को हटाकर एक अन्य सिपहसालार सैय्यद हसन अली को 50 हजार सैनिकों की सेना और तोपखाने के साथ अयोध्या की ओर भेजा । बाबा वैष्णव दास ने सिक्खों के गुरु गुरुगोविंद सिंह से युद्ध मे सहयोग के लिए पत्र के माध्यम संदेश भेजा । पत्र पाकर गुरु गुरुगोविंद सिंह सेना समेत तत्काल अयोध्या आ गए और ब्रहमकुंड पर अपना डेरा डाला । ब्रहमकुंड वही जगह

जहां आजकल गुरुगोविंद सिंह की स्मृति मे सिक्खों का गुरुद्वारा बना हुआ है। बाबा वैष्णव दास एवं सिक्खों के गुरुगोविंद सिंह रामलला की रक्षा हेतु एकसाथ रणभूमि में कूद पड़े ।इन वीरों कें सुनियोजित हमलों से मुगलो की सेना के पाँव उखड़ गये सैय्यद हसन अली भी युद्ध मे मारा गया। औरंगजेब

हिंदुओं की इस प्रतिक्रिया से स्तब्ध रह गया था और इस युद्ध के बाद 4 साल तक उसने अयोध्या पर हमला करने की हिम्मत नहीं की।फिर 1664 में , औरंगजेब ने मजहब के बास्ते एक बार फिर श्रीराम जन्मभूमि पर आक्रमण किया । इस भीषण हमले में शाही फौज ने लगभग 25 हजार से ज्यादा हिंदुओं की हत्या कर दी नागरिकों तक को नहीं छोड़ा। ऐसे एक के बाद एक 10 अभियानों में अयोध्या के मंदिरों का विध्वंस कर दिया।

अयोध्या और जन्मभूमि हिन्दुओं के रक्त से लाल हो गयी। जन्मभूमि के अंदर नवकोण के एक कंदर्प कूप नाम का कुआं था, सभी मारे गए हिंदुओं की लाशें मुगलों ने उसमे फेककर चारों ओर चहारदीवारी उठा कर उसे घेर दिया। आज भी कंदर्पकूप “गज शहीदा” के नाम से प्रसिद्ध है,और जन्मभूमि के पूर्वी द्वार पर स्थित है। शाही सेना ने जन्मभूमि का चबूतरा खोद डाला बहुत दिनो तक वह चबूतरा गड्ढे के रूप मे वहाँ स्थित था । औरंगजेब के क्रूर अत्याचारो की मारी हिन्दू जनता अब उस गड्ढे पर ही श्रीरामनवमी के दिन भक्तिभाव से अक्षत,पुष्प और जल चढाती रहती थी।

इए तरह औरंगजेब के काल में ही जन्मभूमि की मुक्ति के लिए  30 से ज्यादा बार युद्ध हुआ।1705 तक ,नरसंहारों से हिंदुयुवा बिहीन अवध अलगे 50 साल तक कोई बड़ा युद्ध न कर सका पर हिंदुओं की आत्मा अपने आराध्य के लिए रोटी -रोषित और क्रोधित होती रही फिर 1763 में , बजीर अली खान की शाही सेनाओं से सन्यासियों और स्थानीय हिंदुओं की सेना में 6 बार भीषण संघर्ष हुआ। 1810, ईस्वी में नबाब सहादत अली के समय जन्मभूमि की मुक्ति के लिए अमेठी के राजा गुरुदत्त सिंह और पिपरपुर के

राजकुमार सिंह के नेतृत्व मे बाबरी ढांचे पर पुनः पाँच आक्रमण किये गये जिसमें हर बार हिन्दुओं की लाशें अयोध्या में गिरती रहीं। लखनऊ गजेटियर मे कर्नल हंट लिखता है की “ लगातार हिंदुओं के हमले से ऊबकर नबाब ने हिंदुओं और मुसलमानो को एक साथ नमाज पढ़ने और भजन करने की इजाजत दे दी पर सच्चा मुसलमान होने के नाते उसने काफिरों को जमीन नहीं सौंपी।

1835 , नासिरुद्दीन हैदर -“लखनऊ गजेटियर पृष्ठ 62” नासिरुद्दीन हैदर के समय मे मकरही के राजा के नेतृत्व में जन्मभूमि को पुनः अपने रूप मे लाने के लिए हिंदुओं के तीन आक्रमण हुये जिसमें बड़ी संख्या में हिन्दू मारे गये। परन्तु तीसरे आक्रमण में डटकर नबाबी सेना का सामना हुआ 8वें दिन हिंदुओं की शक्ति क्षीण होने लगी , जन्मभूमि के मैदान मे हिन्दुओं और मुसलमानो की लाशों का ढेर लग गया । इस संग्राम मे भीती,हंसवर,,मकर ही, खजुरहट,दीयरा अमेठी के राजा गुरुदत्त सिंह आदि सम्मलित थे। हारती हुई हिन्दू सेना के साथ वीर चिमटाधारी साधुओं की सेना आ मिली और इस युद्ध मे शाही सेना के चिथड़े उड गये और उसे रौंदते हुए हिंदुओं ने जन्मभूमि पर कब्जा कर लिया।

मगर हर बार की तरह कुछ दिनो के बाद विशाल शाही सेना ने पुनः जन्मभूमि पर अधिकार करलिया और हजारों हिन्दुओं को मार डाला गया। जन्मभूमि में हिन्दुओं का रक्त प्रवाहित होता रहा।1850 , नवाब वाजिदअली शाह के समय के समय मे पुनः हिंदुओं ने जन्मभूमि के उद्धारार्थ आक्रमण किया । फैजाबाद गजेटियर में कनिंघम ने लिखा "इस संग्राम मे बहुत ही भयंकर खूनखराबा हुआ दो दिन और रात होने वाले इस भयंकर युद्ध में सैकड़ों हिन्दुओं के मारे जाने के बावजूद हिन्दुओं नें राम जन्मभूमि पर कब्जा कर लिया। क्रुद्ध हिंदुओं की भीड़ ने कब्रें तोड़ फोड़ कर बर्बाद कर डाली मस्जिदों को मिसमार करने लगे और पूरी ताकत से मुसलमानों को मार-मार कर अयोध्या से खदेड़ना शुरू किया।मगर हिन्दू भीड़ ने मुसलमान स्त्रियों और बच्चों को कोई हानि नहीं पहुचाई। अयोध्या मे प्रलय मचा हुआ था ।

इतिहासकार कनिंघम लिखता है की ये अयोध्या का सबसे बड़ा हिन्दू मुस्लिम बलवा था। हिंदुओं ने अपना सपना पूरा किया और औरंगजेब द्वारा विध्वंस किए गए चबूतरे को फिर वापस बनाया । चबूतरे पर तीन फीट ऊँची खस की टाट से एक छोटा सा मंदिर बनवा लिया , जिसमे पुनः रामलला की स्थापना की गयी। 

1855 में, नवाब की शह पर पूरे अवध से इखठ्ठे हुई जेहादियो की भीड़ ने पुनः रामजन्मभूमि पर विध्वंस किया 6 दिसम्बर 1990 को ध्वस्त किये गुम्बदों के पीछे जमा होकर कुछ सौ मीटर दूर अयोध्या के सबसे प्रतिष्ठित हनुमानगढ़ी मंदिर पर क़ब्ज़े के लिए धावा बोला जिसका भयंकर प्रतिकार हुआ इस ख़ूनी संघर्ष में हिंदू वैरागियों ने हमलावर जेहादियों को हनुमान गढ़ी से खदेड़ दिया जो भागकर पुनः तथाकथित बाबरी मस्जिद परिसर में छिपे मगर सन्यासियों और रामभक्तों की फौज ने अधिकतर मुस्लिम हमलावर क़त्ल कर दिए गए, जिसे नबाव के दबाब में प्रशासन ने वहीं में दफ़न किये।

 

April 1883, Nirmohi Akhada Deputy Commissioner Faizabad

इसके बाद मुसलमानों की पुनः हमला कर रामजन्मभूमि पर कब्जा करने की हिम्मत आजतक नहीं हुई।अप्रैल 1883 में निर्मोही अखाड़ा ने डिप्टी कमिश्नर फ़ैज़ाबाद को अर्ज़ी देकर पुनः मंदिर बनाने की अनुमति माँगी, मगर मुस्लिम समुदाय और नबाव की आपत्ति पर अर्ज़ी नामंज़ूर हो गई। इसी बीच मई 1883 में मुंशी राम लाल और राममुरारी राय बहादुर का लाहौर निवासी कारिंदा गुरमुख सिंह पंजाबी लाहौर पंजाब के रास्ते सैकड़ों बैल और ऊँट गाड़ियों से राम मंदिर निर्माण के लिए पत्थर आदि सामग्री हजारों भक्तों के साथ आये पर ईसाई डिप्टी कमिश्नर ने वहाँ से पत्थर हटवा दिए और मंदिर नहीं बनने दिया।

निर्मोही अखाड़े के महंत रघबर दास ने चबूतरे को राम जन्म स्थान बताते हुए भारत सरकार और मोहम्मद असग़र के ख़िलाफ़ सिविल कोर्ट में पहला मुक़दमा 29 जनवरी 1885 को दायर किया. मुक़दमे में 17X21 फ़ीट लम्बे-चौड़े चबूतरे को जन्मस्थान बताया गया और वहीं पर मंदिर बनाने की अनुमति माँगी गई, ताकि पुजारी और भगवान दोनों धूप, सर्दी और बारिश से निजात पाएँ।

निर्मोही अखाड़ा ने इसके बाद अवध के जुडिशियल कमिश्नर डब्लू यंग की अदालत में दूसरी अपील की. जुडिशियल कमिश्नर यंग ने 1 नवंबर 1886 को अपने जजमेंट में लिखा कि "अत्याचारी बाबर ने साढ़े तीन सौ साल पहले जान-बूझकर ऐसे पवित्र स्थान पर मस्जिद बनाई जिसे हिंदू रामचंद्र का जन्मस्थान मानते हैं. इस समय हिंदुओं को वहाँ जाने का सीमित अधिकार मिला है और वे सीता-रसोई और रामचंद्र की जन्मभूमि पर मंदिर बनाकर अपना दायरा बढ़ाना चाहते हैं"।

1934 में बक़रीद के दिन रामभक्त जब अयोध्या रामजन्मभूमि जा रहे थे तो मुसलमानों ने उनपर हमला कर रामभक्तों की हत्या कर दी जिसकी प्रतिक्रिया में दंगा हुआ और हिंदुओं ने बाबरी मस्जिद के कुछ हिस्से को गिरा दिया।जिसमें बाबरी मस्जिद को बहुत नुकसान पहुंचा लेकिन ब्रिटिश सरकार ने इसकी मरम्मत करवा दी।

पर इसमें कई रामभक्त बलिदान हुए।पर ये बलिदान का अंत न था 30 अक्टूबर 1990 को हजारों रामभक्तों ने वोट-बैंक के लालची मुलायम सिंह यादव के द्वारा खड़ी की गईं अनेक बाधाओं को पार कर अयोध्या में प्रवेश किया और विवादित ढांचे के ऊपर भगवा ध्वज फहरा दिया। लेकिन २ नवम्बर 1990 को मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश दिया, जिसमें सैकड़ों रामभक्तों ने अपने जीवन की आहुतियां दीं।

सरकार ने मृतकों की असली संख्या छिपायी परन्तु प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार सरयू तट रामभक्तों की लाशों से पट गया था। 80 से ज्यादा बड़े युद्ध और 933 साल बाद  लाखों राम भक्त 6 दिसम्बर को कारसेवा हेतु अयोध्या पहुंचे और राम जन्मस्थान पर बाबर के सेनापति द्वार बनाए गए अपमान के प्रतीक मस्जिदनुमा ढांचे को ध्वस्त कर दिया।इस कलंक के विध्वंस के बाद भारत सहित पाकिस्तान-बांग्लादेश-अफगानिस्तान में मुसलमानों ने हजारों हिंदुओं को मौत के घाट उतार दिया, हजारों मंदिरों को नष्ट किया उन्हें मस्जिद , शॉपिंग मॉल ,टॉयलेट में बदल दिया ।

ये सब होता रहा और भारत की हिन्दुविरोधी सत्ताएं मौन रहीं , भारत के अनेक हिंदुनामधारी नेता राममंदिर का विरोध करते रहे और गौधरा जैसे हत्याकांडों में रामभक्त  हिंदुओं की हत्याएं होती रहीं।पर भारत के प्राण, भारत की पहचान, भारत का गौरव,  सनातन की धरोहर , हर हिन्दु के आराध्य राम के मंदिर के लिए 1990 के बाद पूरे  30 वर्ष का घोर संघर्ष और करना पड़ा ।

                साभार विवेकानन्द विनय


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