अलसी की फसल को रोगों से कैसे बचाएं, अलसी की अच्छी पैदावार के तरीके..


स्टोरी हाइलाइट्स

कीट प्रबंधन- अलसी की फसल पर विभिन्न अवस्थाओं पर कली मक्खी, अलसी की इल्ली, अर्धकुण्डलक इल्ली तथा चने की इल्ली का विशेष प्रकोप होता है। कली मक्खी (बडलाई) पहचान प्रौढ़ मक्ख आकार में छोटी तथा नारंगी रंग की होती है। इसके पंख पारदर्शी होते है। इल्ली गुलाबी रंग की होती है।

कीट एवं रोगों से बचाव..

प्रमुख रोग:

गेरुआ रोगः- पत्तियों के शीर्ष तथा निचली सतहों पर एवं तना, शाखाओं पर गोल, लम्बवत नारंगी भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं। रोग से बचने के लिये सल्फेक्स 0.05 प्रतिशत या डायथेन एम-45 का 0.25 प्रतिशत घोल खड़ी फसल पर छिड़काव दो बार 15 दिन के अन्तराल से करें। निरोधक जातियां- आर 552, किरण आदि बुवाई हेतु उपयोग में लाएं।

उकठा रोग- उकठा रोग काफी हानिकारक रोग है, जो मिट्टी जनित अर्थात खेत की मिट्टी में रोग ग्रस्त पौधों के टूठ से फैलता है। इस रोग का प्रकोप फसल के अंकुरण से लेकर पकने की अवस्था तक कभी हो सकता है। पौधा रोग ग्रस्त होने पर पत्तियों के किनारे अंदर की ओर मुड़कर मुरझा जाता है। उकठा रोग नियंत्रण के लिये २ या ३ वर्ष का फसल चक अपनाये अर्थात उकठा ग्रसित खेत में लगातार २-३ वर्षों तक अलसी की फसल न लगाये। थीरम फफूंदनाशक दवा से २.५ ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें।

बुकनी रोग या भभूतियां या सफेद चूर्णः- इस रोग के कारण पत्तियों पर सफेद चूर्ण जम जाता है। रोग की तीव्रता अधिक हो जाने पर दाने सिकुड़ जाते है, उनका आकार छोटा हो जाता है। देर से बुवाई करने पर एवं शीतकालीन वर्षा होने पर अधिक समय तक आर्द्रता बनी रहने पर इस रोग का प्रकोप बढ़ जाता है। नियंत्रण के लिये रोग की गंभीरता को देखते हुये ०.३ घुलनशील गंधक (सल्फेक्स) या केराथेन (०.२ प्रतिशत) का छिड़काव १५ दिनों के अंतराल से करें। फसल की बुवाई जल्दी करे। रोग निरोधक किस्में जैसे जवाहर-२३, आर-५५२ एवं किरण का उपयोग करें।

अल्टरनेरिया अंगमारी या अल्टरनेरिया ब्लाइट रोग :- जमीन के ऊपर अलसी पौधे के सभी अंग इस रोग से प्रभावित होते है। परन्तु विशेष रूप से फूलों के अंगों के रोग ग्रसित होने पर नुकसान सबसे अधिक होता है। फूलों की पंखुड़ियों (ब्राह दल पुंज) के निचले हिस्सों में गहरे भूरे रंग के लम्बवत् धब्बे दिखाई देते हैं जो आकार में बढ़ने के साथ फूल के अन्दर तक पहुंच जाते हैं, जिसके कारण फूल खिलने के पूर्व ही मुरझा कर सूख जाते हैं। तथा दाने नहीं बनते। रोग से बचाव के लिये बीजों को थीरम या कार्बेन्डाजिम दवा २.५ ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर बोये रोग की गंभीरता को देखते हुए रोबराल (०.२ प्रतिशत) या डायथेन एम ४५ (०.२५ प्रतिशत) का छिड़काव १५ दिन के अन्तराल से करें।

कीट प्रबंधन- अलसी की फसल पर विभिन्न अवस्थाओं पर कली मक्खी, अलसी की इल्ली, अर्धकुण्डलक इल्ली तथा चने की इल्ली का विशेष प्रकोप होता है। कली मक्खी (बडलाई) पहचान प्रौढ़ मक्ख आकार में छोटी तथा नारंगी रंग की होती है। इसके पंख पारदर्शी होते है। इल्ली गुलाबी रंग की होती है।

डॉ. पी. एल. अम्बुलकर (वैज्ञानिक, कीट शास्त्र):

कृषि विज्ञान केंद्र, छिंदवाड़ा (म.प्र.) डॉ. ए. के. शर्मा (सह प्राध्यापक, कीट शास्त्र) कृषि महाविद्यालय, जबलपुर (म.प्र.) डॉ. एस. के. अहिरवार (तकनीकी अधिकारी, सस्य विज्ञान) कृषि विज्ञान केन्द्र, छिन्दवाड़ा (म.प्र.)

नुकसान का प्रकार इल्लियां, कलियों, फूलों विशेषकर अण्डाशयों को खाती है जिससे कैप्सूल नहीं बनते हैं एवं बीज भी नहीं बनते। सामान्य बोनी में ६०-७० प्रतिशत तथा देर से बोने पर ८२-८८ प्रतिशत कलियाँ इस रोग के द्वारा ग्रसित देखी गई है। मादा मक्ख १ से १० तक अंडे पंखुड़ी के निचले हिस्से में रखती है जिसमें इल्ली निकलकर कली के अंदर जनन अंगों विशेष रूप अण्डाशयों को खाती है जिससे कली पुष्प के रूप में विकसित नहीं होती तथा कैप्सूल एवं बीजों का निर्माण ही नही होता है। 

प्रबंधन:

1. बोनी अक्टूबर मध्य के पूर्व करने से कीट से साधारणतः नुकसान नहीं होता है।

2. निरोधक किस्में जैसे आर ५५२, जवाहर २३ लगाना चाहिए। 

3. प्रकाश प्रपंच का उपयोग करें। कीट रात्रि में प्रकाश की ओर आकर्षित होते हैं। रोज सुबह इनको इकट्ठा कर नष्ट करें। 

4. इस कीट की इल्लियों को एक मित्र कीट (सस्टसिस हेंसिन्यूरी) ५० प्रतिशत परजवी युक्त कर मार देता है। इसके अतिरिक्त इला समय यूरोटोमा, डीरीमस टेट्रास्टिक्स आदि कीट प्राकृतिक रूप से इस कीट के मेगट पर अपना निर्वाह करते हुए कली मक्खी की इल्लियों को बढ़ने से रोकते हैं।

5. एक किलोग्राम गुड़ को ७५ लीटर पानी में घोलकर मिट्टी के बर्तनों की सहायता से कई स्थानों पर रखें। इस कीट के प्रौढ़ गुड़ के घोल की ओर आकर्षित होते हैं। 

6. कीट की संख्या अधिक होने पर ५०० ली. पानी में अथवा प्रोफेनोफॉस. १५०० मि.ली. / हे. का प्रथम छिड़काव इल्लियों के प्रकोप प्रारंभ होने पर तथा दूसरा १५ दिन बाद करें आवश्यकता पड़ने पर तीसरा छिड़काव १५ दिन बाद पुनः करना चाहिये ।

अलसी की इल्ली:

पहचान प्रौढ़ कीट मध्यम आकार का गहरे भूरे रंग का या धूसर रंग का होता है। अगले पंख गहरे घूसर रंग के पीले धब्बों से युक्त होते हैं तथा पिछले पंख सफेद चमकीले अर्थ पारदर्शी होकर बाहरी सतह घूसर रंग की होती है। इल्लियां लम्बी, भूरे रंग की होती है।

नुकसान का प्रकार ये कीट अधिकतर पत्तियों की बाहर की सतह को खाती है। इस कीट की इल्लियां तने के ऊपर भाग में पत्तियों को चिपका कर खाती रहती है। इस कारण कीट से ग्रसित पौधों की बाढ़ रुक जाती है। नियंत्रण इस कीट की ६२ प्रतिशत इल्लियां मरर्तिर इंडिका नामक मित्र कीट के परजीवी युक्त होती है तथा ये बाद में मर जाती है।

अर्ध कुण्डलक इल्ली पहचान इस कीट के प्रौढ़ भूरे रंग के होते है तथा अगले पंखों में सेम के बीज के समान काला धब्बा रहता है। इल्लियों के रंग में विविधता पाई जाती है। जैसे पीले, हरे, गुलाबी, नारंगी, भूरे या काली आदि। शरीर के किनारों पर इल्लियों में हल्की एवं गहरी धारियां होती हैं।

नुकसान का प्रकार - छोटी इल्लियां पौधे के हरे पदार्थ को खुरचकर खाती है। बड़ी इल्लियां कलियों, फूलों एवं फलियों को नुकसान पहुंचाती है। इल्लियां फल्लियां में छेद कर अपना सिर अंदर घुसाकर दानों को खाती है। एक इल्ली अपने जीवनकाल में ३०-४० फल्लियों को नुकसान पहुंचाती है। 

प्रबंधन:

१. फेरोमेन प्रपंचों का उपयोग करें। एक हेक्टेयर के लिये १० प्रपंचों की आवश्यकता होती है।

२. खेत में प्रकाश प्रपंच का उपयोग करें। प्रपंच से एकत्र हुए कीड़ों को नष्ट करें।

३. क्लोरपायरीफॉस २० ई.सी की ७५० से १००० मि.ली. मात्रा प्रति हे. के हिसाब से छिड़काव करें। 

४. न्यूक्लियर पॉली हाइड्रोसिस विषाणु २५० एल ई का छिड़काव करें।