पछेती में गेहूं उत्पादन की तकनीक..


स्टोरी हाइलाइट्स

धान गेहूँ फसल प्रणाली में अधिक पैदावार देने वाली धान की किस्में लेने से गेहूं की बुवाई समय पर नहीं हो पाती है जिससे गेहूं में उत्पादन में कमी आती है

धान गेहूँ फसल प्रणाली में अधिक पैदावार देने वाली धान की किस्में लेने से गेहूं की बुवाई समय पर नहीं हो पाती है जिससे गेहूं में उत्पादन में कमी आती है यह सर्वविदित है कि 25 नवंबर के पश्चात बुवाई करने पर गेहूं की पैदावार में घटोतरी होने लगती है। अतः पछेती किसान निम्न बातों का ध्यान रखें।  

कृषि विशेषज्ञों डॉक्टर सुधीर सिंह, डॉ प्रधुम्न सिंह के अनुसार...

उपयुक्त किस्मों का चुनाव-पछेती बुवाई हेतु निम्न किस्मों का चयन कर सकते हैं।

1. जी. डब्ल्यू.173: यह बोनी किस्म है, पछेती बोनी के लिये 25 दिसम्बर तक उपयुक्त पायी गयी है। यह किस्म 100-110 दिन में पककर तैयार हो जाती है।

2. डी. एल-788-2: यह बौनी एवं पछेती बोनी के लिये उपयुक्त किस्म है। जो कि गेरुआ रोग के प्रति सहनशील व दाना चमकदार, मध्यम शरबती तथा कठोर होता है। यह किस्म 100-110 दिन में पककर तैयार हो जाती है।

3. एम.पी.- 4010: यह किस्म भी मध्यम बौनी एवं पछेती बोनी के लिये उपयुक्त है। यह किस्म 105-110 दिन में पककर तैयार हो जाती है व इसकी उत्पादन क्षमता 42-45 क्विं./हेक्टेयर होती है।

बीज दर: सामान्यतः गेहूं की फसल में 100 किलो बीज प्रति हेक्टेयर का उपयोग किया जाता है। पछेती बोनी की अवस्था में बीज की मात्रा 25-30 प्रतिशत बढ़वार अर्थात 125-130 किग्रा. प्रति हेक्टेयर उपयोग किया जाना चाहिए। 

कतार से कतार की दूरी: सामान्य गेहूं की बुवाई 9"(22.5 सेमी.) में की जाती है। परन्तु पछेती बोनी की अवस्था में कतार से कतार दूरी कम कर 7"(15-18 से.मी.) में बुवाई करें।

बीज उपचार: गेहूं के बीज को बीज जनित रोग से बचाव के लिये बुवाई पूर्व फफूंदनाशक दवा थायरम 2 ग्राम प्रति किलो बीज या कार्बेन्डाजिम 2 ग्राम प्रति किलो बीज या टेबुकोनाजोल 1 ग्राम प्रति किलो बीज से उपचारित कर बोये। बीज उपचार पश्चात गेहूं को पी. एस. बी. 5 ग्राम प्रति किलो बीज व एजोटोबैक्टर 5 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित कर ही बुवाई करें।

उर्वरक प्रबंधनः नत्रजन 80: स्फुर 40: पोटाश 20 किलो प्रति हेक्टेयर समूह 1- इफको (12:32:16) 125 किग्रा. प्रति हेक्टेयर यूरिया (46) 150 किग्रा. प्रति हेक्टेयर.

समूह 2- डीएपी (18:46) 125 किग्रा. प्रति हेक्टेयर यूरिया (46) 150 किग्रा. प्रति हेक्टेयर म्यूरेट ऑफ पोटाश (60) 40 किग्रा. प्रति हेक्टेयर.

समूह 3- सुपर फास्फेट (16) 250 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर यूरिया (46) 175 किग्रा. प्रति हेक्टेयर.

म्यूरेट ऑफ पोटाश: (60) 40 किग्रा. प्रति हेक्टेयर नत्रजन उर्वरक की आधी मात्रा व स्फुर व पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के साथ दें तथा शेष नत्रजन की आधी मात्रा को दो भागों में पहली सिंचाई व दूसरी सिंचाई के साथ दें।

सिंचाई प्रबंधन: पछेती बोनी की बुवाई के समय तापमान कम होता है जिससे क्राउन रूट (शीर्ष जड़े) देर से बनती हैं तथा खेत का पानी भी वाष्प बनकर देर से उड़ता है। अतः पहली सिंचाई 27-30 दिन में करें। पानी की उपलब्धता के अनुसार क्रांतिक अवस्थाओं में, कल्ले फूटते समय, गभोट अवस्था, दूधिया अवस्था पर सिंचाई प्रबंधन करें, पछेती गेहूं का अधिक उत्पादन लिया जा सकता है।

पौध संरक्षण:

दीमक- मिट्टी के अंदर रहकर पौधे के सूखे भागों को खाता है। श्रमिक अवस्था हानिकारक होती है। इससे फसल को 30 से 40 प्रतिशत नुकसान पहुंचता है। 

माहूँ- यह पौधे का रस चूसने वाले छोटे कीट होते हैं, इस कीट के शिशु एवं प्रौढ़, पौधे की पत्तियों-बालियों से रस चूसते हैं। इसकी रोकथाम के लिये तेल को पानी में एक सही मात्रा में घोलकर फसल पर छिड़काव करें। इसके अलावा इसकी रोकथाम के लिये येलो स्टिकी ट्रैप का प्रयोग कर सकते हैं या लाल मिर्च पाउडर के घोल का भी छिड़काव लाभकारी होता है।

गुलाबी तना बेधक- यह कीट तने को भीतर से खाकर उसे कमजोर कर देते हैं। इनकी रोकथाम के लिए फेरोमोन ट्रैप का प्रयोग करना उचित होगा और नेपियर या सूडान घास को फसल के चारों तरफ लगायें ताकि फसल की कीट से रक्षा हो सके।

जड़ माहो- लाल एवं गहरे भूरे रंग का यह कीट फसल की पौध एवं कन्सावस्था में जड़ो से रस चूस कर नुकसान पहुँचाता है। यह कीट नवम्बर से फरवरी माह तक सक्रिय रहता है। इसके शिशु एवं वयस्क दोनों की हानिकारक अवस्थाएं हैं। इसका प्रकोप प्रदेश के मध्य एवं पश्चिमी भागों में अधिक होता है।

फौजी कीट- इस कीट की इल्ली भूरे रंग की पीले भूरे काले रंग की धारियों वाली होती है। पौधा अवस्था से दाने भरने की अवस्था तक इसका प्रकोप देखा गया है।

नियंत्रण के उपाय:

1. खेत की ग्रीष्मकालीन जुताई करना चाहिये।

2. कच्ची या अधपकी गोबर की खाद का प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि इसके प्रयोग से दीमक एवं खोदा कीट के प्रकोप की संभावना अधिक होती है।

3. खेत के आस-पास मेढ़ो में यदि दीमक का बमीठा हो तो उसे गहरा गड्ढा खोदकर नष्ट करें।

4. गेहूं की बोनी समय पर एवं बीज उपचार उपरांत ही करें।

5. गेहूं में लगने वाले कीटों का नियंत्रण प्रारंभ में सर्वप्रथम जैव उत्पादित कीटनाशक जैसे नीम इत्यादि जैविक उपचार के द्वारा करना चाहिए। अत्याधिक प्रकोप होने पर रासायनिक उपचार करना चाहिये।

6. जिन खेतों में दीमक, कटुआ इल्ली, सफेद ग्रब, बीविल तथा झींगुर का प्रकोप अधिक होता है या हर वर्ष होता है। वहाँ बीज का क्लोरपायरीफास 20 ई.सी. को 400 मि.ली. प्रति क्विंटल बीज उपचारित कर बोये।

7. जड़ माहो दीमक तथा वायरवर्म की रोकथाम के लिये प्रथम सिंचाई जल के साथ क्लोरपायरीफास 20 ई.सी. दवा 1200 मिमी. प्रति हेक्टेयर के हिसाब से दें, असिंचित अवस्था में उपरोक्त दवा की मात्रा 5 लीटर पानी में घोलकर तथा इसे 50 किलो रेत में अच्छी तरह से मिलाकर खेत में फैला दें।

8. असिंचित फसल में नवम्बर दिसम्बर माह में कल्ला छेदक भृंग के नियंत्रण के लिये फॉस्फोमिडॉन 250 मि.ली. या मैलाथियान 500 मि.ली. या मिथाइल डेमेटान 650 मि.ली. दवा या 500 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करें। इन दवाओं से जैसिड एवं अन्य रस चूसक कीटों का भी नियंत्रण हो जायेगा।

9. भूरी मकड़ी के नियंत्रण के लिये फारमोथियॉन 25 ई.सी. या मिथाइल डेमेटान का 650 मि.ली./हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें यदि आवश्यक हो तो 75 दिन बाद दूसरा छिड़काव करें।


 

पुराण डेस्क

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