राक्षसीय जीवन पर विहंगम विवेचन————रावण की त्रैलोक्य विजय- 81

राक्षसीय जीवन पर विहंगम विवेचन
                                                                 रावण की त्रैलोक्य विजय -81
रमेश तिवारी
छल, बल। भय,आतंक। मारकाट और अपहरण। यही मुख्य काम थे राक्षस जाति के। क्रूर और असभ्य। बर्बर, अनुशासन हीन। जीवन को भरपूर भोगमयी बनाकर जीने का उद्देश्य। नरमांस भक्षी। धर्म का प्रचार करने वाले त्यागी, तपस्वी आर्यों और ऋषियों के भक्षक। संस्कृति और संस्कारों के शत्रु। किंतु घात अथवा प्रतिघात करने में सिद्ध हस्त। कपट करना,भेष बदलना,माया का निर्माण और भ्रम उत्पन्न कर अपना काम निकालने का प्रयास। आध्यात्मिक शून्यता के कारण राक्षस जाति में दैवीय विज्ञान का अभाव था। देवताओं में दैवीय और देवास्त्र विज्ञान चरम पर था। वैसे भी असत्य और अनाचार का आचरण करने वालों के पास दैवीय विज्ञान टिकता भी नहीं।

महाभारत काल में महान योद्धा कर्ण को ही देख लीजिये। भगवान परशुराम जी से झूठ बोलकर कि वह ब्राह्मण है,ब्रह्मास्त्र तो प्राप्त कर लिया किंतु प्रक्षेपण के समय भूल भी गया।

रावणि ने आसमान को अंधकार मय कर युद्ध स्थल को मोहित कर देवराट इंद्र को बंदी बना लिया। यह राक्षसों की बडी़ सफलता थी। यहां हम राक्षस जाति के संपूर्ण इतिहास पर भी दृष्टि डाल लेते हैं। रामायण काल से पहले अफ्रीका में नील नदी के समीप ब्रह्मराक्षस का उल्लेख मिलता है। हेति और प्रहेति से लेकर माली, सुमाली और माल्यवान तक, यह राक्षस लंका, सुमाली लैंड और अबिसीनिया में रहे।

रावण की वयं रक्षामः की मुहिम और आतंक के भय से दक्षिण भारत में राक्षसों की बाढ़ सी आ गई। सामान्य वनवासी, दलित, पीडि़त तलवार के भय से राक्षस धर्म स्वीकार करने लगे। भारत के अन्य क्षेत्रों में भी राक्षसों के स्लीपर सेल स्यापित हो गये। परन्तु उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में इस जाति का दबदबा महाभारत काल में बहुत अधिक दिखाई देने लगा।

                                

बकासुर, जटासुर,अघासुर,नरकासुर,भौमासुर जैसे राक्षसों का वर्चस्व स्थापित हो गया । कंस के रूप में राक्षसी प्रवृत्ति चरम पर पहुंचने लगी। तब आर्यों के तारणहार के रूप में श्रीकृष्ण ने आर्यावर्त में शांति स्थापना का प्रयास किया। उन्होंने राक्षसराज दंतवक्र को जहां मारा, उसी स्थान का नाम तो दतिया पड़ गया। राक्षस जाति घने अरण्यों में रहती थी। आप यूं समझ लें बस कि पर्वतों की गुफाओं में उनका निवास होता। गंगा, जमुना के बीच और चंबल नदी से मेरठ, गुजरात के काठियाबाड़ तक राक्षसों का वर्चस्व हो गया था। विशेषता यह भी थी कि उन्हीं अरण्यों में नाग जाति भी रहती थी। नागजाति मांस भक्षी नहीं थी। वह खेती करती थी। राक्षसों के प्रभाव वाला क्षेत्र, "राक्षसावर्त"कहलाने लगा था। तब पुष्कर क्षेत्र को पुष्करावर्त, धर्मक्षेत्र कुरूक्षेत्र को कुशावर्त और बिठूर,बिजनौर तथा हरिद्वार क्षेत्र को ब्रह्मावर्त कहते थे। यह सब आर्यावर्त में थे। जबकि विंध्य पर्वत के दक्षिण वाला क्षेत्र दक्षिणावर्त कहलाता था।

घने अरण्य में गुफाओं में रहने वाले राक्षसों में बृकोदर नामक एक राक्षस राजा भी हो गया है। यह बृकोदर और कोई नहीं, भीम ही था। भीम ने राक्षसों के राजा हिडिम्ब को मारकर उसकी बहन हिडिम्बा से विवाह किया। भीम ने हिडिम्बा के गर्भ से महान मायाबी योद्घा घटोत्कच को उत्पन्न किया। राक्षसों और नाग जाति की बडी़ रोचक कहानियांँ हैं। गंगा और जमुना नदी से मेरठ, दिल्ली तक नागों के राजा आर्यक का राज्य भी था। नाग जाति सांप नहीं थी। बहुत सुन्दर मनुष्य थे। क्योंकि इन्हीं नागराज आर्यक की पुत्री मारिषा भगवान श्रीकृष्ण की दादी थीं। राजा शूरसेन की विवाहिता पत्नी। कालिया नाग का वर्चस्व जमुना के किनारे और मथुरा के आसपास था। जिसको श्रीकृष्ण ने पराजित करके भगा दिया था। आर्यक का पुत्र नाग कर्कोटक, और कर्कोटक का पुत्र हुआ नाग मणिमान।

नाग जाति में सबसे अधिक खतरनाक कोई नाग था, तो उसका नाम था,"तक्षक"। तक्षक का आतंक था। वह इंद्रप्रस्थ क्षेत्र के घने वनों में रहता था। नागों के विष और इमारती लकडी़ की तस्करी करता था। खांडव वन को साफ करते समय तक्षक अर्जुन के हाथों से मरने से भाग कर बच गया था|तक्षक जैसे तस्कर पर इंद्र का वरदहस्त था। किंतु भारत के वाइसराय अग्निदेव उसको मरवाना चाहते थे।

कथायें इतनी रोचक और अधिक हैं कि हम महीनों तक लिखते ही रहें और आप भी पढ़ते रहें। आपको नागों और खासकर राक्षसों के युद्ध आदि के संबंध में बतायेंगे।
धन्यवाद |


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