धर्मज्ञान: प्रवचन के नियम: उपदेश किसे दें? किससे लें? P अतुल विनोद

उपदेश किसे दें? किससे लें? 

P ATUL VINOD

इस देश में उपदेश देने और लेने वाले करोड़ों में हैं| हर क्षेत्र में उपदेशक हैं .. बाकी क्षेत्रों में उपदेश और प्रवचन को लेकर कोई संहिता, नियम या निर्देश हों न हो लेकिन “अध्यात्म” ख़ास तौर से तत्व-ज्ञान के सम्बन्ध में ज़रूर कुछ हिदायतें दी गयी हैं| 

उपदेशक से ये अपेक्षा की जाती है कि वे ऐसे विषय पर उपदेश न दें जिसका अनुभवात्मक ज्ञान न हो| यदि वे ऐसे विषय पर प्रवचन दे रहे हैं जिसका उन्हें प्रक्टिकल ज्ञान न हो तो ये बात स्पष्ट रूप से कहें| विषय वस्तु का स्रोत बताएं| 

धर्म शास्त्र कहते हैं कि गुरु को बिना कामना के उपदेश नहीं देना चाहिए| स्रोत की बिना जिज्ञासा या इच्छा के दिया गया उपदेश दोनों के लिए अहितकर है| 

न तो बिना बिना पूछे उपदेश दें न ही बिना जिज्ञासा के उपदेश लें| 

गुरु का कर्तव्य है कि शिष्य की जिस तरह की भूख हो उसी तरह का भोजन दे| जिसे भौतिक ज्ञान की ज़रूरत है उसे वही दें| 

जो जितना पात्र है उसे उसी अनुसार ज्ञान दिया जाए|

लेने वाले का कर्तव्य है कि वो क्षमता से ज्यादा लेने की कोशिश न करे|

पात्रता विकसित करने की कोशिश करें| 

कुण्डलिनी, आत्मज्ञान और परमतत्व को लेकर इतने भ्रम इसीलिए खड़े हो गए क्यूंकि बिना अनुभव के किताबें लिख दी गयी, प्रशंसा और गुरुडम बढ़ाने के लिए अपात्रों ने उन विद्याओं का ज्ञान देना शुरू कर दिया गया जिसे वो छू भी न सके| 

जिज्ञासु को उसी से सवाल करना चाहिए जो देने योग्य है| 

पात्रता के बगैर अध्यात्व व ज्ञान की बड़ी बड़ी बातें दोष पैदा करती हैं| 

पात्रता विकसित करने के लिए मार्गदर्शक पहले अभ्यर्थी की क्षमता का आकलन करे| 

कर्मकांड, क्रिया, कर्म और उपासना प्राथमिक सीढ़ी हैं आत्मज्ञान का सीधा मार्ग नही| 

ज्ञान तत्व के लिए भूमिका तैयार करने के लिए जप, तप,कर्मकांड, क्रिया, कर्म और उपासना से क्षमता हासिल होती है| 

परमात्व तत्व तक पहुचने के लिए उसकी शक्ति के सहयोग से ही क्षमता हासिल हो सकती है| वो शक्ति सबके अंदर प्रसुप्त रूप में मौजूद है| शक्ति ही शिव से मिला सकती है| परमात्मा की परा शक्ति को अपने अंदर ही जागृत किया जा सकता है| इस शक्ति के लिए भी जिज्ञासा चाहिए, लेकिन कल-कल करने वाले जीवन भर इंतज़ार ही करते रहते हैं और इस चक्र से बाहर नही आ पाते| 

 

 

 


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