एक कचरा क्रांति

एक कचरा क्रांति

ऋषि खेती, बिना जुताई ,बिना खाद , बिना निंदाई ,बिना दवाई ,बिना मशीन की कुदरती खेती|
धान की पुआल और गेंहू की नरवाई जिसे कचरा समझ कर किसान जला देते हैं ने एक बड़ी क्रांति को जन्म दिया है। जिसे हम कचरा क्रांति कहते हैं। 
यह कचरा भले किसानो को बेकार दिखता है किन्तु यह उनकी मुसीबत को दूर करने के लिए अब सोना बन गया है। शायद ही किसी को विश्वास होगा कि वह किसी क्रांति की शुरआत कर सकता है। लेकिन हमे इस कचरे के वजन और क्षमता का अहसास हो चुका है। यह क्रांति असली क्रांति है। जरा सरसों और गेंहू के इन खेतों को देखिए।
धान का पुआल गेंहू के नन्हे पौधों पर फेंका जा रहा है

इस पक रही फसल से प्रति चैथाई एकड़ में लगभग एक टन  पैदावार ली जा सकेगी (एक किलो प्रति वर्ग मीटर ) मेरे ख्याल से यह जापान के रासायनिक खेती के सबसे अधिक उत्पादन देने वाले  इलाकों  की पैदावार के बराबर या उस से भी अधिक है।  इन खेतों को पिछले कई दशकों  से जोता नहीं गया है न ही इसमें खाद ,दवाई ,निंदाई की गई है।  बुआई के नाम पर मैं सिर्फ गेंहू  और सरसों  के बीजों को सितम्बर /ओक्टूबर  के मौसम में, जबकि धान  की फसल खेतों में खड़ी होती है बिखेर देता हूं।

पुआल से गेंहू ढक गया है

कुछ हफ्तों  बाद मैं धान  की फसल काट लेता हूं और धान  का पुआल सारे खेत में फैला देता हूं।यही तरीका धान  की बुआई के लिए भी अपनाया जाता है।ठण्ड की फसल की कटाई तथा गहाई हो जाने के बाद मैं इसकी नरवाई भी खेतों में बिखेर देता हूं।

गेंहू की फसल में धान की बीज गोलियां डाल रहे हैं

धान ,गेंहू और सरसों की फसलों की बुआई के लिए यह तरीका सर्वोत्तम है। लेकिन एक तरीका इससे भी आसान है। धान को यहां ठण्ड की फसल के साथ क्ले की सीड बॉल से बोया गया था। यानि गेंहू और धान की बुआई का सारा काम जनवरी के पहले हफ्ते  तक निपटा लिया गया है। धान के बीज अपने मौसम में ही उगते हैं। ठण्ड में ये सुप्त अवस्था में रहते हैं।

गेंहू और सरसों की नरवाई वापस डाली गई है
धन की फसल में खरपतवार भी है
खरपतवार उगने की मैं परवाह नहीं करता क्योंकि उनके बीज अपने आप आसानी से झड़ते और उगते रहते हैं। धान के साथ पनपते  बरसाती कचरे नमि संरक्षण ,पोषक तत्वों की आपूर्ति ,बीमारियों से बचाव का काम करते हैं। अतः इन खेतों में बुआई का क्रम इस प्रकार रहता हैः अक्तूबर के प्रारंभ में रिजका या बरसीम धान खड़ी फसल बीच बिखेरी जाती है। नवम्बर की शुरआत में धान काट लिया जाता है और उसके बाद अगले वर्ष के लिए धान  के  और सारे खेत में पुआल फैला दिया जाता है।

धान का एक पौधा 
सरसों की फसल
 आपको यहां जो सरसों  और गेंहू  दिखलाई दे रही है, उसे इसी ढंग से उगाया गया है। चैथाई एकड़ में खेत में ठण्ड की फसलों और धान  की खेती का सारा काम केवल एक-दो व्यक्ति ही कुछ ही दिनों में निपटा लेते हैं। मेरे ख्याल से धान ,गेंहू और सरसों को उगाने का इससे ज्यादा आसान, सहज तरीका कोई अन्य नहीं हो सकता।

खेती का यह तरीका रासायनिक कृषि की तकनीकों के सर्वथा विपरीत है। यह जैविक कृषि ,जीरो बजट खेती और परंपरागत देशी खेती की तकनीकों को बेकार सिद्ध कर देता है। खेती के इस तरीके, जिसमें कोई मशीनों द्वारा निर्मित खादों तथा रसायनों का उपयोग नहीं होता, के द्वारा भी औसत जापानी खेतों के बराबर या कई बार उससे भी ज्यादा पैदावार हासिल करना संभव है। इसका प्रमाण यहां आपकी आंखों के सामने है।

गेंहू के बीज छिड़क कर पुआल दाल दिया है

सिंचाई के साथ (टाइटस फार्म )

पुआल से गेंहू निकल रहा है

धान को काटने के पश्चात् हम बरसीम + गेंहू या सरसों + गेंहू के बीजों को बिखेर कर ऊपर से पुआल आड़ा तिरछा इस प्रकार फैला देते हैं जिस से सूर्य रौशनी नीचे तक आती रहे फिर सिंचाई कर देते हैं। इसमें पैदावार बीजों की छमता के अनुसार बढ़ते क्रम में मिलती है। इसमें किसी भी प्रकार की मानव निर्मित खाद और कल्चर को नहीं डाला जाता है।


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