श्रीमद्भागवत पुराण का संक्षेप -दिनेश मालवीय

श्रीमद्भागवत पुराण का संक्षेप

-दिनेश मालवीय

कलियुग में श्रीमद्भागवत पुराण को सनातन धर्म में बहुत महत्वपूर्ण माना गया है. इसके सन्देश को प्रसारित करने के लिए युगों से ‘भागवत सप्ताह’ के आयोजन का सिलसिला जारी है, जिसमें विद्वान भगवत्भक्ति और समाज सुधार का सन्देश देते हैं. इस ग्रंथ में वेदों, उपनिषदों तथा दर्शन शास्त्र के गूढ़ विषयों को बहुत सरल भाषा में समझाया गया है. इस पुराण में सकाम और निष्काम भक्ति, ज्ञान साधना, भक्ति, जीवन की मर्यादाओं और आचरण आदि की बहुत सटीक व्याख्या की गयी है.

इस पुराण में बारह स्कंध हैं, जिनमें विष्णु के अवतारों का वर्णन है. नैमिशारन्य में शौनकादि ऋषियों की प्रार्थना पर लोमहर्षण के पुत्र उग्रश्रवा सूतजी ने इस पुराण के माध्यम से चौबीस अवतारों की व्याख्या की है.



श्रृष्टि-उत्पत्ति- इस पुराण के अनुसार श्रृष्टि की उत्पत्ति भगवान की एक से अनेक होने की इच्छा से हुयी. भगवान अपनी माया से अपने स्वरूप में काल, कर्म और स्वाभाव को स्वीकार कर लेते हैं. तब काल से सत्व, रज और तम गुणों में क्षोभ उत्पन्न होता है और स्वभाव उस क्षोभ को रूपांतरित कर देता है. तब कर्म गुणों के महत्त्व को जन्म देता है, जो क्रमश: अहंकार, आकाश, वायु, तेज, जल, पृथ्वी, मन, इन्द्रियां और सत्व में परिवर्तित हो जाते हैं. इस सभी के परस्पर मिलने से व्यष्टि-समष्टि रूप पिण्ड और ब्रह्माण्ड की रचना होती है.

काल गणना- इस पुराण में काल गणना भी बहुत सूक्षम रूप से की गयी है. वस्तु के सूक्ष्मतम स्वरूप को ‘परमाणु’ कहते हैं. दो परमाणुओं से एक ‘अणु’ और तीन अणुओं से मिलकर एक ‘त्रसरेणु’ बनता है. तीन त्रसरेणुओं को पार करने में सूर्य किरणों को जितना समय लगता है, उसे ‘त्रुटि’ कहते हैं. त्रुटि का सौ गुना ‘निमेष’, तीन निमेष का एक ‘क्षण’ और पाँच क्षणों का एक ‘काष्ट’ होता है. पन्द्रह लघुओं की एक ‘नाडिका’ अथवा ‘दण्ड’ और दो नाडिका या दण्डों का एक ‘मुहूर्त’ होता है. छह मुहूर्त का एक ‘प्रहर’ अथवा ‘याम’ होता है.

इस पुराण के अनुसार एक चतुर्युग (सतयुग, त्रेतायुग, द्वावर युग और कलियुग) में बारह हजार दिव्य वर्ष होते हैं. सतयुग के 4800 वर्ष, त्रेता के 3600 वर्ष, द्वापर के 2400 वर्ष और कलियुग के 1200 सः होते हैं. एक दिव्य वर्ष मनुष्यों के 360 वर्ष के बराबर होता है.

प्रथम स्कंध- इसमें उनतीस अध्याय हैं, जिनमें शुकदेव ईश्वर भक्ति का महत्त्व बताते हैं. भगवान् में विविध अवतारों का वर्णन, देवर्षि नारद के पूर्जन्मों का चित्रण, राजा परीक्षित के जन्म, कर्म और मोक्ष की कथा, अश्वत्थामा का निंदनीय कार्य और उसकी हार, भीष्म पितामह का प्राणत्याग, श्रीकृष्ण का द्वारका गमन, विदुर के उपदेश, धृतराष्ट्र , गांधारी और कुंती का वन गमन और पाण्डवों का स्वर्गारोहण के लिए हिमालय प्रस्थान आदि का वर्णन है.

दूसरा स्कंध- इसमें भगवान् के विराट स्वरूप का वर्णन है. साथ ही देवताओं की उपासना, गीता का उपदेश, श्रीकृष्ण की महिमा और उनके प्रति भक्ति का उल्लेख है. इसमें बताया गया है कि सभी जीवात्माओं में आत्मा स्वरूप कृष्ण ही विराजमान हैं.

तीसरा स्कंध- इसमें उद्धव और विदुर की भेंट के साथ ही ही उद्धव द्वारा श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं का चित्रण, विदुर और मैत्रेय ऋषि की भेंट, श्रृष्टि क्रम का उल्लेख, ब्रह्मा की उत्पत्ति, काल विभाजन का विवरण, श्रृष्टि विस्तार, वराह अवतार की कथा, दिति के आग्रह पर ऋषि कश्यप द्वारा असमय सहवास और दो अमंगलकारी राक्षस पुत्रों के जन्म का शाप, जय-विजय का सनत्कुमार द्वारा शापित होकर हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप का जन्म, प्रह्लाद की भक्ति, वराह अवतार और कर्दम-देवहूति का विवाह, सांख्य शास्त्र का उपदेश, कपिल मुनि के रूप में भगवान् का अवतार आदि का वर्णन है.

चौथा स्कंध- इसमें ‘पुरंजनोपाख्यान’ के कारण के बहुत सारे वर्णन हैं. नवद्वार रुपी मनुष्य शरीर का रूपक स्वरूप में वर्णन है. इन नौ द्वारों में दो आँखें, दो नासिका छिद्र, एक मुख, एक गुदा और एक लिंग शामिल हैं. अविद्या और अज्ञान की माया रुपी वह सुंदरी है, जिसके दस सेवक यानी दस इन्द्रियां हैं. पाँच वायु हैं- प्राण, अपान, उदान, व्यान और सामान. पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और एक मन. पाँच घोड़ों का रथ यानी पंच विषय हैं-रस, रूप, गंध, स्पर्श और शब्द.

पांचवां स्कंध- इसमें प्रियव्रत, अग्नीध्र, राजा नाभि, ऋषभ देव और भारत आदि राजाओं के चरित्र का वर्णन है. यह भरत जड़ भरत हैं, शकुंतला पुत्र नहीं. जड़ भरत का मृग मोह और उसके फलस्वरूप जन्म लेना तथा सिन्धु सौवीर नरेश से आध्यात्मिक संवाद आदि का उल्लेख है.  इसमें भरत वंश और भुवन कोष का वर्णन, गंगावतरण कथा, भारत का भौगोलिक वर्णन, भगवान् विष्णु का स्मरण तथा रौरव नरकों का वर्णन है.

छठवां स्कंध- इसमें नारायण कवच और पुंसवन विधि का वर्णन है. व्याधियों और ग्रहों के दुष्प्रभावों से मनुष्य की रक्षा, एकादशी और द्वादशी व्रत का महत्त्व वर्णित है.इसमें अजामिल का उपाख्यान भी दिया गया है. इसमें दक्ष प्रजापति के वंश का भी वर्णन है.

सातवाँ स्कंध- इसमें भक्त प्रह्लाद और हिरन्यकश्यप की कथा, मानव धर्म, वर्ण धर्म और स्त्री धर्म का विस्तृत विवेचन है.

आठवां सकन्ध- इसमें ग्राह द्वारा गजेन्द्र के पकडे जाने पर विष्णु द्वारा गजेन्द्र के उद्धार की कथा का रोचक वर्णन है. इसी स्कंथ में समुद्र मंथन और विष्णु के मोहिनी रूप में अमृत वितरण की कथा है. इसमें देवसर संग्राम और वामन अवतार की कथा के साथ ही मत्स्यावतार की कथा भी है.

नवमां स्कंध- इसमें ‘वंशानुचरित’ के अनुसार मनु और उनके पाँचों पुत्रों के वंश का वर्णन है. ये हैं- इक्ष्वाकु वंश, निमी वंश, चन्द्र वंश, विश्वमिर वंश, साथ ही पुरु वंश, भरत वंश, मगध वंश, अनु, द्रह्य, तुर्वसु और यदु वंश आदि का विवरण दिया गया है.

दसवां स्कंध- इसके दो खण्ड हैं- पूर्वार्ध और उत्तरार्ध. इस स्कंध में श्रीकृष्ण का चरित्र विस्तार से बताया गया है. प्रसिद्ध ‘रास पंचाध्यायी’ भी इसी में है. यह स्कंध पूरी तरह श्रीकृष्ण की लीलाओं से पूर्ण है. इसमें देवकी-वासुदेव विवाह, कंस द्वारा देवकी के बालकों की हत्या, कृष्ण का जन्म, बल लीलाएं, गोपालन, कंस वध, अक्रूर की हस्तिनापुर यात्रा, जरासंध से युद्ध, द्वारका पलायन, रुक्मणी से विवाह, प्रद्युम्न का जन्म, शम्बासुर का वध, स्यमानक मणि कीकथा, जाम्बन्ती और सत्यभामा से विवाह, उषा-अनिरुद्ध का प्रेम प्रसंग, वाणासुर के साथ युद्ध और राजा नृग की कथा के साथ ही कृष्ण-सुदामा की मैत्री कथा भी दी गयी है.

ग्यारहवां स्कंध- इसमें राजा जनक और नौ योगियों के साथ संवाद द्वारा भगवान के लक्षण बताये गये हैं. दत्तात्रेय द्वारा महाराज यदु को उपदेश, अट्ठारह प्रकार की सिद्धियों, ईश्वर की विभूतियों आदि के साथ ही वर्णाश्रम धर्म, योग, कर्मयोग और भक्तियोग का वर्णन है.

बारहवां स्कंध- इस अंतिम स्कंध में राजा परीक्षित के बाद के राजवंशों का वर्णन, भविष्यकाल में किया गया है. इसका सार यह है कि कौन से वंश के राजा कितने वर्ष तक राज करेंगे.


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