स्थायी सुख (Abiding Happiness)

स्थायी सुख

स्थायी सुख अपने भीतर से ही उद्धार होता है तथा वह क्रय की वस्तु नहीं है। धन और सत्ता के संचय की कोई राशि भी कणभर सुख नहीं दे सकती। सुख आन्तरिक अनुशासन की सहज परिणति है तथा मनुष्य को ऐसी अनुशासित मानसिक अवस्था प्राप्त करने के लिए प्रयास करना पड़ता है, जो जीवन और जगत् के प्रति सकारात्मक भाव के विकास के साथ जुड़ी हुई हो। तथापि, स्थायी सुख आन्तरिक स्वच्छता, दिव्य सत्ता के साथ निशब्द तारतम्य और दीन-दुखी जन की भेदभाव निःस्वार्थ सेवा से उत्पन्न होता है। निश्चय ही, उस व्यक्ति का, जो अपनी सुरक्षा और शक्ति के लिए भौतिक सम्पदाओं पर निर्भर होता है, अन्त में है।
मोह-भंग अवश्य होता है तथा वह, जो अपनी सुरक्षा और शक्ति के लिए तथा उत्तम कार्यों के पुरस्कार के लिए दैवी सत्ता की ओर देखता है, स्थायी शान्ति प्राप्त कर लेता है।

Abiding Happiness

Happiness emanates from within and is no purchasable commodity. No amount of accumulation of pelf and power can impart an iota of happiness. It is the natural outcome of an inner discipline and one has to strive for attaining a disciplined state of mind which is associated with the development of positive attitudes towards life and the world.

However, abiding happiness arises from inner cleanliness, silent communion with the Divine and selfless service to the needy and the downtrodden without discrimination. Assuredly, he who depends upon material possessions for his security and strength is in for disillusionment in the long run while he who turns within to the Divine for security and strength and for rewards of
good deeds earns abiding happiness.

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