मप्र के बिजली घरों में 9 दिन में 88 हजार मीट्रिक टन कोयले की अतिरिक्त खपत.. गणेश पाण्डेय 

मप्र के बिजली घरों में 9 दिन में 88 हजार मीट्रिक टन कोयले की अतिरिक्त खपत.. गणेश पाण्डेय
Ganesh Pandayभोपाल: देश मे कोयला आपूर्ति नहीं होने से बिजली संकट की स्थिति निर्मित होने लगी है. बावजूद इसके, मप्र के बिजली घरों में 1 से 9 अक्टूबर के बीच 88 हजार मीट्रिक टन  अतिरिक्त कोयले  की खपत की गई। इससे 30 करोड़ का अतिरिक्त कोयले की खपत होने की जानकारी सामने आई है।  यानी अधिकारियों की लापरवाही से विद्युत उत्पादन कंपनी को ₹30 करोड़ की राजस्व हानि हुई विद्युत नियामक आयोग के मापदंड के अनुसार मप्र के बिजली घरों में  620 ग्राम कोयला से एक  यूनिट बिजली बननी थी लेकिन 768 ग्राम कोयला यानी 148 ग्राम पर अधिक कोयला की खपत कर प्रति यूनिट बिजली तैयार होने से मप्र पावर जनरेटिंग कंपनी को करोडों का नुकसान होने की बात सामने आई है। कोयले की कमी से हाहाकार मचने से  कई पॉवर प्लांट्स के बंद होने की नौबत आ गई है। तमाम शहरों में बिजली कटौती होने लगी है। वहीं इस क्राइसिस टाइम में भी मध्य प्रदेश में थर्मल पावर स्टेशन बिजली उत्पादन के लिए तय मात्रा से ज्यादा कोयला इस्तेमाल कर रहे हैं। यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है ।  विशेषज्ञों का दावा है कि एक यूनिट बिजली पैदा करने के लिए 620 ग्राम कोयला पर्याप्त होता है, जबकि इस दौरान यहां पर एक यूनिट बिजली पैदा करने के लिए 768 ग्राम कोयला यूज हुआ।


 जरुरत से ज्यादा कोयला हुआ इस्तेमाल : 



विशेषज्ञों का अनुमान है कि 1 अक्टूबर से 9 अक्टूबर के बीच थर्मल पावर स्टेशनों ने 88 हजार  मीट्रिक टन अतिरिक्त कोयले का इस्तेमाल किया गया। इसकी कीमत करीब 30 करोड़ रुपए बताई जा रही  है।  जानकारी अनुसार 9  दिनों में सतपुड़ा, श्री सिंगाजी, संजय गांधी और अमरकंटक थर्मल पावर स्टेशन में कुल 4 लाख मीट्रिक टन कोयले का इस्तेमाल हुआ। जबकि इस दौरान 5229 लाख यूनिट बिजली पैदा की गई। सवाल यह उठता है कि  इस दौरान एक यूनिट बिजली पैदा करने के लिए 768 ग्राम कोयला इस्तेमाल किया गया। जबकि आदर्श रुप में एक यूनिट बिजली पैदा करने के लिए 620 ग्राम कोयला पर्याप्त होता है। 


Coal Power




श्री सिंगाजी थर्मल पावर स्टेशन की तो इन 9  दिनों में यहां पर एक यूनिट बिजली पैदा करने के लिए सबसे ज्यादा 817 ग्राम कोयला इस्तेमाल किया गया है। हालांकि श्री सिंगाजी प्लांट के सुप्रीटेंडेंट इंजीनियर इसके पीछे कोयले की खराब क्वॉलिटी समेत कई अन्य कारण बता रहे  हैं। वहीं एमपी जेनको के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि इन दिनों जो हालात हैं उनमें क्वॉलिटी चेक  करना बहुत मुश्किल  काम है। ऐसी स्थिति में जो कोयला मिल रहा है  उससे ही काम चलाया जा रहा है।




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