त्रिपुरा की राजधानी अगरतलाः समृद्ध सांस्कृतिक विरासत

त्रिपुरा की राजधानी अगरतलाः समृद्ध सांस्कृतिक विरासत

त्रिपुरा की राजधानी
लॉकडौन में सब घर हैं इस दौरान में अपनी एक यात्रा को याद करता हूँ। एक बार मुझे पूर्वाेत्तर की यात्रा पर जाने का अवसर मिला। मिजोरम से शुरु हुई यह सांस्कृतिक यात्रा असम होते हुए त्रिपुरा में संपन्न हुई। मिजोरम की राजधानी आईजोल से सड़क मार्ग से सिलचर तो सिलचर से अगरतला की 254 किमी की दूरी रेलमार्ग से तय की। लगातार तीन दिन से जारी जोरदार बारिश में हम किसी तरह रेलवे स्टेशन पहुंचे। कुछ माह पूर्व ही आरंभ हुई सिलचर- अगरतला एक्सप्रेस अपनी मस्त चाल से   सुबह 8 बजे सिलचर से चलकर सायं 7 बजे अगरतला पहुंची। इसलिए राह में आने वाले हर स्टेशन को देखने, समझने का पर्याप्त समय और मौका था। सिलचर से चलकर यह गाड़ी ‘अरुणाचल’ नामक स्टेशन पर पहुंची तो मैं चौंका क्योंकि पूर्वाेतर में अरुणाचल नामक एक प्रदेश भी है। जानकारी मिली कि सिलचर के निकट वासिमपुर के निकट अरुणाचल एक स्थान है। इस राह के अन्य स्टेशनों के नाम है- सलचापाड़ा, कटखल जंक्शन, पंचग्राम, बदरपुर घाट, बदरपुर जंक्शन, रूपासिबरी, भंगा, चारगोला, करीमगंज जंक्शन, नीलम बाजार, कयास्थाग्राम, बराईग्राम, कनाई बाजार, पीटीकेडी, कालकाली घाट, चान्द खीरा बाबान, तिलभूम, सीबीजेड, नादियापुर, धर्म नगर, कुग्ट, मनु, अब्सा, एमजीकेएम, टीएलएमआर, जरना, जेजीएनआर, अगरतला।

हाल ही में बने अगरतला रेलवे स्टेशन का भवन अपनी कलात्मक साज सज्जा के कारण आकर्षित करता है तो स्टेशन परिसर में रंग बिरंगी रोशनी में चलते फव्वारों को  देखने का अपना एक अलग ही सुख है। सवारी को देखते ही बाहर इंतजार कर रहे ढ़ेरों टैक्सी वालें अखिल भारतीय अंदाज में आपको ‘लपकने’ के लिए कुछ भी करने को तैयार दिखाई दिए। जैसा कि हमारे दल को राजकीय विश्राम गृह ‘गीताजंलि’ पहुंचाने के लिए दो आपस में भीड़ ही गये।

त्रिपुरा सरकार का विश्राम गृह ‘गीताजंलि’ बेहद विशाल और  खूबसूरत है। चारों और हरियाली, विशाल वृक्ष, रंग बिरंगे फूलों की क्यारियां और इन सबसे बढ़कर सफाई और शांति। भूतल पर बनी कैन्टीन में हमारी रुचि के सात्विक भोजन और स्टाफ के अति विनम्र व्यवहार ने यहां बिताते तीन दिनों को जीवन के अविस्मरणीय बना दिया।

जहां तक 21 जनवरी 1972 को अस्तित्व में त्रिपुरा का प्रश्न है पूर्वोत्तर का इस छोटे से राज्य की क्षेत्रफल 10486 वर्ग किमी है। इसकी एक सीमा बंगलादेश से लगती है। इसके नाम को लेकर अनेक मत है यथा कुछ के मतानुसार राधाकिशोरपुर की देवी त्रिपुर सुंदरी के नाम पर इसका नाम त्रिपुरा हुआ तो कुछ त्रिपुरा नाम को तीन नगरों की भूमि होने से जोड़ते हैं। ऐसे लोग भी है जो इस नाम को मिथकीय सम्राट त्रिपुर से जोड़ते हैं। जनजातीय मान्यताओं के अनुसार त्रिपुरा शब्द ‘तुई’ (भूमि) और ‘प्रा’ (जल)के संयोग से प्रकट हुआ। क्योंकि वास्तव में त्रिपुरा ‘भूमि और जल का मिलन स्थल’ ही है। यहां अठारह आदिवासी जनजातीय समाज है जिन में त्रिपुरी, रियांग, नोआतिया, जमातिया, चकमा, हालाम, मग, कुकी, गारो, लुशाई प्रमुख हैं। समृद्ध सांस्कृतिक विरासत वाले इस राज्य में बंगला,  काकबराक के अतिरिक्त हिंदी भी  समझी एवं बोली जाती है। अतः किसी भी स्थान पर हमें अपनी बात समझाने अथवा उनकी समझने में कठिनाई नहीं हुई।

त्रिपुरा को राजे रजवाड़ों की धरती भी कहा जाता है। आज जब हर तरफ प्रदूषण है लेकिन त्रिपुरा को प्रदूषणविहीन राज्य माना जाता है। राज्य की राजधानी अगरतला के अतिरिक्त अमरपुर, अम्बासा, धर्मनगर, आनंदनगर, बेलोनिया,  कैलाशहर, उदयपुर, विशालगढ यहां के प्रमुख नगर है। हमें अगरतला से 177 किमी दूर कैलाशहर अनुमंडल के निकट अर्थात् उत्तरी त्रिपुरा में  स्थित ऊनाकोटि नामक स्थान पर भी जाना था लेकिन खराब मौसम के कारण नष्ट हुए तीन दिनों ने इस योजना को भी धो दिया। यहां यह विशेष रूप से स्मरणीय है कि शिव के सिर को उन्नकोटिश्वर काल भैरव कहा जाता है।

ऊनाकोटि पर्वतमाला के बारे में हमारे दल में शामिल श्री दीक्षित जी ने जानकारी दी कि यहाँ शिला पर उकेरे गए विभिन्न देवी-देवताओं के चित्र एवं भगवान शिव, गणेश, माँ दुर्गा, नंदी बैल की पत्थर की मूर्तियाँ देखने लायक हैं। 11वीं शताब्दी की बनी शिव और विशालकाय गणेश की मूर्ति विशेष रूप से दर्शनीय है। यह भी बताया गया कि यहाँ वसंत ऋतु में अशोक अष्टमी मेला लगता है।

हमारे मित्र श्री वीरेन्द्र परमार जी वर्षों पूर्वोत्तर में रहे हैं इसलिए उनका सुझावह था कि त्रिपुरा जाकर  त्रिपुरेश्वरी मंदिर  (जिसे स्थानीय भाषा में माताबाड़ी भी कहा जाता है) न जाना ठीक ऐसे ही जैसे गंगा में जाकर डुबकी न लगाना। हम एक टैक्सी से वहां पहुंचे तो वहां लगे बोर्ड पर उदयपुर लिखा देखकर चौंके। क्योंकि हमारी जानकारी में तो ‘सिटी ऑफ लेकस’ के नाम से प्रसिद्ध राजस्थान की ऐतिहासिक नगरी उदयपुर ही थी।

त्रिपुरेश्वरी को 51 शक्तिपीठों में से मानी जाती है इसे कूर्म पीठ भी कहा जाता है।  एक विशाल परिसर में छोटा सा  कछुए के आकार का मंदिर जिसका निर्माण 1501 में महाराजा धन्य माणिक्य ने करवाया था। बाद में  बिजली गिरने से क्षतिग्रस्त हुए इस मंदिर का जीर्णोद्वार 1681 में महाराजा राम माणिक्य ने करवाया। लेकिन उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में राधाकिशोर माणिक्य ने एक बार फिर  इस ऐतिहासिक मंदिर का जीर्णाेद्धार करवाया। मंदिर के दो द्वार हैं। अंदर स्थान बहुत कम हैं इसलिए द्वार पर खड़े होकर ही दर्शन किये जा सकते हैं। मछली के मुखमुद्रा वाली माता त्रिपुरेश्वरी वहां के राज परिवार की कुलदेवी कहलाती हैं। पास के सरोवर में मछलियों को डालने के लिए आटे की गोलियां बेचने वाली की भीड़ है जो श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित कर रहे थे। देश के अन्य धार्मिक स्थलों की तरह यहां भी प्रसाद और पूजा सामग्री बेचने वाले आपको घेर लेते हैं। दीपावली के अवसर पर इस स्थान पर भव्य मेला लगता है।

इसके बाद हमारा अगला पड़ाव अगरतला से 52 किलोमीटर दूर स्थित नीरमहल था। रूद्रसागर के बीचो बीच बना इस भव्य महल का निर्माण  यहां के राजा वीर विक्रम किशोर माणिक्य (1927-47)ने अपनी रानी  कंचन प्रभा के लिए करवाया था। महल के बाहर लगी पट्टिका के अनुसार इस महल का नामकरण गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर ने ‘नीरमहल’ किया।  अपने प्राकृतिक सौन्दर्य के कारण पर्यटकों का ध्यान आकर्षित करता है। मुगलकालीन का यह श्वेत महल चारों तरफ से हवादार है जिसके विशाल कक्ष बिना किसी संसाधन के वातानुकूलित अनुभव होता है। महल में शानदार  बाग उसकी शोभा को गुणित करता है। यहां मोटर बोट से पहुंचते है

अगरतला के अन्य दर्शनीय स्थलों में उज्जयंत पैलेस एक वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। 3 गुंबज वाले इस दोमंजिले महल की ऊंचाई 86 फुट है। बेशकीमती लकड़ी की नक्काशीदार भीतरी छत व इस की दीवारें देखने लायक हैं। महल परिसर में बना बगीचा ताजमहल की तरह ही प्रतीत होता है। कभी महाराजा वीर विक्रम माणिक का महल रहा यह स्थल अब त्रिपुरा राज्य संग्रहालय है। सुंदर रख रखाव के कारण इसका आकर्षण बरकरार है। वैसे इसके, अंदर चित्र लेना मना है।

जगन्नाथ मंदिर अपने अनूठे स्थापत्य के लिए विख्यात है। वहां उपस्थित स्वामी दरिद्र भंजन दास के अनुसार गौड़ीय मठ इस का प्रबन्धन देखता है। पुराना अगरतला का चौदह देव मंदिर जहां मूर्ति नहीं, सिहांसन पर चौदह चिन्ह हैं। इसकी स्थापना 1760 में महाराज कृष्ण माणिक ने अपनी राजधानी उदयपुर से यहां लाने के अवसर पर की थी।

भारत बंगला देश सीमा अगरतला पर भी सूर्यास्त के समय दोनो देशो के सीमा सुरक्षा बल के जवान समारोह पूर्वक अपने अपने राष्ट्रीय ध्वज उतारते हैं और अगली सुबह फिर फहराते है । एक शाम हम भी  ध्वजावतरण समारोह में शामिल हुए। लेकिन यहां न तो बाघा बार्डर जैसी भीड़ थी और न ही वैसा जोश, उत्साह, नारे। उस पार भी बहुत कम लोग। इसका कारण बंगलादेश से हमारी मित्रवत संबंध है जबकि पाकिस्तान लगातार अपनी हरकतों के कारण से तनाव बनाये रखता है। वहां तैनाव भिवानी हरियाणा का जवान उस समय प्रसन्न हुआ जब उसे पता चला कि मैं भी मूलतः हरियाणा से हूं और उसने अपने मोबाइल से मेरे साथ  एक फोटो भी ली।

संक्षेप में कहें तो कभी बंगाल का अंग रहे त्रिपुरा पर बंगाल की सभ्यता, संस्कृति का प्रभाव है तो प्रकृति की विशेष कृपा है। चहूं ओर हरियाली है।

 – विनोद बब्बर


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