आश्रम व्यवस्था के विकास का लक्ष्य (Aims of Ashram System)

आश्रम व्यवस्था के विकास का लक्ष्य (Aims of Ashram System)

 किसी भी व्यवस्था के प्रति जन-सामान्य में निष्ठा उत्पन्न करने के लिए उसे ईश्वर के साथ संबद्ध करना लाभदायक होता है। यही कारण है कि वर्णों के उद्गम को ब्रह्मा के साथ संबद्ध किया गया। इसी प्रकार आश्रम-व्यवस्था के प्रति निष्ठा उत्पन्न करने के लिए इसे मोक्ष की अवधारणा के साथ जोड़ दिया गया। परोक्ष रूप में आश्रम का उद्देश्य व्यक्ति को ऐसी क्रमिक स्थितियों प्रदान करना रहा है जिनके माध्यम से वह सतत् मोक्ष की ओर अग्रसर हो सके इस उद्देश्य के साथ-साथ आश्रम व्यवस्था का उद्देश्य व्यक्ति का संतुलित शारीरिक क्षमताओं का विकास करना भी रहा है। शनैः-शनैः होने वाले शारीरिक और बौद्धिक विकास के साथ व्यक्ति को दायित्व अर्थात् भूमिकाएँ सौंपने का कार्य भी आश्रम-व्यवस्था के माध्यम से संपादित किया गया। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि एक ओर आश्रम-व्यवस्था का लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति हेतु व्यक्ति को प्रेरित करना रहा है तो दूसरी ओर उसके व्यक्तित्व का संतुलित विकास।



आश्रमों के प्रकार या आश्रम विभाजन (Classification of Ashrams)

आश्रम को चार भागों में विभाजित किया गया है

1. ब्रह्मचर्य आश्रम (Brahmacharya Ashram)

2. गृहस्थ आश्रम (Grihastha Ashram )

3. वानप्रस्थ आश्रम (Vanprastha Ashram)

 4. संन्यास आश्रम (Sanyas Ashram) 

ऐसा प्रतीत होता है कि प्रारंभ में केवल तीन ही आश्रम -ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ का प्रावधान किया गया था। इन तीन आश्रमों में समान रूप से आयु का वितरण न होने तथा इस तथ्य के कारण कि वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश के साथ ही न तो व्यक्ति तत्काल सांसारिक मोहमाया से मुक्त हो पाता है और न ही संन्यास की अवस्था को प्राप्त कर पाता है, इसलिए अंतिम आश्रम-संन्यास आश्रम को भी जोड़ा गया। अंतिम आश्रम को वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम के रूप में दो भागों में विभाजित किया गया इस विभाजन के कारण स्वयमेव ही उपरोक्त दोनों समस्याओं का समाधान हो गया छान्दोग्य-उपनिषद. में केवल ब्रह्मचर्य आश्रम. गृहस्थ आश्रम और वानप्रस्थ आश्रम का उल्लेख मिलता है। मनुस्मृति में भी केवल तीन आश्रमों का प्रावधान पाया जाता है।


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