हमेशा कठोर दंड शासक को अलोकप्रिय बनाता है :सरयुसुत मिश्रा

आचार्य चाणक्य की दंड नीति के सूत्र|

सरयुसुत मिश्रा
आचार्य चाणक्य ने शासन-प्रशासन की सफलता और असफलता के लिए दंड नीति की कमी और अधिकता को जिम्मेदार बताया है. आचार्य चाणक्य इस बारे में शासकों को स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहते हैं कि यदि शासक अज्ञानता वश अथवा काम क्रोध द्वेष आदि के वशीभूत दंड का अनुचित रूप से प्रयोग करता है तो ऐसे शासक से आम लोगों के साथ ही वीतराग वानप्रस्थ एवं सन्यासी तक रुष्ट हो जाते हैं.

आचार्य चाणक्य के अनुसार दंड देते समय अपराध और दंड की कठोरता में सामंजस्य होना चाहिए.bआचार्य कौटिल्य शासन प्रशासन में केवल दंड को ही महत्व देने के पक्षधर नहीं हैं. उनका यह निश्चित मत है कि किसी भी अपराध पर सदैव कठोर दंड देने वाले शासक से जनता रुष्ट हो जाती है और ऐसे शासक से घृणा करने लगती है|

जबकि दंड में शिथिलता लाने पर जनता शासक का तिरस्कार करने लगती है. आचार्य चाणक्य मानते हैं कि शासक को सोच समझकर ही अर्थात अपराध के परिणाम स्वरूप यथा योग्य ही दंड देना चाहिए.

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जो शासक भली-भांति सोच समझकर दंड देने की प्रक्रिया पर चलता है उसका जनता न केवल सम्मान करती है बल्कि आम लोग भी धर्म सम्मत आचरण करने के लिए प्रेरित होते हैं.bशासक को हमेशा दंड देते समय सजगता से विचार करना चाहिए.

अपराध की गंभीरता और दंड में सामंजस्य होना चाहिए दंड ना तो बहुत कठोर दिया जाना चाहिए और ना ही दंड में शिथिलता बरती जाए. यदि शासक दंड देने में शिथिलता बरतता है तो तो इसके परिणाम स्वरूप जंगलराज फैलने की संभावना होती है. बड़ी मछली छोटी मछली को खाने लगती है.

शक्तिशाली व्यक्ति कमजोर का जीना दूभर कर देते हैं. समुचित दंड व्यवस्था के अभाव में बलशाली लोग अराजकता फैलाने लगते हैं.

शासक को हमेशा दंड की व्यवस्था त्वरित और अपराध के अनुरूप दंड सुनिश्चित करना चाहिए| दंड कठोर एवं अमर्यादित नहीं होना चाहिए| वही उसका सर्वथा अभाव भी नहीं होना चाहिए| आचार्य चाणक्य दंड नीति को समाज की सुरक्षा के लिए आवश्यक मानते हैं. समाज के सभी वर्ग दंड नीति के प्रभाव से ही अपने कर्तव्य कर्म का निर्वहन करने में ना तो उपेक्षा करते हैं और ना ही मर्यादा का त्याग करते हैं .



दंड नीति के आचार्य कौटिल्य के सूत्र लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में सटीक हैं| आज जिस तरह शासक दंड देने में अपने पद और अधिकार के अहंकार की संतुष्टि का प्रयास करते हैं, उससे शासन प्रशासन में न केवल जन विश्वास प्रभावित हुआ है, बल्कि लोगों में नाराजगी का भी प्रभाव दिखाई पड़ता है.

जब भी चुनाव होते हैं तब एक शब्द anti-incumbency मीडिया के हर फोरम पर दिखाई और सुनाई पड़ता है| किसी भी शासन व्यवस्था के विरुद्ध एंटी इनकंबेंसी जहां विकास के वायदों को पूरा नहीं करने से पैदा होती है, वहीं प्रशासनिक अदूरदर्शिता, अनिर्णय, घोषणाओं का क्रियान्वयन न होना, निर्देशों, प्रक्रिया और व्यावहारिकता में कमी कारण बनते हैं|

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने एक साक्षात्कार में बताया था कि जब भी वह जनहित की किसी भी मुद्दे पर अधिकारियों की कोई बैठक लेते हैं तो उसमें सीधा निर्णय या निर्देश बताने के बदले उनसे सुझाव मांगकर उन्हें इस प्रक्रिया में भागीदार बनाते हैं|

यही प्रजातंत्र में शासन में निर्णय की प्रक्रिया है. आजकल देखने में आ रहा है राज्यों की लीडरशिप शासन की प्रक्रियाओं को दरकिनार कर स्वयं निर्णय कर घोषणाएं करते हैं|

इन घोषणाओं को पूरा करने के लिए फिर सरकारी प्रक्रिया शुरू होती है. इसके पीछे सोच यह होती है कि निर्णय का सारा क्रेडिट लीडर को मिलना चाहिए| इसलिए सरकार में किसी को बताए बिना सबसे पहले लीडर के माध्यम से यह बात पब्लिक में जाएगी तब लीडर को क्रेडिट मिलेगा.

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आजकल आए दिन समाचार पत्रों में यह पढ़ने को मिलता है कि बैठक के दौरान वरिष्ठ अधिकारियों को हटाने के निर्देश दिए गए. जिले में बैठा अधिकारी हो या मुख्यालय में, उनकी जवाबदेही जरूर होती है लेकिन किसी घटना दुर्घटना के कारण जब उन्हें अचानक हटाया जाता है तो इससे प्रशासनिक व्यवस्था का अपमान होता है|

यह भी देखने मिलता है कि गलती छोटी सी है लेकिन लीडर के व्यक्तित्व को कड़ा निर्णय लेने वाला बताने के उद्देश्य से बड़े दंड दे दिए जाते हैं. कई बार तो ऐसा भी होता है लीडर को कोई संस्थान पसंद नहीं है तो उसे बंद कर दिया जाता है.

मध्यप्रदेश में राज्य सड़क परिवहन निगम को बंद कर कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई| आम लोगों को परिवहन के लिए निजी परिवहन के भरोसे छोड़ दिया गया| एक तरीके से इसमें जनता को दंड ही दिया गया. ऐसी और भी संस्थाएं बंद की गई हैं|

शासन प्रशासन में अनियमितता और भ्रष्टाचार के लिए कई बार वास्तविक रूप से जिम्मेदार दंड से बच जाते हैं| लेकिन किसी छोटे अफसर कर्मचारी को जरूरत से ज्यादा दंड दे दिया जाता है| ऐसे लोग बली का बकरा कहे जाते हैं| देश की न्यायिक व्यवस्था में भी न्याय समय पर मिलना दूर की कौड़ी है. स्थिति तो यह है हजारों लोग जिलों में अपने अपराध सिद्ध होने के पहले ही सजा भुगत रहे हैं, न्यायालयों में निर्णय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। कई बार तो ऐसी स्थिति भी बनती है कि अपराध में जितनी सजा है उससे अधिक समय तक व्यक्ति ने जेल काट ली है। ऐसी स्थिति दंड व्यवस्था और दंड नीति के उद्देश्य के विपरीत है।

आचार्य चाणक्य के दंड नीति के सूत्रों का पालन जो भी नेता करेगा उसे शासन प्रशासन संचालन में सफलता तो मिलेगी ही, साथ में जनता के बीच यश भी प्राप्त होगा|

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Priyam Mishra



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