क्रोध, काम, लोभ, मोह को क्या छोड़ा जा सकता है -दिनेश मालवीय

क्रोध, काम, लोभ, मोह को क्या छोड़ा जा सकता है
-दिनेश मालवीय

 

हम हमेशा से सुनते-पढ़ते चले आ रहे हैं, कि जीवन में कल्याण के मार्ग में क्रोध, काम, लोभ और मोह ही सबसे बड़ी बाधा हैं. इन्हें छोड़ने पर ही जीवन के परम आनंद की प्राप्ति हो सकती है, जो मनुष्य जीवन का लक्ष्य है. लगभग सभी धर्मों के ग्रंथों में मानव के इन भावों की बहुत निन्दा करते हुए मनुष्य को इन्हें त्यागने की ज़रूरत बतायी गयी है. एक तरह से सब इन बातों के पीछे लट्ठ लिए फिरते हैं. लेकिन धर्म से जुड़ी अनेक बातों की तरह इन शब्दों को समझने में हमसे बड़ी  भूल हुई हैं. महात्मा और ग्रंथ गलत नहीं कह रहे हैं, हम उन्हें गलत समझ रहे हैं. हो सकता है कि कुछ महात्मा भी इन्हें ठीक से समझ नहीं पा रहे हों. आखिर जबरन के महात्माओं कि भी कभी कमी नहीं रही.

थोड़ा भी स्वतंत्र रूप से सोचें, तो यह प्रश्न उठता है कि यदि इन भावों की ज़रूरत नहीं है, तो मनुष्य में ये हैं ही क्यों? मनुष्य को बनाने वाले ने क्या ये भाव बिला वजह उसके भीतर डाल दिए हैं? श्रृष्टि का निर्माण करने वाला ऐसा महान कलाकार है, जिसने कुछ भी अनावश्यक नहीं बनाया. धूल का कण या कोई तिनका भी, जो हमें व्यर्थ दिखाई देता है, उसका भी कहीं कोई उपयोग है. आइये, इस विषय को ठीक  से नहीं समझे जाने के बुरे परिणामों पर कुछ विस्तार से चर्चा करते हैं.

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आप किसी भी संत-महात्मा के पास जाइए, वह यही कहता है कि क्रोध को त्याग दो, लोभ को त्याग दो, मोह को त्याग दो, काम को त्याग दो. लेकिन मनुष्य इन भावों के साथ ही जन्म लेता है, लिहाजा उनको पूर्ण रूप से त्यागा जाना कैसे संभव है? होता यह है कि इस जगत की अशांति और भयावहता से पीड़ित इंसान संतों के पास मन की शांति के लिए जाता है. वह उनकी इन भावों को छोड़ने की बात तो लेता है, लेकिन लाख कोशिशें करने के बाद भी इन्हें पूरी तरह छोड़ नहीं पाता. लिहाजा वह बहुत आत्मग्लानि का शिकार होकर निराश हो जाता है. वह आत्महीन और आत्मनिंदक होकर रह जाता है.

दरअसल महात्मा गण और ग्रंथ इन भावों को छोड़ने की बात इसलिए करते हैं, क्योंकि उन्हें मनुष्य का स्वभाव मालूम है. उससे जितना कहा जाता है, उसका वह एक अंश ही पालन कर पाता है. उनका ऐसा मानना है कि यदि इन्हें पूरी तरह छोड़ने को कहा जाएगा, तो सुनने वाला कुछ अंश तक तो इस बात को आत्मसात कर ही लेगा. इस बात को वे भी जानते हैं कि इन भावों को पूरी तरह त्यागना संभव नहीं है. इनका त्याग करने से श्रृष्टि का क्रम ही रुक जाएगा. उनका आशय सिर्फ इतना है कि भावों में संतुलन होना चाहिए. प्रसंग और स्थिति के अनुसार जब जितना आवश्यक हो, इनका उपयोग कर लेना चाहिए. इनसे मनोग्रस्त नहीं होना चाहिए. इनमें से किसी भी भाव को एकतरफा हबी नहीं होने देना चाहिए.

सही समय पर क्रोध करना बहुत आवश्यक है. यदि कोई आपके घर में घुसकर आपके परिवार को प्रताड़ित करने लगे और उन्हें अपशब्द कहने लगे, तो आपको क्रोध करना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है. क्रोध का आवेश नहीं आएगा, तो आप उस आततायी से परिवार की रक्षा कैसे कर पाएँगे. हाँ, इतना ज़रूर है कि प्रसंग समाप्त हो जाने पर आप पूरी तरह सामान्य हो जाएँ.

यही बात काम के विषय में भी लागू होती है. यह सारा संसार काम से ही उत्पन्न हुआ है और काम में ही जी रहा है. यदि काम का अंत हो जाए, तो श्रृष्टि का संचालन ही रुक जाएगा. काम ही मनुष्य को परिवार बनाने और उसे पोषित करने के लिए प्रेरित करता है. हालाकि शास्त्रों में “काम” शब्द को हमेशा सेक्स के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए. अनेक प्रसंगों में काम का अर्थ कामना भी है. जब कहा जाता है कि सब काम छोड़कर ईश्वर का भजन करो, तो इसका मतलब है, सभी कामनाओं को छोड़कर निष्काम भाव से भजन करो.

अब लोभ की बात करते हैं. इस सम्बन्ध में कहा गया है कि श्रृष्टि में सभी प्राणी की आवश्यकता को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं, लेकिन एक व्यक्ति के लोभ को पूरा करने के लिए भी सारे संसाधन कम पड़ जाते हैं. लोभ भी अनेक तरह के होते हैं. कुछ लोभ जीवन के लिए बहुत ज़रूरी हैं. परिवार के लिए सुख-संपत्ति अर्जित करने का लोभ, यश पाने का लोभ, मान-सम्मान पाने का लोभ, ज्ञान अर्जित करने का लोभ. इस तरह लोभ अपने आप में बुरा नहीं है. सिर्फ उसकी सीमा को समझकर उस पर नियंत्रण रखना चाहिए.

मोह की बात करें तो इसके बिना भी संसार नहीं चल सकता. माता-पिता को संतानों से मोह नहीं होगा, घर-परिवार, संबंधियों आदि से यदि मोह नहीं हो तो संसार का क्रम कैसे चल सकता है?

कुल मिलाकर बात संतुलन की है. हम इन चार भावों के अलावा भी मन के सारे भावों में यदि संतुलन बैठा सकें, तो जीवन सही दिशा में आगे बढ़ते हुए अपने लक्ष्य पर पहुँच सकता है. सच पूछिए तो संतुलन ही जीवन है. मनुष्य के भीतर सत्व, तम और रज ये तीन गुण हैं. जो व्यक्ति इन तीनों गुणों में संतुलन स्थापित कर लेता है, वह अपने मार्ग से कभी विचलित नहीं होता.

संतों और ग्रंथों के शब्दों के पीछे छिपे भाव को समझने की कोशिश की जानी चाहिए. वे इन्हें छोड़ने के लिए इसलिए कहते हैं ताकि आप कम से कम उन्हें सीमित और नियंत्रित कर सकें. हालाकि यदि आप उनकी बात को लिटरली लेंगे तो मुसीबत में पढ़ना तय है, क्योंकि ये जीवन के मूल भाव हैं, जिन्हें आप कभी पूरी तरह छोड़ ही नहीं पाएँगे. नहीं छोड़ पाने से आत्मग्लानि के शिकार होकर कुंठित और अवसादग्रस्त हो जाएँगे. लिहाजा क्रोध, कम लोभ और मोह को छोड़ने के बजाय इनमें संतुलन बैठाने का प्रयास करें.

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