अंतिम संस्कार(antim sanskar) के समय वेद , पुराण , गीता के अनुसार करें मंत्र प्रार्थना : अन्त्येष्टि प्रार्थना

अंतिम संस्कार(antim sanskar) के समय वेद , पुराण , गीता के अनुसार करें मंत्र प्रार्थना : अन्त्येष्टि प्रार्थना

अन्त्येष्टि क्रिया के समय दाह – संस्कार से पूर्व अथवा पश्चात् मृत्यु की अनिवार्यता, शरीर की अनित्यता और आत्मा की अमरता के विषय में, निम्नलिखित प्रकार की चर्चा करके परमेश्वर से मोक्ष प्राप्ति की प्रार्थना करनी चाहिए।

जातस्य हि ध्र्रुवो मृत्युध्र्रुवं जन्म मृतस्य च।

तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥  गीता २. २७

 

अर्थ – इस संसार में जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु निश्चित है और जिसकी मृत्यु हो गयी है, उसका जन्म भी निश्चित रूप से होगा। इसलिए जो निश्चित रूप से होने वाला है, उसका शोक नहीं करना चाहिए।

न जायते म्रियते वा कदाचिन् 

नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।

अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो 

न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥ गीता २. २०

अर्थ – आत्मा का न कभी जन्म होता है और न कभी इसकी मृत्यु होती है। यह सदा से इसी रूप में अजन्मा, शाश्वत और पुरातन है। शरीर के मर जाने पर भी यह नहीं मरता। यह सोचकर दुःखी नहीं होना चाहिए।

 

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय 

नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।

तथा शरीराणि विहाय जीर्णानि

अन्यानि संयाति नवानि देही॥          गीता २. २२

 

भावार्थ – जिस प्रकार मनुष्य फटे – पुराने वस्त्र उतार कर नवीन वस्त्र धारण कर लेता है, उसी प्रकार आत्मा पुराने शरीर को छोडक़र नया शरीर धारण कर लेता है।यह सोचकर दुःखी नहीं होनाचाहिए।गीता के इस उपदेश से यह निश्चित हो गया कि मृत्यु निश्चित है। यह सोचकर हमें उत्तम कर्म करने चाहिएं, परन्तु आश्चर्य है कि–

 

अहन्यहनि भूतानि गच्छन्ति यम-मन्दिरम्।

शेषाः स्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम्॥ 

महाभारत वनपर्व ३१३. ११६

 

भावार्थ – प्रतिदिन मनुष्य मरते हैं। उनके सगे सम्बन्धी निष्प्राण शरीर को शमशान में ले जाकर अन्त्येष्टि संस्कार कर देते हैं और घर आकर यह सोचते हैं कि हम सदा इस शरीर के साथ जीवित रहेंगे। इससे बड़ा कोई आश्चर्य नहीं।

महाभारत में युधिष्ठिर के इस कथन से मृत्यु की अनिवार्यता मानकर धर्म का आचरण करना चाहिए। इस संसार में भोग निश्चित हैं। उससे अधिक कोई भोग प्राप्त नहीं कर सकता। संसार का सबसे धनवान् व्यक्ति भी एक साथ दो बिस्तरों पर नहीं सो सकता। दो वाहनों में एक साथ सवारी नहीं कर सकता। दो समय का खाना एक समय में नहीं खा सकता। फिर पाप, छल, कपट, धोखाधड़ी क्यों करें।यह सोचकर धर्म का आचरण करना चाहिए। क्योंकि–

 

एक एव सुहृद् धर्मो निधनेऽप्यनुयाति यः।

शरीरेण समं नाशं सर्वमन्यद्धि गच्छति॥  मनुस्मृति ८. १७

भावार्थ – केवल एक धर्म ही ऐसा है जो मरने के बाद आत्मा के साथ जाता है। अन्य सब कुछ शरीर के साथ ही नष्ट हो जाता है।सभी साधन यहीं रह जाते हैं। भर्तृहरि ने कहा है कि –

 

धनानि भूमौ पशवश्च गोष्ठे 

नारी गृहद्वारे जनाः शमशाने।

देहश् चितायां परलोकमार्गे 

कर्मानुगो गच्छति जीव एकः॥          वैराग्यशतक

भावार्थ – धन भूमि में गड़ा रह जायेगा या बैंक में पड़ा रह जाएगा। पशु अपने स्थान पर बन्धे रह जायेंगे। मृत शरीर के साथ पत्नी घर के द्वार तक और सगे सम्बन्धी शमशान घाट तक ही जायेंगे। यह शरीर चिता में जल जाएगा। परलोक मार्ग में जीव के साथ केवल धर्म ही जायेगा। यजुर्वेद में ईश्वर उपदेश देता है कि –

 

ओ३म्।वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम्।

ओ३म् क्रतो स्मर।क्लिबे स्मर।कृतस्मर॥  यजुर्वेद ४०. १५

भावार्थ – तुम्हारा आत्मा अपार्थिव और अमर है तथा यह शरीर भस्म होने वाला है। इसलिए हे कर्मशील पुरुष ! तू अपने कर्मों को ध्यान से देख कि कौन से कर्म, धर्म के अनुकूल हैं और कौन से प्रतिकूल। कर्मों को स्मरण करता हुआ सर्वरक्षक परमेश्वर का ध्यान कर, क्योंकि जीवन का सच्चा सुख प्रभु दर्शन से ही सम्भव है।

इसीलिए कठोपनिषद् ५. १२ में कहा है कि –

 

एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा 

एकं रूपं बहुधा यः करोति।

तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्

तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्॥ 

भावार्थ – वह ईश्वर संसार को वश में रखने वाला है। वह कहीं दूर नहीं अपितु सब प्राणियों की आत्मा में बैठा हुआ है। एक रूप को वही अनेक रूपों में बदलता रहता है। आत्मा में विराजमान उस परमेश्वर को जो धीर पुरुष देख लेते हैं, उन्हें ही निरन्तर सुख मिलता है; दूसरों को नहीं।

 

इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति नो चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः।

भूतेषु भूतेषु विचिन्त्य धीराः प्रेत्य अस्माल्लोकादमृता भवन्ति॥                      केन – उप. २. ५

भावार्थ – यदि इस जन्म में परमेश्वर को जान लिया तो समझो जीवन का कल्याण हो गया और यदि उसको नहीं जाना तो सब व्यर्थ हो गया। इसलिए धीर, बुद्धिमान् जन प्रत्येक पदार्थ में ईश्वर की सत्ता का अनुभव करके उसको प्राप्त करते हैं और इस संसार को छोडऩे के बाद अमर हो जाते हैं।

अन्त में सब उपस्थित जन निम्नलिखित प्रार्थना करें–

 

ओ३म्।असतो मा सद् गमय।तमसो मा ज्योतिर्गमय।

मृत्योर्मा अमृतं गमय॥ 

शतपथब्राह्मण १४. ४. १

भावार्थ – हे परमेश्वर! हमें असत्य से हटाकर सत्य के मार्ग पर चलाओ। अज्ञान रूपी अन्धकार से हटाकर ज्ञान के प्रकाश में ले जाओ और मृत्यु से मुक्त करके अमर बना दो।

 

ओ३म् शान्तिः। ओ३म् शान्तिः। ओ३म् शान्तिः।

 

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