भवन निर्माण हेतु वास्तुशास्त्र के निर्देश

भवन निर्माण हेतु वास्तुशास्त्र के निर्देश-
साधारण भवन
भूमि का चयन करते समय दिशा एवं आकार का ध्यान सर्वप्रथम रखना चाहिए। चतुष्कोण अथवा समकोण, दीर्घ चतुष्कोण वाले भूखण्ड पर भवन निर्माण सब प्रकार से शुद्ध एवं मंगलदायक होता है।

विशाल स्थल ऐश्वर्यकारक होता है, किन्तु स्थल किसी भी दशा में कटा फटा नहीं होना चाहिए।

त्रिभुज आकृति वाले भूखंड का चयन भवन निर्माण के लिए कभी नहीं करना चाहिए, यह अशुद्ध होता है।

दो विशाल भूखण्डा के मध्य स्थित एक छोटा व सकरा भूखण्ड भी उत्तम नहीं होता है, उस पर निर्मित भवन से अधिक कष्ट होते हैं।

उत्तर दक्षिण दिशाओं में भूखण्ड की लम्बाई की अपेक्षा पूर्व-पश्चिम की लम्बाई अधिक हो तो अधिक श्रेष्ठ होता है।

शयन करते समय सिर पूर्व या दक्षिण दिशा में रखकर शयन करना ही श्रेष्ठ होता है। किसी भी स्थिति में पैर दक्षिण अथवा पूर्व दिशा की ओर नहीं होना चाहिए।

छत पर पानी की टंकियां आदि दक्षिण-पश्चिम दिशा में ही रखनी शुद्ध होती हैं। उत्तर व ईशान कोण में इन्हें नहीं रखना चाहिए।

रसोई घर का निर्माण सदैव अग्नि कोण में करना उत्तम होता है। विशेष परिस्थिति में पूर्व अग्निकोण के समीप या दक्षिण अग्निकोण के समीप किया जा सकता है।

पूजा स्थल का निर्माण सदा ईशान कोण में करना उत्तम होता है। विशेष परिस्थिति में पूर्व अग्निकोण के समीप या दक्षिण अग्निकोण के समीप किया जा सकता है।

भवन की पूर्व दिशा में ऊंचे वृक्ष और ऊंचे भवन नहीं होने पर शद्ध होता है। पश्चिम दिशा में वृक्ष लगाना उत्तम होता है। वास्तु राजवल्लभ 1/28 के मुताबिक भवन के बाहर वृक्ष लगाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि वृक्ष भवन से इतनी दूरी पर लगाये जाएं कि प्रातः नौ बजे से लेकर तीसरे पहर तक पेड़ की छाया मकान पर न पड़े।

मकान के पास कांटे वाले पेड़ से बेर की झाड़ी, कटारि, अकोल्ह तथा दूधवाले पेड़ जैसे महुआ आदि नहीं लगाने चाहिए। अगर इन्हें कटवाया न जा सके तो मकान और इनके बीच में शुभदायक वृक्ष शाल, अशोक, पुन्नाग, मौलश्री लगा देना चाहिए। चम्पा, गुलाब, केला, चमेली, केतकी, फलिनी, नीम, अशोक, केसर, जयन्ती; चन्दन, अपराजिता, नारियल, बेल, आम, अंगूर आदि वृक्ष लगायें। घर में तुलसी का पौधा अवश्य लगाना चाहिए, यह कृमिनाशक है तथा दूषित वायु को शुद्ध करता है।

 

व्यावसायिक कार्यालयों के निर्माण- आफिस निर्माण करते समय निम्न लिखित बातों का अवश्य ध्यान रखें-
प्रशासनिक कक्ष पूर्व दिशा में हों।

चेयरमैन का कक्ष उत्तर-पूर्व दिशा में हो।

एकाउंटस विभाग पश्चिम दिशा में हो।

आफिस का पूजाघर ईशान दिशा में हो।

आफिस की लाबी बीच में होनी चाहिए।
कारखाने-
  1. मुख्य द्वार उत्तर, पूर्व अथवा पश्चिम दिशा में हो।
  2. यदि मुख्य द्वार उत्तर दक्षिण में रखना पड़े तो दक्षिण द्वार के ठीक सामने उत्तर दिशा में भी एक एक द्वार अवश्य रखें।
  3. फैक्ट्री का बायलर सदैव दक्षिण पूर्व दिशा में होना चाहिए।
  4. जैनरेटर पश्चिम-दक्षिण में लगाएं।
  5. जहां तक संभव ही, मशीन स्थापित करते उसकी दिशा पश्चिम तथा कारीगर का मुंह पूर्व की ओर होना चाहिए।
होटल-रेस्तरां आदि-
  1. आवासीय होटल निर्माण के लिए भूमि का चयन करते समय विशेष ध्यान रखें कि वह मैग्नेटिक कम्पास से सही दिशाओं में आये। उसके चारों कोण वास्तुशास्त्र के अनुसार हों
  2. होटल, जलपानगृह या रेस्तरां का मुख्यद्वार उत्तर, पूर्व अथवा ईशान की ओर रहे।
  3. पूर्व से पश्चिम का तथा उत्तर से दक्षिण का भाग अधिक ऊंचा बनवायें। उत्तर पूर्व हल्का रखें।
  4. जलपान गृह या होटल का किचन आग्नेय कोण में रखे। यदि ऐसा संभव न हो तो वायव्य कोण में रख सकते हैं।
  5. रिसेप्शन रूम उत्तर, पूर्व तथा स्वीमिंग पूल, तालाब, फव्वारे आदि उत्तर पूर्व या ईशान कोण में बनवाये।
  6. होटल-भोजनालय की व्यवस्था पश्चिमी क्षेत्र में करें।

PURAN DESK



हमारे बारे में

न्‍यूज़ पुराण (PURAN MEDIA GROUP)एक कोशिश है सत्‍य को तथ्‍य के साथ रखने की | आपके जीवन में ज्ञान ,विज्ञान, प्रेरणा , धर्म और आध्‍यात्‍म के प्रकाश के विस्‍तार की |
News Puran is a humble attempt to present the truth with facts. To spread the light of knowledge, promote scientific temper, inspiration, religion and spirituality in your life.


संपर्क करें

0755-3550446 / 9685590481



नवीनतम पोस्ट



समाचार पत्रिका


श्रेणियाँ