क्या सचमुच हम भीड़ में अकेले ही हैं ?

क्या सचमुच हम भीड़ में अकेले ही हैं ?
सुसाइड के किसी मामले के बारे में सुनती हूँ सबसे पहले यही सवाल मन में आता है कि क्यों ? आखिर क्यों यह कदम उठाया होगा ? आमतौर पर ऐसी ख़बरें अखबारों में पढ़ती हूँ तो कारण भी जानने को मिलता है | कई बार कारण भीतर तक हिला देने वाले होते हैं तो कई बार बहुत मामूली सी वजह होती है अपनी ही जान ले लेने की | लेकिन वे सब अनजाने चेहरे होते हैं इसीलिए कुछ दिन में एक आम ख़बर की तरह ऐसे समाचार भी भूल जाती हूँ |

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बीते कुछ समय में आभासी दुनिया में कुछ जाने-पहचाने या यूँ कहूं कि वास्तविक तौर पर अनजाने चेहरों ने आत्महत्या जैसा कदम उठाया | हालाँकि इनमें से कोई भी मेरे दोस्तों की फ़ेहरिस्त में नहीं रहे | पर ऐसी कोई ख़बर मिलते ही लगता है एक बार उनकी प्रोफ़ाइल देखूं | दुनियाभर की व्यस्तताओं के बीच मैं उनमें से कुछ चेहरों की आभासी दीवार पर पहुँचती भी हूँ | पता तो होता ही है अब कुछ नहीं किया जा सकता | पर लगता है कि शायद उस आखिर क्यों का जवाब मिल जाए, उनके लिखे शब्दों में | तभी तो उनकी इस आभासी वॉल पर मेरे मन और आँखों को तलाश होती है, सोच के उस सिरे की जो अगर आस -पास कोई और पकड़ता दिखे तो मैं भागकर झटक दूँ उसे | लेकिन कुछ समझ नहीं आता | फ़ोटो, अपडेट्स, लेख, कविता या शेयर किये गए पोस्टस,अधिकतर बहुत साधारण से ही होते हैं | कोई अंदाज़ नहीं लगा पाती हूँ कि ऐसा क्या असामान्य चल रहा होगा उनके मन जो यहाँ तो प्रतिबिंबित नहीं हुआ पर उनके जीवन की तस्वीर हमेशा के लिए धुंधली हो गई | तब कई ऐसे सवाल उठते हैं मन में.....

क्या सचमुच हम भीड़ में अकेले ही हैं ?

भीतर ऐसा क्या रिसता है कि आभासी हो या असल दुनिया किसी को भनक तक नहीं लगती ?

ज़िन्दगी का हर रंग और उतार-चढ़ाव देख चुके लोग भी कैसे यूँ हार मान लेते हैं ?

आख़िर ऐसा क्या छूट रहा है कि हम ज़िन्दगी को नहीं पकड़ पा रहे ?

ऐसी मायूसी क्या इतना अँधेरा लिए होती है कि उजाले की एक किरण भी ना दिखे ?

हम मन की कहना भूल गए हैं या कोई सुनना नहीं चाहता ?

कोई हमसे कुछ पूछता नहीं या हम ही ज़िन्दगी में किसी को दाख़िल नहीं होने देते ?


ऐसे कितने ही सवाल मन को भेदते हैं | ये प्रश्न लाजिमी भी हैं | क्योंकि समाज का कोई भी वर्ग ( महिला,पुरुष, बच्चे ) (अमीर,गरीब , ग्रामीण, शहरी )..... ( युवा, बुजुर्ग ) हो | लगता तो ऐसा ही है कि ज़िन्दगी पहले आसान ही हुई है | या फ़िर दुनियाभर की सहूलियतों के बीच निराशा की कुछ ऐसी वजहें आ धमकी हैं जो बस तोड़ना जानती हैं | हमारे आपसी संवाद की कड़ी को तोड़ना, हमारे रिश्तों को तोड़ना, हमारे आत्मबल को तोड़ना | ऐसे में हमारे परिवेश और परिस्थितियों को देखते हुए में जितना सोच-समझ पा रही हूँ, यह टूटन तो यहाँ भी नहीं रुकेगी | रुके भी कैसे ? इसके लिए कोई विशेष प्रयास भी नहीं किये जा रहे | प्रयास किये भी कैसे जायें ? या तो हम सब कुछ समझ रहे हैं या कुछ भी समझ ही नहीं आ रहा | यानि वही सवालों के घेरे और नैराश्य का कुचक्र | क्यों ?????

डॉ. मोनिका शर्मा


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