अर्जुन ने एक बार फिर हनुमान जी से मुँह की खाई -दिनेश मालवीय

अर्जुन ने एक बार फिर हनुमान जी से मुँह की खाई

-दिनेश मालवीय

संत तुलसीदास नेरामचरितमानस में लिखा है कि "अस कोऊ नहिं जन्माजग नाहीं, प्रभुता पायी जाहिं मद नाहीं". यानी दुनिया में आज तक ऐसा कोई नहीं जन्मा, जिसे प्रभुता पाकर मदन हुआ हो. संसार के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन के साथ भी ऐसा ही हुआ.

एक बार हनुमानजी के हाथों गर्व हरण होनेके प्रसंग की चर्चा 'न्यूजपुराण' में कल ही की गयी थी. इसके बाद भी अर्जुन का गर्व कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था. इस कारण हनुमानजी को श्री कृष्ण की सहायता से एक बार और उसके गर्व का दमन करना पड़ा.

एक बार अर्जुन धनुष कोटि तीर्थ पहुँचा. वहाँ समुद्र में स्नान करने के बाद उसने सोचा कि श्रीरामने पत्थरों का जो पुल बनाया था, वह तो  अब बचा ही नहीं है, लेकिन अगर उन्होंने वाणों का पुल बनाया होता, तो वह अब तक अस्तित्व में होता. अगर उस वक्त मैं होता, तो वाणों का ही पुल बना देता. रामजी की सेना उस पर चढ़कर आसानी से समुद्र पार कर जाती.

यह विचार करते हुए अर्जुन जा ही रहा था कि उसे हनुमानजी मिल गये. वह रथ से उतर पड़ा. उसने यही बात हनुमानजी से पूछी कि रामजी वाणों का पुल क्यों नहीं बना दिया? मैं होता तो वाणों का ही पुल बनाता. उन्होंने बिला वजह इतनी मेहनत की.

हनुमान जी ने कहा कि अर्जुन अगर तुमने वाणों का पुल बनाया होता, तो वह मेरे अँगूठे का भार भी नहीं सह पाता, सेना की तो बात ही छोडो. अर्जुन का अहं बहुत आहत हुआ. उसने कहा कि चलिए मैं अभी वाणों का पुल बना देता हूँ. आप उसे तोड़कर दिखाइये. हनुमानजी ने कहा कि यदि पुल टूट गया तो तुम क्या करोगे? उसने कहा कि मैं जलती अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगा. लेकिन यदि पुल न टूटा तो आप क्या करेंगे? हनुमानजी ने कहा कि उस स्थिति में तुम जो आज्ञा दोगे मैं उसका पालन करूँगा. हनुमान जी ने कहा कि समुद्र पर तो तुम पुल बना ही नहीं सकोगे, लिहाजा सामने जो छोटी-सी नदी है, उसी में पुल बना दो.

अर्जुन ने उस नदी पर पुल बनाकर हनुमानजी से उसके पार जाने को कहा. हनुमानजी ने बाएं पैर के अँगूठे से उस पुल को दबाया तो वह चरमराकर टूटकर नदी में समा गया. अर्जुन को बहुत शर्मिंदगी हुयी. उसने चिता तैयार कर अग्नि प्रवेश की तैयारी की.

हनुमानजी ने उसे बहुत समझाया कि वह ऐसा न करे, लेकिन वह अड़ गया. ऐसी स्थिति में हनुमानजी ने श्रीकृष्ण का ध्यान किया. भगवान ब्रहमचारी रूप में वहाँ प्रकट हुये. उन्होंने पूरी बात सुनी और कहा कि दो लोगों के बीच लगी शर्त में कोई तीसरा साक्षी होना जरूरी है. आप दोनों अपनी शर्त वापस लीजिये. दोनों ने ऐसा ही किया.

फिर भगवान ने अर्जुन से कहा कि नदी पर फिर से पुल बनाओ. उसने ऐसा ही किया. भगवान ने हनुमानजी से उसपर चलने को कहा. हनुमानजी पूरी ताकत से उस पर चढ़े और उसे दबाया, लेकिन वह ज़रा भी नहीं हिला. यह देखकर हनुमानजी और अर्जुन दोनों चकित रह गये. जो पुल हनुमानजी के अँगूठा दबाने भर से चूर-चूर हो गया था, वही पुल ज़रा भी नहीं हिला.

हनुमानजी ने नीचे देखा तो पाया की श्रीकृष्ण का सुदर्शन चक्र उनके नीचे लगा था, जो पुल को सुरक्षा दिए हुए था. हनुमानजी ने ब्रह्मचारी रूप मे आये श्रीकृष्ण को प्रणाम किया. भगवान अपने असली रूप में सामने आये और दोनों का अभिवादन स्वीकार किया. इस तरह अर्जुन का गर्व हनुमानजी ने एक बार फिर तोड़ दिया.

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