अर्जुनकी प्रार्थना

अर्जुनकी प्रार्थना

 

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त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।

वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥

वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।

नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥ (श्रीमद्भगवद्गीता ११ । ३८-३९)

आप आदिदेव और पुरातन पुरुष हैं; इस जगत्के परम निधान और जाननेवाले, जाननेयोग्य तथा परमधाम हैं। अनन्तरूप! आपसे यह समस्त विश्व व्याप्त (परिपूर्ण) है। आप वायु, यमराज, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, जीवमात्रके स्वामी ब्रह्मा और ब्रह्माके भी पिता हैं। आपके प्रति सहस्र-सहस्र नमस्कार! नमस्कार!! आपके प्रति पुनः बार-बार नमस्कार ! नमस्कार !!

 

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः ।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥७॥

(श्रीमद्भगवद्गीता २। ७) श्रीकृष्ण! कार्पण्यदोषसे मेरा स्वभाव मलिन और धर्म के निर्णयमें मेरा चित्त मोहित हो गया है। अतः मैं आपसे पूछ रहा हूँ-मेरे लिये जो कल्याणमय निश्चित साधन हो, वह मुझे बतलाइये; मैं आपका शिष्य और शरणागत हूँ, मुझ दीनको शिक्षा दीजिए।


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