आर्टिफिशियल व्यक्तित्व बनाम रियलिटी … P ATUL VINOD

आर्टिफिशियल व्यक्तित्व बनाम रियलिटी

Fake Vs Genuine People

Why would a person adopt a fake personality?
P ATUL VINOD  

दुनिया में ज़्यादातर लोगों ने अपनी पर्सनेलिटी को आर्टिफिशियल बना लिया है| ये कृत्रिमता तकलीफ का कारण है| कृत्रिम व्यक्तित्व से न तो खुद का भला होता है न समाज और देश, दुनिया का| ये प्रकृति सहजता में भरोसा करती है| विश्व न तो आपको धर्म देता है न अधर्म| धर्म इसका स्वाभाविक गुण है| इसी तरह दुनिया हमे नैतिकता सिखाती है न अनैतिकता| न तो धरती प्रेम का संदेश देती है न घृणा का| वजह क्या है? जब धरती ने प्रेम, करुणा, कृतज्ञता, दया और धर्म विकसित नहीं किये तो फिर ये कहाँ से आये? इनकी ज़रूरत क्यूँ पड़ी?

प्रेम, करुणा, कृतज्ञता, दया और धर्म हमने विकसित किये क्यूंकि हम अननेचुरल हो गए| हमने इनका निर्माण इनके विरोधी गुणों के इलाज के लिए किया| दरअसल दुनिया में जो भी कुछ नेचुरल है वो धर्म है, जो अननेचुरल है वो अधर्म| हमे अच्छाई की ज़रूरत इसलिए पडती है क्यूंकि हम ज्यादा पाने के लिए लालच, बेईमानी, चोरी, हिंसा का सहारा लेते हैं, ऐसा करके हम अपने अंदर अप्राकृतिक बदलाव ले आते हैं जो कष्टदायी होता है| इनसे मुक्त होने के लिए हमें अच्छाई, दया, ईमानदारी, प्रेम, दान की ज़रूरत पड़ती है| इनका अस्तित्व तभी तक है जब तक इनके विपरीत का अस्तित्व है|

जो व्यक्ति बुरा नहीं है उसे अच्छाई की ज़रूरत ही नहीं होगी| वस्तुतः अच्छाई की खोज का अर्थ है हममें बुराई है| और जब हम बुराई से पीछा छुड़ाकर अच्छाई की और जाने की कोशिश करेंगे तो न तो हम अच्छे बनेगे न ही बुरे को छोड़ सकेंगे| होगा ये कि हम अच्छे का चोला पहन लेंगे| हम दयालु और दानवीर बनने का ढोंग करेंगे| हमारा व्यक्तित्व कृत्रिम हो जायेगा क्यूंकि ये हमारी सहज वृत्ति नहीं होगी| तब फिर हम क्या करें? क्या हमें अच्छा, दयालु, प्रेमपूर्ण नहीं होना चाहिए? होना चाहिए तो इसके लिए प्रयास भी ज़रूरी होगा? प्रयास से कृत्रिम व्यक्तित्व बनेगा|

आपको बनने की ज़रूरत नहीं, आपको ये देखने की ज़रूरत है कि आप बुरे क्यूँ बने? बुराई से लगाव की क्या वजह है? आप अपनी  बुराई की तह में जाएँ, उसके कारण को समझें, कारण ख़त्म बुराई ख़त्म| जब बुराई नहीं है तो अच्छाई अपनाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी| बुराई के बिना आप जैसे होंगे प्राकृतिक होंगे| जो भी प्राकृतिक है उसे आप अच्छाई, धर्म, नैतिक कुछ भी कह सकते हैं| दरअसल हमने नेचुरल स्टेट को एक पक्ष बना दिया| जबकि वो हमारी न्यूट्रल स्टेट है|

Personal-develop-Newspuranएक तरफ बहुत बुराई (लालच, बेईमानी, लूट, भ्रष्टाचार) है, बीच में सहज रूप में अच्छाई है जिसमें थोड़ी मात्रा में बुराई शामिल है जो सहज मानवीय स्वभाव है| और दूसरी तरफ बहुत अच्छाई, बहुत आनंद, बहुत सुख, बहुत प्रेम, बहुत दया, बहुत करुणा बहुत बुराई <(अच्छाई+ बुराई)> बहुत अच्छाई| हम प्राकृतिक रूप से अच्छे ही हैं| तकलीफ बहुत बुराई या बहुत अच्छाई में से किसी एक के चयन से होती है| प्राकृतिक अच्छाई में थोड़ी बहुत कमियां(बुराई) भी शामिल हैं| सुख और दुःख भी शामिल हैं| बहुत बुराई के साथ हम असहज बन जाते हैं क्यूंकि ये अननेचुरल है| इसी तरह से अधिक अच्छाई भी अप्राकृतिक है|

तो क्या मैं अच्छा बनना छोड़ दूँ ? बिलकुल क्यूंकि ये अच्छा बनना नहीं बहुत अच्छा बनना है| क्या आप २४ घंटे हंसते रहना पसंद करेंगे? क्या आप हमेशा मीठा खा सकते हैं? क्या आप २४ घंटे आराम कर सकते हैं? क्या आप २४ घंटे दयालु, प्रेम पूर्ण, करुणामय, शांत, आनंदमय   रह सकते हैं? नहीं लेकिन आप ऐसा बनने की कोशिश करेंगे तो आप अप्राकृतिक हो जायेगे| आप यदि बहुत बुरे हैं तो बहुत बुरे का कारण बन रही बड़ी बुराइयों को छोड़ दें बाकी अपने आप हो जायेगा| आपको प्रकृति ने सबसे बेहतर बनाया है| आपको कुछ बनने की ज़रूरत नहीं| बेवजह की प्रोग्रामिंग रिमूव करते जाईये नेचर को अपना काम करने दीजिये| नेचर आपको बीच में ले आएगा जो आपकी सबसे बेहतर अवस्था रहेगी| इसी अवस्था में आप सबके लिए बेहतर होंगे, अपने लिए भी|


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