वक़्त के ज्यों ही तेवर बदलने लगे , तब घनी छाँव मे पाँव जलने लगे। दिनेश मालवीय “अश्क”

Poetry-Newspuran

वक़्त के ज्यों ही तेवर बदलने लगे
तब घनी छाँव मे पाँव जलने लगे।

ख़ूब खोजा न ख़ुद का पता जब मिला
सो किताबों से हम भी बहलने लगे।

घुल फिजा मे गया जानलेवा ज़हर
तुम कहाँ घर के बाहर टहलने लगे।

सामना आइने का किया कम करो
जब तुम्हारी उमर तेज़ ढलने लगे।

ख़्वाब था के हक़ीक़त वो क्या नूर था
लोग महफिल मे सब आँख मलने लगे।

साक़िया तूने क्या मय को देखा न था
पाँव क्यों मयकशों के सम्हलने लगे।

तूने देखा ही मुझको भला इस तरह
ख़्वाब कितने हसीं मन मे पलने लगे।

कल तलक जिसको कहते रहे वो ग़लत
राहबर ख़ुद उसी राह चलने लगे।

अपने आँगन की दीवार ऊँची करो
पेड़ मे फल तुम्हारे जो फलने लगे।

DineshSir-17


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