भारतीय समाज- आश्रम-व्यवस्था (Ashram -Vyavastha)

भारतीय समाज- आश्रम-व्यवस्था (Ashram -Vyavastha)

वर्ण-व्यवस्था के समान आश्रम-व्यवस्था भी भारतीय समाज की मूलभूत विशेषता रही है। इसमें आश्रम व्यवस्था के सभी पक्षों पर प्रकाश डाला गया है इसे पढ़ने से आपको ज्ञात होगा कि-

1 आश्रम का क्या अर्थ है?.

2 आश्रमों की संख्या कितनी है और वे कौन-कौन से है?.

 3. आश्रमों के विभाजन का आधार क्या है?

4. विभिन्न आश्रमों के लिए निर्धारित किए गए कर्तव्य कौन-कौन से हैं?

5. हिन्दू सामाजिक जीवन में आश्रम-व्यवस्था का क्या महत्व है? 



पूर्व अध्याय में वर्णित वर्ण-व्यवस्था का लक्ष्य समाज में श्रम विभाजन पर आधारित समाज का विकास करना रहा है। इसी अध्याय में यह स्पष्ट किया गया है कि वर्ण विभाजन का आधार वैयक्तिक योग्यताएँ और क्षमताएँ था। इस वर्ण-व्यवस्था का निष्ठापूर्वक पालन केवल वैयक्तिक इच्छा पर निर्भर कर देने से उचित न रहता। सभी वर्गों के कार्य, सामाजिक स्थिति और प्राप्त होने वाले लाभों में पर्याप्त अंतर था। यही कारण है कि कालांतर में वर्ण परिवर्तन की प्रवृत्ति पनपी और वर्ण-व्यवस्था का विकृत स्वरूप जाति-प्रथा के रूप में हमारे समक्ष आया। 

इस तथ्य से भारतीय सामाजिक व्यवस्था को जन्म देने वाले भारतीय मनीषी भी भली भांति परिचित थे यही कारण है कि उन्होंने वर्ण-व्यवस्था के साथ-साथ आश्रम व्यवस्था का भी प्रावधान किया। आश्रम व्यवस्था के माध्यम से उन्होंने एक ऐसी व्यवस्था विकसित की जिसमें व्यक्ति न केवल अपने वर्ण के अनुकूल योग्यताओं और क्षमताओं का विकास करता था, वरन् तद्नुकूल निष्ठा उत्पन्न कर उसके परिपालन के लिए तत्पर भी रहता था इस अर्थ में वर्ण- व्यवस्था और आश्रम-व्यवस्था एक-दूसरे की पूरक व्यवस्था रही हैं। वर्ण-व्यवस्था ने जहाँ व्यक्ति की स्थिति और भूमिका को निर्धारित किया वहीं आश्रम-व्यवस्था के द्वारा व्यक्ति के जीवन क्रम को निश्चित स्तरों में विभाजित किया गया। प्रस्तुत अध्याय में हम इसी आश्रम व्यवस्था का अध्ययन करेंगे।

आश्रम का अर्थ (Meaning of Ashram)-

आश्रम शब्द के शाब्दिक अर्थ की विवेचना भिन्न-भिन्न रूपों में की गई है कतिपय विद्वानों ने आश्रम का अभिप्राय आश्रय प्राप्त करने वाले स्थल से लिया है। कुछ विद्वान आश्रम से अभिप्राय विश्राम प्राप्त करने के स्थल से लेते हैं। आश्रम शब्द का उद्गम श्रम से मानकर इसे उस स्थल के रूप में व्यक्त किया जाता है जहाँ व्यक्ति श्रम अथवा कर्तव्य निष्पादित करता है। यह अर्थ आश्रम शब्द के भावार्थ को आंशिक रूप में ही प्रगट करता है। सत्य तो यह है कि आश्रम वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति अपने कर्तव्यों के निष्पादन के साथ-साथ उन्हें श्रेष्ठतम रुप में निष्पादित करने का प्रशिक्षण भी प्राप्त करता है आश्रम के माध्यम से ही व्यक्ति उसस अपेक्षित दायित्वों का निर्वाह करने की क्षमता अर्जित करता है, उसे संपादित करता है और शनैः-शनैः आगे बढ़ता है। पी एन प्रभु ने भी आश्रम से ही अभिप्राय लगाया है। उनके अनुसार या तो आश्रम का अर्थ वह स्थान है, जहाँ परिश्रम किया जाता है अथवा आश्रम व्यक्ति के द्वारा संपादित की जाने वाली क्रिया को ही कहा जाता है।'

एक हिन्दू के जीवन का मुख्य लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना होता है। मोक्ष अनायास अथवा सहज ही प्राप्त नहीं होता मोक्ष प्राप्त करने के लिए न केवल साधना आवश्यक है, बल्कि उसके साथ-साथ मानव धर्म का निर्वाह भी आवश्यक माना गया है। वर्ण-व्यवस्था ने व्यक्ति को मानव धर्म से परिचय कराया, आश्रम-व्यवस्था ने व्यक्ति को मानव-धर्म का निर्वाह कर शनैः-शनैः मोक्ष की ओर अग्रसर होने के लिए प्रेरित किया। इसको दृष्टिगत रखकर महाभारत के शांतिपर्व में आश्रम-व्यवस्था को व्यक्तित्व के विकास की चार सीढ़ियों कहा गया, जिनके माध्यम से व्यक्ति ब्रह्म अथवा मोक्ष को प्राप्त करता है।

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