नक्षत्र विज्ञान: जाने पारिभाषिक शब्दों के अर्थ

नक्षत्र विज्ञान: जाने पारिभाषिक शब्दों के अर्थ

पारिभाषिक शब्द का नक्षत्र विज्ञान को समझने के लिए हमें पारिभाषिक शब्दावली ज्ञान प्राप्त कर लेना अति आवश्यक है। इनको याद किए या अच्छी तरह से समझे बगैर विषय ज्ञान न समझ में आने वाली विदेशी भाषा की तरह से सिर के ऊपर से गुजर जायेगा। जिन पारिभाषिक शब्दों की जानकारी यहां दी जा रही है, उनका इस्तेमाल पुस्तक में जगह-जगह आया है। ये पारिभाषिक शब्द इस प्रकार हैं राशि-जन्म समय में चन्द्रमा जिस राशि में होता है। लग्न-राशि का उदय काल, जन्म कुंडली के प्रथम भाव को कहते हैं। होरा-ग्रहों की तत्कालीन स्थिति द्वारा प्राणियों के दुःख दुःख, लाभ-हानि, कब क्या होगा, इसका निर्णय जिसके द्वारा प्राप्त होता है उसे होरा कहते हैं।

शुक्लपक्ष (शुदी)-अमावस्या से पूर्णिमा की ओर चन्द्र के जाने की स्थिति को कहते हैं। कृष्ण पक्ष (बदि)-पूर्णिमा से अमावस्या की ओर चन्द्र के जाने की स्थिति को कहा जाता है। तिथि-अमावस्या से पूर्णिमा और पूर्णिमा से अमावस्या की ओर जाने के क्रमिक समय को जो बताए, उसे तिथि कहते हैं। मिति-तिथि का ही दूसरा भाव।


चन्द्र वर्ष-354 दिन, इतने निश्चित दिनों में चन्द्रमा पृथ्वी का एक चक्र लगाता है। चन्द्रमा के पूर्णिमा से अमावस्या और अमावस्या से पूर्णिमा की स्थिति में जाने में 30 दिनों का समय लगाता है। अगर चन्द्रमा के 30 दिनों की गणना को लें तो 12 महीनों को 30 से गुणा करने में दिन बनेंगे 360,6 महीने 30 के हिसाब से 6 माह 29 के हिसाब से दिन बनते हैं 354। सूर्य वर्ष-365 दिन, 15 घड़ी 32 पल, व 57 विषला, जिसमें पृथ्वी सूर्य की एक परिक्रमा करती है। यह तो हुआ ज्योतिष की भाषा का समय। हमारा कैलेन्डर वर्ष 365 दिन और 6 घंटे का माना जाता है। 6 घंटों को चार वर्ष तक जुड़े रहने से प्रत्येक चौथे वर्ष एक दिन बढ़ जाता है, जिसे "लीप ईयर' (लौंद वर्ष) कहा जाता है। "लीप ईयर' में फरवरी में 28 दिन के बजाय 29 दिन होते हैं। लीप ईयर' वह होता है जो 4 अंक से कट जाता है।अगला लीप ईयरसन 2000 में पड़ेगा, जो 4 से कट जायेगा। अधिक मास (पुरूषोत्तम मास)-सूर्य वर्ष और चन्द्र वर्ष के 11 दिनों के अन्तर को समाप्त करने के लिए जिस मास का आयोजन किया जाता है, उसे अधिक मास कहते हैं।

तिथियों के नाम तिथियों के नाम इस प्रकार है: 1, प्रतिपदा 2. द्वितीया 3. तृतीया 4. चतुर्थी 5. पंचमी 6. षष्टी 7. सप्तमी 8. अष्टमी 9. नवमी 10. दशमी 11. एकादशी 12. द्वादशी 13. त्रयोदशी 14. चतुर्दशी-पूर्णिमा और अमावस्या प्रतिपदा को (1) एक के अंक सौ, तथा क्रमशः से, अमावस्या को 15 के अंक से और पूर्णिमा को 30 के अंक के द्वारा संकेत करते है। चर्तुदशी को 14 के अंक तिथियों के स्वामी-तिथियों के शुभाशुभ व्यय के लिए उसके स्वामी का भी विचार किया जाता है। प्रतिपदा का स्वामी-अग्नि, द्वितीया का ब्रह्मा, तृतीया का पार्वती, चतुर्थी का गणपति, पंचमी को सर्प, षष्ठी का कार्तिकेय, सप्तमी का सूर्य, अष्टमी का-शिव, नवमी का-दुर्गा, दशमी का-कल एकादशी का विश्वदेव, द्वादशी का विष्णु, त्रयोदशी के कामदेव, चतुर्दशी के शंकर, पूर्णिमा के चन्द्रमा और अमावस्या के स्वामी पितर हैं।

तिथियों की संज्ञाएं

1,6,12-तिथियों को "नन्दा तिथि" कहते हैं।

2,7,11-तिथियों को "भद्रा तिथि" कहा जाता है।

3,8, 13-को "जया तिथि" की संज्ञा दी गई है।

4,9,14-को 'रिक्ता तिथि' कहते हैं। 5, 20, 15-को “पूर्ण तिथि' कहते हैं।

हिन्दी माह के नाम वर्ष भर में 12 महीने होते हैं, जिसका हिन्दी नाम इस प्रकार है

चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन।

दिवस-दिवस (वार) सात होते हैं। इन सातों वारों का नाम सातों ग्रहों के नाम से जुड़ा हुआ है, जैसे के रविवार, सोमवार, मंगलवार, बुधवार, बृहस्पति, शुक्रवार और शनिवार। नक्षत्र-एक से अधिक ताराओं के समूह को “नक्षत्र' कहते हैं। करण-तिथि के "अर्ध भाग" को "करण" कहते हैं। अर्थात एक तिथि में दो करण होते हैं।कुल 11 करण हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं-(1) वव (2) वालच (3) कौलव (4) तैतिल (5) गर (6) वणिज (7) विष्ट (8) शकुनि (9) चतुष्पद (10) नाग और (11) किस्तुघ्न।

योग-योग चन्द्रमा के पारस्परिक सम्बन्ध से बनते हैं। सूर्य और चन्द्रमा के स्पष्टस्थानों को जोड़कर एवं उनकी कला बनाकर, उसमें 800 का भाग देने परयोगों की संख्या निकल आती है।जो शेष बचता है उससे यह बात किया जाता है कि वर्तमान योग की कितनी कलाएं बीत गई हैं। शेष को 800 में घटाने में वर्तमान योग की गद्य कलाएं आ जाती हैं

सत्ताईस योग इस प्रकार हैं

1. विष्कम्भ, 2. प्रीति, 3. आयुष्मान, 4. सौभाग्य, 5. शोभन, 6. अतिगण्ड, 7. सुकर्मा, 8. घृति, 9. शूल, 10. गण्ड, 11. वृद्धि, 12. ध्रुव, 13. व्याघात, 14. हर्षण, 15. वज्र, 16. सिद्धि, 17. व्यतीपात, 18. वरीयान्, 19. परिधि, 20. शिव, 21. सिद्ध, 22. साध्य, 23. शुभ, 24. शुक्ल, 25. ब्रह्म, 26. ऐन्द्र, 27. वधूति।


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