नर्मदा नदी(Narmada River) की आत्मकथा

नर्मदा नदी(Narmada River)  की आत्मकथा जलवायु, पर्यावरण
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(नर्मदा(narmada) सौंदर्य के सांस्कृतिक संवाददाता के रूप में विख्यात चित्रकार एवं लेखक “श्री अमृतलाल वेगड़” जी की पुस्तक ‘अमृतस्य नर्मदा’(narmada) से यह आलेख पाठकों में नदी प्रेम जगाने एवं बढ़ाने हेतु लिया गया है) हमारा देश आज जैसा है, सदा वैसा ही नहीं रहा ।

आज जहाँ  हिमालय है, करोड़ों वर्ष पूर्व वहॉं उथला समुद्र था । किसी भूकंप ने उसे हिमालय में बदल डाला, हालॉकि इसमें लाखों वर्ष लगे ।

इसी तरह आज जहॉं मैं हूँ, वहाँ  चार करोड़ वर्ष पूर्व अरब सागर का एक सॅकरा हिस्सा लहराता था । इसीलिए मेरी घाटी में दरियाई घोड़ा, दरियाई भैसा, राइनोसोरस जैसे समुद्री पशुओं के जीवाश्म पाए गए है। मेरे ही तट पर मानव के विलुप्त पूर्वजों के अस्थि-पंजर भी पाए गए है ।

उम्र के हिसाब से मैं गंगा से बड़ी हूँ क्योंकि जब गंगा नहीं थी, मैं तब भी थी । जब हिमालय नहीं था, विन्ध्य तब भी था । विन्ध्य शायद भारत भूमि का सबसे पुराना प्रदेश है । लेकिन यह पुरानी, बहुत पुरानी बात है ।

यह ठीक है कि मेरे तट पर मोहन जोदड़ो या हड़प्पा जैसे 5,000 वर्ष प्राचीन नगर नहीं रहे, जेकिन मेरे ही तटवर्ती प्रदेश होशंगाबाद और भीमबेटका में 20,000 वर्ष पुराने प्रागैतिहासिक चित्र पाये गए है और उतने बड़े नगर मेरे तट पर हो  भी कैसे सकते थे । मेरे दोनों और दण्डकारण्य जैसे घने जंगलों की भरमार थी । इन्हीं जंगलों के कारण वैदिक आर्य तो मुझ तक पहूँचे ही नहीं । बाद में जो आए, वे भी अनेक वर्षो तक इन जंगलों को पार कर दक्षिण में जाने का साहस न कर सकें । इसलिए मैं आर्यावर्त की सीमारेखा बनी । उन दिनों मेरे तट पर आर्यावर्त या उत्तरापथ समाप्त होता था और दक्षिणापथ शुरू होता था ।

मेरे तट पर मोहन जोदड़ों जैसी नागर संस्कृति नहीं रही, लेकिन एक आरण्यक संस्कृति अवश्य रही । भारतीय संस्कृति मूलतः आरण्यक संस्कृति है । मेरे तटवर्ती वनों में मार्कण्डेय, भृगु, कपिल, जमदग्नि आदि अनेक ऋषियों के आश्रम रहे । यहाँ  की यज्ञवेदियों का धुऑ आकाश में मॅडराता रहता था । ऋषियों का कहना था कि तपस्या तो बस नर्मदा -तट पर ही करनी चाहिए ।

मैं भारत की सात प्रमुख नदियों में से हूँ । गंगा के बाद मेरा ही महत्व है । हजारों वर्षो से मैं  पौराणिक गाथाओं में स्थान पाती रही हूँ  । पुराणों में मुझ पर जितना लिखा गया उतना और किसी नदी पर नहीं । स्कन्दपुराण का रेवा-खंड तो पूरा मुझकों अर्पित है । पुराण कहते है कि जो पुण्य गंगा में स्नान करने से मिलता है, वह मेरे दर्शन मात्र से मिल जाता है । मेरा प्रदेश सौन्दर्य की दृष्ठि से अद्वितीय है ।

भारत की अधिकांश नदियॉ पूर्व की ओर बहती है, मैं पश्चिम की ओर । अमरकंटक में मेरा  और सोन का उद्‌गम पास-पास है लेकिन मैं पश्चिम में बहती हूँ और सोन पूर्व में - बिलकुल विपरीत दिशाओं में । इसे लेकर पुराणों में एक सुन्दर कहानी है । उसके अनुसार मेरा और सोन ( यानी शोणभद्र, जिसे उन्होने नद माना है )  का विवाह होने वाला था । पर शोण मेरी दासी जुहिला पर ही आसक्त हो बैठा, तो मैं नाराज हो गई । कभी विवाह न करने के संकल्प के साथ पश्चिम की ओर चल दी । लज्जित और निराश शोण पूर्व की ओर गया । मैं चिरकुमारी कहलाई । इसीलिए भक्तगण मुझे अत्यंत पवित्र नदी मानते हैं और मेरी परिक्रमा करते हैं । यह परिक्रमा भिक्षा मॉगते हुए नंगे पैर करनी पड़ती है और नियमानुसार करने पर इसमें 3 वर्ष,3 महीने और 13 दिन लगते हैं । पुरूषों के अलावा स्त्रियॉ भी यह कठिन परिक्रमा करती हैं ।

मेरे तट पर कभी शक्तिशाली आदिम जातियाँ निवास करती थीं । मेरा तट गिरि,जन और वन जातियों की प्राचीन लीला-भूमि रहा । आज भी मेरे तट पर बैगा, गोंड,भील आदि माटी से जुड़ी जनजातियॉ निवास करती है । इनकी जीवन –शैलियों, नृत्यों तथा अन्य प्रथाओं ने दूर-दूर के लोगों को आकृष्ट किया है ।

जीवन मे मैं ने सदा कड़ा संघर्ष किया । सरल मार्ग छोड़कर कठिन मार्ग चुना । कठिनाइयों में से रास्ता निकालना मेरा स्वभाव हो गया है । अमरकंटक से जो एक बार चली तो खडडों में कूदती, निकुंजों में धॅसती, चटटानों को तराशती और वन-प्रांतरों की बाधा तोड़ती भगती चली गई । न जाने कौन-सी अक्षय शक्ति मुझे पहाड़ी ढलानों घाटियों,वनों या पथरीले पाटों में बिना थके दौड़ते रहने की प्रेरणा देती है । अपनी सारी शक्ति से जिससे मैं ने अपना अंतिम लक्ष्य माना, उसी ओर चलती रही- दिन और रात,रात और दिन ।

मैं  एक हूँ , पर मेरे रूप अनेक हैं । जब मूसलाधार वृष्टि होती है, तब मैं उफन पड़ती हूँ । बसंत में मैं मंथर गति से बहती हूँ और गरमियों में तो बस मेरी सॉस भर चलती हैं । प्रत्येक नदी का सर्वाधिक मूल तत्व पानी होता है । लेकिन यही मेरा सबसे कमजोर तत्व है । बरसात में  तो उफन पड़ती हूँ , पर गरमी में सूखकर काँटा रह जाती हूँ  ।

बड़ी अप्रत्याशित नदी हूँ मैं - आज कुछ,कल बिलकुल दूसरी । कब चौड़ी में से सॅकरी, द्रुत में से विलंबित, गहरी में से अथली या नन्हीं-नाजुक में से जुझारू हो जाऊँ कुछ कहा नहीं जा सकता । हल्ला-गुल्ला मुझे पसंद हैं, नाम ही रेवा हैं, पर कोमल और शांत बनते भी देर नहीं लगती । सच तो यह है कि मैं  खुद भी नहीं जानती कि अगले क्षण मैं क्या करने वाली हूँ ।

मैं  प्रपात-बाहुल्या नदी हूँ । मेरे उद्‌गम-स्थल अमरकंटक में उसे दो प्रपात हैं - कपिलधारा और दूधधारा । जबलपुर के पास धुऑधार मेरा सबसे सुन्दर प्रपात हैं । यहाँ  से चटटानी बाधाओं को काटती में संगमरमर की संकरी घाटी में सिमट जाती हूँ । नौकाविहार करते दर्शकों को मेरा संगमरमरी सौन्द्रर्य अनायास बॉध लेता है । मेरे और किसी स्थान ने लोगो को इतना सम्मोहित नहीं किया।

धावड़ीकुंड के प्रपातों का सौन्द्रर्य भी कम नहीं । यहाँ  से निकले शिवलिंग सारे देश में पूजे जाते हैं ।

ओंकारेश्वर मेरे तट का सबसे बड़ा तीर्थ है । महेश्वर ही प्राचीन माहिष्मती है । यहाँ के घाट हमारे देश के सर्वोत्तम घाटों में ये है । इसके बाद शूलपाण की झाड़ी । नाम छाड़ी, पर एक पेड़ नहीं । नंगी पहाडियों वाला यह प्रदेश आबादी से प्रायः शून्य है । मार्ग इतना टेढा-मेढा है कि जहाँ एक कदम से मेरा काम चल सकता था, वहाँ  मुझे सात कदम भरने पड़ते है। । यहाँ  के गरीब भील आदिवासी किसी तरह अपना अस्तित्व बनाए हुए है ।

मेरे मुहाने पर स्थित भरूच ही भृगुकच्छ था । कभी यह पश्चिम भारत का सबसे बड़ा बंदरगाह था । सौदागरों और जहाजियों की यहाँ  भीड़ लगी रहती थी । मेरे जिस पाट में कभी सैकड़ों जहाजों का आना जाना लगता रहता था, वही पाट आज खाली पड़ा है ।

अब मैं  खंभात की खाड़ी में अरब सागर से मिलने ही वाली हूँ । मुझे याद आया,अमरकंटक में मैंने  कैसी मामूली-सी शुरूआत की थी । वहाँ  तो एक बच्चा भी मुझे लांघ जाता और यहाँ मेरा पाट 20 किलोमीटर चौड़ा है । यह तय करना  कठिन है कि  कहाँ  मेरा अंत  है और कहाँ  समुद्र का आरंभ ।

आज मेरे तटवर्ती प्रदेश काफी बदल गए हैं । मेरी वन्य एवं पर्वतीय रमणीयता बहुत कम रह गई है मुझे दुःख है कि मेरे घने जंगल जड़ से काट डाले गए हैं । पहले इन जंगलों में जगली  जानवरों की गरज सुनाई देती थी, अब पक्षियों का कलरव तक सुनाई नहीं देता । उन दिनों मेरे तट पर पशु-पक्षियों का राज्य था, लेकिन उसमें आदमी के लिए भी जगह थी । अब आदमी का राज्य हो गया है, लेकिन उसमें पशु -पक्षी के लिए कोई जगह नहीं ।

मेरा पानी भी उतना निर्मल और पारदर्शी नहीं रहा । फुलों और दूर्वादलों से सुवासित स्वच्छ हवा भी नहीं रही ।

इन दिनों मुझ पर कई बॉध बॉधे जा रहे हैं । बॉध में बॅधना भला किसे अच्छा लगेगा । फिर मैं तो स्वच्छंद हरिणी-सी हूँ , मेरे लिए तो यह और भी कष्टप्रद है । इससे मेरी आदिम युग की स्वच्छंदता चली जाएगी ।

किन्तु,जब अकाल-ग्रस्त भूखे-प्यासे लोगों को, पानी और चारे के लिए तड़पते पशुओं की और बंजर पडे़ खेतों को देखती हूँ , तो मेरा मन रो उठता हैं आखिर मैं मॉ हूँ , अपनी संतान को तड़पता कैसे देख सकती हूँ  । इसलिए मैंने इन बॉधों को स्वीकार कर लिया हैं । अभी तक मैं  दोड़ के आनन्द के लिए दौड़ती थी । अब धरती की प्यास बुझाने के आनंद के लिए दौडूंगी भी और ठहरूँगी भी । सरोवर बनाऊँगी । नहरों के माध्यम से खेतों की प्यास बुझाऊँगी । धरती की सुजला-सुफला बनाऊँगी ।

कुछ लोग मुझ पर बन रहे बड़े बॉधों का विरोध कर रहे है, लेकिन अगर आबादी इसी तरह बढ़ती रही, तो  ये तो क्या, आपको इनसे भी बड़े बॉध बनाने पड़ेगे ।

कुछ वर्ष पूर्व आपके एक शहर ने अपनी स्थापना की 300 वीं वर्षगॉठ मनाई थी । अगर मैं  अपनी स्थापना की वर्षगाठ मनाऊँ तो पता नहीं वह कौन-सी करोड़वी वर्षगॉठ होगी । मुझे इस बात की खुशी है कि इस उम्र में भी मैं यौवन और जीवन से भरपूर हूँ  । मैं आज भी परिवर्तनशील हूँ । और अपने आपको बदलती हुई परिस्थितियों के  अनुकुल ढाल सकती हूँ  । मैं अपने आप में अनूठी हूँ , विश्व में अपने ढंग की अकेली नदी, क्योकि सारे संसार में एक मात्र मेरी ही परिक्रमा की जाती है ।

एक मन की बात बताती हूँ  । थोडी हिचकिचाहट के साथ ही कहती हूँ  । कभी-कभी मैं अपनी तुलना गंगा और यमुना से करती हूँ । सोचती हूँ , गंगा में विवेक ज्यादा है और भावुकता कम ।  यमुना में भावुकता ज्यादा है और विवेक कम । मेरा विचार है कि मुझ में विवेक और भावुकता का सही अनुपात है । इसका कारण शायद यह हो कि मेरे तट पर उत्तर के आर्यो की विचार-प्रधान संस्कृति और दक्षिण के द्रविड़ों की आचार-प्रधान संस्कृति का समन्वय हुआ था । फिर भी यह कोई दावा नहीं है ।



लोगों ने मुझे खूब स्नेह दिया । मुझे माँ कहा, मेरे जल को अमृत माना, मेरे तट पर तपस्या की, आश्रम बनाए, तीर्थ बनाए । मेरे तट के छोटे से छोटे तृण और छोटे से छोटे कण न जाने कितने परिव्राजकों, ऋषि-मुनियों और साधुसंतों की पदधूलि से पावन हुए । मुझे चिरकुमारी कहा । मेरी परिक्रमा करने की परंपरा चलाई । इस देश  के करोड़ों निवासियों के लिए मैं केवल नदी नहीं, माँ हूँ  । यह सुखद अनुभूति मेरे लिए अनंत काल तब काफी होगी । जाते-जाते एक बात कहना चाहती हूँ  । याद रखो, पानी की हर बूँद एक चमत्कार है । हवा के बाद पानी ही मनुष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता है ।

किन्तु पानी दिन पर दिन  दुर्लभ होता जा रहा है । नदियॉ सूख रही है । उपजाउ जमीन ढूहों में बदल रही है । आए दिन अकाल पड़ रहे है । मुझे खेद हैं, यह सब मनुष्यों के अविवेकपूर्ण व्यवहार के कारण हो रहा है । अभी भी समय है । वन-विनाश  बंद करों । बादलों को बरसने दो । नदियों को स्वच्छ रहने दो । केवल मेरे प्रति ही नहीं, समस्त प्रकृति के प्रति प्यार और निष्ठा की भावना रखो । यह मैं इसलिए कह रही हूँ  क्योकि मुझे तुमसे बेहद प्यार है ।

Nadi ki atmakatha in hindi

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