मधुमेह(Diabetes) का आयुर्वेदिक उपचार : लांग लाइफ डायबिटीज रोगियों के लिए

मधुमेह(Diabetes) का आयुर्वेदिक उपचार : लांग लाइफ डायबिटीज रोगियों के लिए
आज के वैज्ञानिक युग में यदि कोई रोग मानव को घुन की तरह खाए जा रहा है तो वह है मधुमेह(Diabetes) सर्वेक्षणों से पता चला है कि विश्व भर में लगभग 15 करोड़ व्यक्ति इस रोग से प्रभावित हैं और इनमें से लगभग 3.3 करोड़ केवल भारत में ही हैं। अर्थात् विश्व का हर पांचवा मधुमेह(Diabetes) रोगी भारतीय है तथा यह संख्या दिनों दिन बढ़ती जा रही है।

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हालांकि मृत्यु प्रमाण पत्रों में हृदयाघात, कैंसर जैसे रोग ही वर्णित होते हैं परन्तु देखने में आया है कि मधुमेह(Diabetes) रोगियों में साधारण मनुष्यों की अपेक्षा ये रोग अधिक होते हैं। देश का अरबों रुपया इनके इलाज पर खर्च हो रहा है एवं कार्य सम्पादन का भी नुकसान होता है। ज्यादातर लोग इस बात से अनभिज्ञ हैं कि इसकी रोकथाम के लिए उन्हें क्या करना चाहिए, क्योंकि देखने में आया है कि मधुमेह(Diabetes) रोगी दीर्घकाल तक दवा का सेवन करता रहे तो भी अनेक उपद्रवों का शिकार हो जाता है। 

एक बार नजर कमजोर होने लगे (Retinopathy), गुर्दे में खराबी आना शुरू हो (Nephropathy), साव हृदयाघात या गैंगरीन हो जाए तो इन्हें दूर कर स्वाभाविक अवस्था में ला पाना मुश्किल ही होता है। परन्तु यदि जीवन शैली नियमन, योग एवं आयुर्वेद की दृष्टि से देखा जाए तो हम रक्त शर्करा को नियन्त्रण में रख, बल एवं अग्नि की रक्षा कर पाते हैं तो ये रोग स्वतः ही शांत हो जाते हैं। यह सर्वथा सत्य है कि यदि व्यक्ति एक बार मधुमेह(Diabetes) से पीड़ित हो जाए तो जीवन में उससे छुटकारा पाना मुश्किल है। तब, किस प्रकार मधुमेह(Diabetes) रोगी स्वस्थ एवं उपद्रव रहित जीवन व्यतीत करते हुए दीर्घायु प्राप्त कर सकता है?

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गदलापन लिए हुए मूत्र का बार-बार आना प्रमेह कहलाता है। यदि उसके साथ शर्करा भी आने लगे तो उसे मधुमेह(Diabetes) या शुगर कह दिया जाता है। हमारे शरीर में एक अन्तःस्रावी ग्रन्थि, अग्न्याशय (पेनक्रियाज) होती है। उसकी बीटा-कोशिकाओं से इन्सुलिन नामक स्राव निकलता है जो कार्बोहाइड्रेट का पाचन कर शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है। परन्तु यदि इन्सुलिन की मात्रा कम हो या बिल्कुल ही न हो तो शर्करा का पाचन नहीं हो पाता जिससे रक्त में शर्करा की मात्रा बढ़ जाती है। हमारे गुर्दे भी इसे रोक नहीं पाते और वह मूत्र मार्ग से बाहर निकलने लगती है। इस स्थिति को मधुमेह(Diabetes) या Diabetes Mellitus कहा जाता है। यह कई प्रकार की होती है

टाइप 1 मधुमेह(Diabetes)

इसे जूविनाइल या (IDDM) इन्सुलिन आश्रित मधुमेह(Diabetes) कहा जाता है। आमतौर पर यह रोग कम आयु में होता है। इस प्रकार की मधुमेह(Diabetes) में अग्न्याशय स्थित बीटा कोशिकाओं से इन्सुलिन का स्राव ही नहीं होता। इन्सुलिन के इंजैक्शन से ही रोगी को लाभ मिलता है।

टाइप-2 मधुमेह(Diabetes)

इन्सुलिन डिपेन्डेन्ट नान मधुमेह(Diabetes) (NIDDM) | यह आमतौर पर 40 वर्ष के बाद वाले व्यक्तियों में मिलती है। इस स्थिति में इन्सुलिन तो बनती है, परन्तु किन्हीं कारणों से या तो देर से निकलती है या पूर्णतः सक्रिय नहीं होती। ऐसी अवस्था में दवाएं खाने पर इसका साव होने लगता है तथा क्रियाशीलता बढ़कर शर्कर का पाचन हो जाता है।

कुछ दवाओं विशेषकर स्टीराइड्स एवं विशेष परिस्थितियां जैसे- गर्भावस्था व अग्न्याशय विकार एवं शोथ (Chronic Pancriatitis) के कारण भी मधुमेह(Diabetes) हो जाने का खतरा बना रहता है।

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लक्षण:-

बार-बार मूत्र का आना, अधिक प्यास लगना, मूत्र मार्ग से शर्करा का जाना, अधिक भूख लगना, अधिक खाना खाने पर भी कमजोरी बनी रहना, शरीर का वजन घटते जाना, घाव का देर से भरना तथा दृष्टि में धुंधलापन आना इसके मुख्य लक्षण हैं।

कारण:-

आलस, मानसिक तनाव, भोग-विलास, मदिरापान, व्यायाम न करना, देर से खाना और सो जाना, दूषित, बासी, डिब्बाबन्द खाद्य पदार्थ, फास्ट फूड (पीजा, बर्गर, चाऊमिन, छोले-भठूरे आदि) खाना, रसायनिक पेय, कफवर्धक अभिष्यन्दि पदार्थों का अधिक सेवन ही इसके मुख्य कारण हैं।

परीक्षण:-

मूत्र में शर्करा की मात्रा आना मधुमेह(Diabetes) दर्शाता है। रोगी का रक्त परीक्षण खाली पेट रक्त शर्करा : 60-110 मि.ग्रा./ डेसी.लि. तक। खाने के 2 घंटे बाद रक्त शर्करा: 140 मि.ग्रा./ डेसी. लि. तक।

ग्लाइकोसिलेटिड हिमोग्लोबिन Hb A- यह 3 मास के रक्त शर्करा स्तर को दर्शाता है। यदि 4 से 6 प्रतिशत हो तो अच्छा शर्करा नियंत्रण व 8-10 प्रतिशत से ऊपर हो तो मधुमेह(Diabetes) जनित उपद्रव होने का खतरा बना रहता है।

रक्त में वसा की मात्रा अधिक होने पर हृदय रोग आदि होने का खतरा बना रहता है ।

उपद्रव:-

यदि लम्बे समय तक इलाज कर रक्त शर्करा एवं रक्तचाप पर नियंत्रण न रखा जाए तो कई प्रकार की परेशानियां सामने आ जाती हैं।

डायबिटिक कीटोएसिडोसि मधुमेह(Diabetes) के कारण धीरे-धीरे कोमा में चले जाना। यह आमतौर पर इन्सुलिन आश्रित रोगियों में मिलता है। यह कोमा की स्थिति होती है जिससे शरीर में इन्सुलिन का पूर्ण अभाव रहता है व एडिपयोज टिश्यु से वसीय अम्ल के स्राव को बढ़ा कीटोन बोडीज में बदलता है। इस कीजोन बोडीज की रक्त में ज्यादा मात्रा PH को कम कर मूत्र में रिसने लगती है तथा शरीर धातु को क्षीण कर रक्त में शर्करा को अत्याधिक बढ़ा देती है। 

शर्करा एवं बहुत सा जल मूत्र मार्ग से बाहर निकल जाता है। जिसके कारण शरीर में जल की कमी होती चली जाती है। रोगी थका हुआ महसूस करता है और भ्रमित हो धीरे-धीरे संज्ञानाश(कोमा) में चला जाता है जो आपात स्थिति है। ऐसी अवस्था में तुरन्त इन्सुलिन और प्रचुर मात्रा मं द्रवों की आवश्यकता होती है।

गुर्दे का प्रभावित हो खराब हो जाना (Diabetic Nephropathy)- रक्त में शर्करा की मात्रा अधिक होने पर गुर्दे का फिल्टरेशन तंत्र क्षतिग्रस्त होने से मूत्र के साथ एल्ब्युमिन निकलना प्रारंभ हो जाता है। यदि इसकी मात्रा 30-300 मि.ग्रा. प्रतिदिन से अधिक हो तो गुर्दा क्षतिग्रस्त मान लिया जाता है जिसका उपचार केवल डायलिसिस या गुर्दा प्रत्यारोपण ही है।

रोग प्रतिरोधक शक्ति की कमी- बहुत ऐसी अवस्था में बार-बार संक्रमण हो जाता है।

न्यूरोपैथी व गैंगरीन मधुमेह(Diabetes)- के कारण सूक्ष्म रक्त वाहिनिया प्रभावित होने से नाड़ियों को भरपूर ऑक्सीजन नहीं पहुंचा पाती जिसके कारण नाड़ी क्षतिग्रस्त हो जाती है। हाथ एवं पांव में सुन्नता आ जाती है, जख्म बन जाते हैं जो भरते नहीं और अंत में गैंगरीन हो जाती है। इस अवस्था में संबंधित अंग को काटना ही एकमात्रा उपाय रह जाता है।

दृष्टि कमजोर होना (Diabetic Retinopathy)- इसमें काला मोतिया, सफेद मोतिया भी होता है और नजर कमजोर होती जाती है। जो अंततः अन्धता में बदल जाती है। उसमें रेटिना की सूक्ष्म रक्तवाहिनियां विस्फारित हो रक्तस्राव कराने लगती हैं व सीरम स्रवित हो रेटिना को गीला कर देता है। स्राव करने वाली सूक्ष्म रक्तवाहिनियों से वसा तथा प्रोटीन एकत्र हो नरम काटन वूल रिसाव उत्पन्न करते हैं जिसके कारण रेटिना को भरपूर ऑक्सीजन नहीं मिलती। 

इस अवस्था में रेटिना की सूक्ष्म रक्तवाहिनिया क्षतिग्रस्त हो जाती हैं व रेटिना के आसपास नई अति सूक्ष्म रक्तवाहिनियां उभर आती हैं तथा रक्त स्राव होने लगता है। तुरन्त इलाज के अभाव में रक्तस्राव विटरस हूमर को गंदलाकर दृष्टि में धुंधलापन ला रेटिना को भी क्षतिग्रस्त कर देता है। यदि मेकुला में शोथ उत्पन्न कर प्रभावित कर दे तो दृष्टि कम होकर अन्धता भी बदल जाती है। रक्त शर्करा व रक्तचाप को में नियंत्रण में रखकर दृष्टिक्षय को रोका जा सकता है। लेजर शल्य चिकित्सा द्वारा मधुमेह(Diabetes) के कारण दृष्टिक्षीणता को कुछ हद तक कम किया या रोका जा सकता है।

रक्तवाहिनी काठिन्य व अवरोध जन्य व्याधियां (Diabetic Vascular disease)- रक्तवाहिनियां कठोर तथा वसा द्वारा अवरोधित हो जाती हैं जिसके कारण हृदय एवं मस्तिष्क में पूर्ण रक्त संचार न होने की अवस्था में हृदयाघात और मस्तिष्काघात(Cerebral Ischemia) हो सकता है जिससे व्यक्ति की मृत्यु तक हो सकती है। जोड़ों का जकड़ना भी इसमें संभव होता है। मैथुन के प्रति रूचि कम हो मनुष्य नपुंसक हो जाता है।

हाइपोग्लाइसीमिया रक्त में शर्करा की मात्रा(3.5 मि. मोल/लि.) से भी कम हो जाए तो धीरे-धीरे पसीना आना, घबराहट, कांपना, दिल धड़कना, आवाज न निकलना, भ्रम तथा कोमा तक हो सकता है। यह इन्सुलिन पर आश्रित रोगियों में अधिक देखने को मिलता है। ऐसी अवस्था में तुरन्त थोड़ा सा ग्लूकोज या चीनी मुख में डाल दें। यदि स्थिति गंभीर हो तो शिरा द्वारा ग्लूकोज़ दें। ऐसी संकट पूर्ण स्थिति से बचने के लिए मधुमेह(Diabetes) रोगी अपनी जेब में शर्करा या ग्लूकोज़ की पुड़िया रखें तथा एक कार्ड रखें जिस पर उसके मधुमेह(Diabetes) होने का वर्णन हो।

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उपाय:-

आयुर्वेद की दृष्टि से मधुमेह(Diabetes) रोग मन्दाग्नि के कारण होता है। यदि ऐसे उपाय किए जाएं जिससे पाचक अग्नि पर्याप्त रहें, आम का पाचन हो तथा धातु क्षय को दूर कर बल्य एवं रसायन औषधियों का प्रयोग कर रक्त में शर्करा की मात्रा को नियंत्रित रखकर मधुमेह(Diabetes) एवं इससे होने वाले उपद्रवों को रोका जा सकता है। इसके लिए -

1. स्थूल मधुमेह(Diabetes) रोगी की संशोधन कर शमन चिकित्सा करें तथा दुर्बल एवं कृश रोगी की संतर्पण एवं बृहण चिकित्सा करें।

2. पर्याप्त परिश्रम एवं व्यायाम करें। नित्य ही नियमित एवं संतुलित आहार का सेवन करें।

3. शारीरिक क्षमता के अनुसार अधिक से अधिक पैदल चलें।

4. भोजन के प्रारंभ में अदरक एवं लवण का प्रयोग कर जठराग्नि प्रदीप्त करें खाने में कद्दू या सीताफल की सब्जी, छिलके सहित मेथीदाना, पोदीना व अन्य मसाले डालकर प्रयोग करें।

5. पनीर डोडियों के 15-20 दाने रात को जल में भिगोकर रख दें और सुबह मसल कर सेवन करें।

6. नक्तमाल बीज को खाली पेट चबाकर खा लें।

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7. प्रातः काल घीया, मूली, थोड़ी अदरक को कस कर उनका रस निकाल आधा गिलास नित्य लें तथा वसा एवं उच्च रक्तचाप पर नियंत्रण रखने हेतु पुनर्नवा, दालचीनी, बड़ी इलायची का प्रयोग करें।

8. कोष्ठशुद्धि हेतु सुपाच्य ताजे रेशेदार फल, सब्जियां एवं खाद्य पदार्थों का अधिक से अधिक सेवन करें।

9. पाचन क्रिया ठीक करने के लिए अजवायन का प्रयोग करें।

10. करेला, विजयसार, गुड़मार, जामुन की गुठली, कुन्दरु, गिलोय, सदाबहार, हल्दी, पुनर्नवा, हरड़, बहडा, आंवला, बिल्व पत्र, शिलाजीत आदि औषधियां या इनसे बने योग का सेवन मधुमेह (Diabetes) रोग में लाभ करता है।

करेला (जिसमें वानस्पतिक इन्सुलिन होता है) तथा गुड़मार से बना डाबर का ग्लुकोरिड के.पी. तथा विजयसार, मेशश्रृंगी, मेथी, करेला, शिलाजीत आदि से बना डाबर का मधुरक्षक एवं चन्द्रप्रभा वटी मधुमेह(Diabetes) से सुरक्षा प्रदान कर रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है।

महा त्रिफला घृत, सप्तामृत लोह, सफेद मिर्च का सेवन नेत्र ज्योति वर्धक है। वसन्त कुसुमाकर रस न केवल रक्त शर्करा को कम कर नियंत्रित करता है बल्कि धातु क्षीणता को दूर कर कोशिकाओं को सुदृढ बनाकर रसायन का काम करता है। दृष्टि दोष, गुर्दा विकार, हृदयाघात, गैंगरीन, नपुंसकता आदि होने से रोकता है तथा शरीर में नवीन ऊर्जा का संचार कर मधुमेह(Diabetes) रोगी को सुखपूर्वक जीने के लिए उत्साहित करता है। यह मधुमेह(Diabetes) रोगियों के लिए वरदान सिद्ध हुआ है।

तनाव को योगमुद्रा ध्यान आदि से दूर करें। इनके साथ योग क्रियाएं यथा जल नेति, सूत्र नेति, गजकरनी, प्राणायाम एवं अग्निसार किया तथा नाड़ीतान, रासन, नाड़ी संचालन, बालमच्छलन, अर्धमत्स्येन्द्रासन भी काफी लाभदायक है।

क्या न करें:-

भोग विलास, मानसिक तनाव, शराब, बीड़ी, सिगरेट, तम्बाकू, गुटखा, फास्ट फूड(पीज़ा, बर्गर, चाऊमिन, छोले-भठूरे) रासायनिक पेय (पेप्सी तथा कोका कोला इत्यादि) एवं डिब्बा बन्द खाद्य पदार्थ, मैदा, मीठे व घी से बने गरिष्ठ, कफ वर्धक पदार्थों का न्यूनतम प्रयोग या त्याग करें।

उपरोक्त क्रियाएं एवं औषधियों का सेवन चिकित्सक के परामर्श अनुसार करें।

उपरोक्त उपायों के करने से मधुमेह(Diabetes) रोगी सुखमय उपद्रव रहित जीवन व्यतीत कर सकता है। देखा गया है कि मधुमेह(Diabetes) रोगी की दवाइयां तक छूट जाती हैं। इन्सुलिन पर आधारित रोगी की इन्सुलिन की मात्रा कम हो जाती है एवं रोगी पहले की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली तथा स्वस्थ अनुभव करता है।

जीवन शैली नियमन, आयुर्वेदिक दवाओं एवं यौगिक क्रियाओं को अपनाकर मधुमेह(Diabetes) तथा उससे होने वाले उपद्रवों को जड़ से मिटाकर स्वस्थ जीवन जीकर 'जीवेत शरद शतम्' की कल्पना को साकार करना संभव है।

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