पृष्ठभूमि और देवासुर संग्राम(Devasur Sangram) … रावण की त्रैलोक्य विजय – 02

पृष्ठभूमि और देवासुर संग्राम(Devasur Sangram) … रावण की त्रैलोक्य विजय – 02
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रावण की त्रैलोक्य विजय - 2

अनेक विद्वानों को पढ़कर ,मेरा जो दृष्टिकोण बना, मैं बहुत उत्साह पूर्वक आप मित्रों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं। रावण और श्रीराम के बीच 84 दिनों तक घनघोर युद्ध चलता रहा। किस योद्धा का वध कैसे हुआ, अधिकांश लोग जानते ही हैं।

पिछले अनेक वर्षों से मेरा स्वप्न था कि रावण के जीवन और उसके दर्शन ( ?) पर कुछ अलग से लिखूं।अतः परम्परागत धार्मिक पुस्तकें पढ़ते पढ़ते, ऐसे अनेक विद्वानों के साहित्य से भी रूबरू हुआ जिन्होंने अपनी पुस्तकों में आर्यों के संस्कारों, विचारों, दिनचर्याओं, मानवता के प्रति उनके समर्पण और विश्व बंधुत्व की भावनाओं के दर्शन होते हैं। इस भारत भूमि का अर्थ क्या है। इस पवित्र भूमि पर जन्म लेने का तात्पर्य क्या है। ऋग्वेद में सूर्य को परमात्मा कहा गया है। वही ईश्वर है। संपूर्ण ब्रह्माण्ड का पोषक। पालनहार भी सूर्य है। ब्रह्मांड में सूर्य, आकाश, वायु और जल न होता, पृथ्वी न होती तो जीवन की कल्पना तक न होती। फिर सूर्य की किरणों से ही जलचर, थलचर और नभचरों का अस्तित्व है। ब्राह्मण ग्रंथों में सूर्य के गहनतम रहस्यों पर व्यापक प्रकाश डाला गया है।
ऋषिगणों के शोध हैं कि सूर्य की किरणों से पृथ्वी का कोई स्थान बिल्कुल कोयला जैसा काला होकर स्वर्ण की खान में कैसे परिवर्तित हो जाता है।नेत्र ज्योति में वृद्धि करने वाला सुरमा किस काले पत्थर से बनता है।और वही पत्थर (संपूर्ण पर्वत) सूर्य की किरणों से बनता है। विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में जलवायु और अन्न उत्पादन एक सा क्यों नहीं होता। कहीं कोई अनाज या फल होते हैं, तो कहीं कोई और। 
मूल बात यह कि भारत में जन्म लेने ,शुद्ध सात्विक जीवन जीने ,त्याग, तपस्या, बलिदान, दया, धर्म, उदारता और परोपकार की भावना की प्रधानता का कारण सूर्य की करणें ही हैं।प्राकृतिक सौन्दर्य, संपन्नता, नदियां, वन, वन्य प्राणी यह सत्य है। हमारे ग्रंथों में इन बातों के प्रमाण मिलते हैं। भारत भूमि में त्याग और निर्मल चरित्र की प्रधानता है। पाश्चात्य अथवा अन्य देशों में नहीं। भारत भूमि में ही महान ऋषि, मुनि, सन्यासी और ब्रह्मचारी मिल सकते हैं। और कहीं सुना आपने। 

तो हम जिन विचारों की बात कर रहे हैं। और आगे भी करेंगे, उनमें अहिंसा भी सर्वोपरि है। जीव रक्षा। चीटी तक नहीं मारना चाहते हम। दया का इतना ऊंचा उदाहरण कहीं सुन भी नहीं सकते आप। तो हमारी भारत भूमि की यह उच्च जीवन पद्धति में घालमेल करके उसको दूषित करने की प्रकिया कैसे प्रारंभ हुई...! हमारी इस कथा का मूल तत्व है। विचारधाराओं और विकृत मानसिकता वाली, अमानुषिक चेष्टा। रक्तरंजित गतिविधियां।

निर्मम संस्कृतियों ने भारत वर्ष को कहां से कहां ला खडा़ किया है। अंग्रेज विद्वानों ने लिखा है कि भारत में घरों में ताले नहीं लगते थे। हमारे आचार, विचार, रहन सहन, भोजन और सामाजिक व्यवहार में कितनी सादगी थी। हमारी वैद्यक पद्धति आयुर्वेद और योग से नियंत्रित होकर "जीवेत शरदः शतं "श्रणुयाम शरदः शतं, पश्यामि शरदः शतं की कामना करती थी। 

आर्यों के इस देश पर कैसे नजर लगती गई।इस शांति के पुजारी देश पर आतताइयों, अत्याचरियों और मानव जीवन का मूल्य न समझने वालों के आक्रमण होना प्रारंभ होने लगे। एक छोटे से उदाहरण से इस गंभीर बात को समझा जा सकता है -सन् 2014 तक उत्तर, पश्चिम से कोई भी आतंकी भारत में कहीं भी घुस कर लोगों की हत्या करके चला जाता था। उत्तर पश्चिम राज्य आतंकियों का गढ़ बन चुका था। यही स्थिति रावण के समय दक्षिण भारत की थी। हू -ब -हू। आतंकी आते, आर्यों को सताते, यज्ञ विध्वंष करते, ऋषियों की हत्या करते और आज की तरह बच निकलते। हमारे तब के ऋषियों और मनीषियों ने समस्या के मूल कारण को खोज निकाला। उसका जड़ से उपचार करने की योजना बनाई। 

समझना यह है कि भारत की पवित्र भूमि को दूषित कैसे किया गया। लोग सिर्फ यही समझते हैं कि आक्रमण अनार्य मुगल, मुसलमानों, डच, पुर्तगीज, फ्रांसीसी अथवा अंग्रेजों ने ही किये। नहीं। यह अर्ध सत्य है।पूर्ण सत्य जानने के लिए हमको देवासुर संग्रामों तक जाना पडे़गा। 

हमको राक्षस जाति की उत्पत्ति,उसका प्रारंभिक इतिहास, लंका के निर्माण की कथा, दैत्यों, राक्षसों का श्री विष्णु हरि से युद्ध ,राक्षसों ( रावण की ननिहाल) से होता हुआ विष्णु अंश रुपी श्री राम के समय तक विरोध का पहुंचना ,आदि बहुत से कारणों को बारीकी से समझना होगा। 
हम यह नहीं कहते कि रावण और श्रीराम के बीच युद्ध का कारण "नाक "की लडाई नहीं थी। स्त्री किसी भी परिवार की नाक होती है। सम्मान होती है। कारण जो भी हो श्रीराम ने रावण की बहन की नाक काटी तो प्रतिशोध में रावण ने भी सीता का हरण करके श्रीराम की नाक काट दी। तो यह नाक की लडा़ई तो सतही है। लगभग 11 वर्ष से अधिक समय तक वन में रहने के बाद की ।
हम चर्चा करेंगे कि श्रीराम को वन में भेजा ही क्यों गया! इस घटना के पीछे उद्देश्य क्या था ..?

इस योजना में कौन कौन सम्मिलत थे।और क्यों.! उस समय भारतवर्ष में दक्षिणारण्य, दंडकारण्य और जन स्थान की स्थिति क्या थी। कौन कौन सी वन्य जातियां वहां निवास करतीं थीं। उनकी आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक स्थितियां कैसी थीं। वन्य जातियों का उपयोग कैसे किया गया। 

आर्यों के प्रतिनिधि श्री राम क्या थे। उनमें ऐसा विलक्षण क्या था। तब के स्थापित दुर्घर्ष त्रैलोक्य विजयी रावण के समक्ष एक अकेले श्रीराम को क्यों खडा़ किया गया। साधनहीन आर्यवीर श्रीराम ने समर्थ राक्षस राज रावण को कैसे दंडित करने में सफलता प्राप्त की। वे कौनसी अदृश्य शक्तियां थी, जिन्होंने श्रीराम की सहायता की और क्यों..?

विषय बहुत रोचक है। कथानक महत्वपूर्ण है। स्थितियां दुरूह हैं किंतु श्री राम हैं जो तब के आतंक को समूल नष्ट करने में सफल हो पाते हैं। मित्रो,इसी प्रकार के उत्तेजक प्रश्नों के साथ हम चर्चा करते रहेंगे।

लेखक भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार व धर्मविद हैं |

रमेश तिवारी


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