दूसरे गांधी – बादशाह खान (जंगपसंद पठानों को बना दिया शांतिप्रिय)

 

भारत में अनेक ऐसे महापुरुष हुए हैं, जिनके बारे में अधिकतर लोगों को कुछ पता ही नहीं है और अगर है भी तो उनका बहुत नाम नहीं लिया जाता. ऐसे ही एक महापुरुष खान अब्दुल गफ्फार खान हुए हैं, जिन्हें प्यार से बादशाह खान भी कहा जाता था.

बादशाह खान ने अपने जीवन में जो कार्य किये वे नयी पीढ़ी के लिए अजूबा से कम नहीं. खूंखार और जंगपसंद पठानों को अहिंसा का पुजारी बना देना निश्चय ही असंभव-सा लगता है. पर यह एक ऐतिहासिक तथ्य है जिसे हम झुठला भी नहीं सकते. उनका “खुदाई खिदमतगार” संगठन हिंसा से पागल दुनिया के लिए एक अनोखी मिसाल है.

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सोचता हूँ कि वह क्या बात थी इस व्यक्ति में जिसने दिलों को हिंसा और नफरत से खाली कर मोहब्बत से भर दिया? वह कौन सी अंदरूनी ताकत थी, जिसके बल पर ताजिन्दगी ज़ुल्म सह कर भी यह महापुरुष अपने चुने रास्ते पर चलता रहा और दिलों को इस तरह जीता कि -“”बादशाह खान” बन गया?

बादशाह खान सही मायने में गांधी के अनुयायी थे. ऐसे अनुयायी थे कि गांधी को आत्मसात कर गये. उनमें गांधीजी जैसी इतनी बातें आ गयीं कि दुनिया ने उन्हें “”दूसरा गांधी” कहा. अपने सिद्धांतों और अपने विश्वास पर उन्हें इतना विश्वास था कि उनके पालन में उन्होंने अपने जीवन के हर एक पल को समर्पित कर दिया. यह अपूर्व एकनिष्ठता और आत्मा के प्रति ईमानदारी बादशाह खान की सबसे बड़ी विशेषता थी, जिसने उनकी अंदरूनी ताकत को जगा दिया और वे “बादशाह खान” बन गये।

संस्मरणों में मैंने पढ़ा है कि बादशाह खान ऐसे लोगों से चिढ़ते थे, जिन्होंने बापू के सिद्धांतों को ओढ़ लिया है, और जो उनके द्वारा जिये गये उन शाश्वत मूल्यों की अवहेलना कर रहे हैं,जिन पर बापू का सारा दर्शन आधारित है. बादशाह खान ने गांधीजी के दर्शन को उसकी पूर्णता में आत्मसात किया और यही वजह थी कि उन्होंने मानव-मानव में भेद नहीं किया.

देश की आजादी के लिए बादशाह खान ने गांधीजी के कंधे से कंधा मिला कर संघर्ष किया. यह आधुनिक भारत के इतिहास का सबसे गौरवमय काल था. सारा देश सब कुछ भूलकर जंगे-आजादी में कूद पड़ा और आजादी हासिल की. पर इस उल्लास के साथ ही साथ हमारा वह दुर्भाग्यपूर्ण दौर आया. हमारा सिर आज भी शर्म से झुक जाता है। यह दौर था हिन्दू-मुस्लिम दंगों और विभाजन का.

विभाजन के बाद हालांकि बादशाह खान पाकिस्तान में ही रहे, पर उन्होंने कभी इस भौगोलिक विभाजन को स्वीकार नहीं किया. उन्होंने भारत को ही अपना घर माना और इस देश के कल्याण के लिए चिंतित रहे.

बादशाह खान को यदि सबसे ज्यादा कोई बात पीड़ा पहुंचाती रही तो वह थी भारत में हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य. भारत में कभी भी दंगा होता, तो उन्हें ऐसा लगता था कि दंगे में चल रहे हथियार उनके ही मर्म पर लग रहे हैं. विभाजन के 22 साल बाद अक्टूबर, 1969 में जब वे भारत आये और तीन महीने यहां रुके, तो उन्होंने भारत में फैले साम्प्रदायिक विद्वेष, हिंसा और आपसी नफरत के खिलाफ तीन दिन का उपवास करने की घोषणा की. उनका स्वास्थ्य नाजुक था और डाक्टर इसके बिल्कुल पक्ष में नहीं थे, पर उन्होंने उपवास किया. इसी समय उन्होंने अपने भारत आने का मकसद भी बताया था. उन्होंने कहा “”मैं तुमसे दौलत मांगने नहीं आया, मैं पख्तूनिस्तान बनाने में तुम्हारी मदद मांगने भी नहीं आया. मैं केवल तुम्हें वो रास्ता याद दिलाने आया हूं जो गांधीजी ने बताया था. मैं यहां यह जानने आया हूं कि तुमने राष्ट्रीय जीवन में बापू के बताये रास्ते का कितना पालन किया है. यहां मैं भारत के प्रति प्रेम और गांधीजी की याद के वशीभूत आया हूं”.

उनकी इन बातों से यह साफ पता चलता है कि उन्हें भारत से कितना प्रेम था.वह हमारे दुख-सुख में बराबर सहभागी बने रहे. कांग्रेस के शताब्दी समारोह में उन्होंने सहर्ष भाग लिया. अपने अंतिम दिनों में “”बाम्बे अस्पताल” में दाखिल रहते हुए भी उन्होंने भारत में बढ़ रहे साम्प्रदायिक उन्माद पर गहरी चिन्ता और दु:ख व्यक्त किया.

भारत और पाकिस्तान में बढ़ती दूरी और सामाजिक, राजनीतिक जीवन में बढ़ते पाखंड के कारण बादशाह खान हमेशा क्षुब्ध रहते थे.वे चाहते थे मूल्यों पर आधारित आदर्श समाज, जो गांधीजी का एक मात्र सपना था. वे भारत के लोगों में चारित्रिक दृढ़ता और निश्छलता देखना चाहते थे. पद और प्रतिष्ठा के प्रति उनकी नि:स्पृहता दुर्लभ थी। यही बात वे राजनेताओं में भी देखना चाहते थे.

बादशाह खान आज इतिहास बन गए हैं. उनको हमारी सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम अपने आपसी वैमनस्य को भुलाकर मिलकर साथ रहने की एक ऐसी मिसाल कायम करें कि सारी दुनिया उसकी कायल हो |

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