बघेलखण्ड : पौराणिक इतिहास, सभ्यता और संस्कृति : शेषावतार लक्ष्मण की राजधानी

बघेलखण्ड : इतिहास सभ्यता और संस्कृति : शेषावतार लक्ष्मण की राजधानी

बघेलखण्ड का इतिहास अत्यंत प्राचीन और गरिमामय रहा है। यहां पाषाण काल के चित्रों तथा पत्थर के हथियारों के अवशेष प्राप्त हुये है। महाभारत तथा रामायण काल में इस क्षेत्र का इतिहास स्पष्ट रूप से मिलता है। वाल्मीक रामायण में मैकल प्रदेश और विराट प्रदेश के नाम से इस भू-भाग का उल्लेख मिलता है। बौद्धकाल में यह प्रदेष ‘‘मज्झिम प्रदेश’’ के अंतर्गत था। बघेलखण्ड में सम्राट अशोक द्वारा निर्मित भरहुत के ऐतिहासिक बौद्ध स्तूप है, जिससे स्पष्ट है कि यह क्षेत्र प्रसिद्ध साम्राज्य का अंग था। चैथी तथा पांचवी शताब्दी में यह क्षेत्र मगध के गुप्त सम्राटों के अधीन रहा जिसके पश्चात इस क्षेत्र में कल्चुरी, चेदि तथा हैहय वंष के राजाओं ने राज्य किया। ईसा के बारहवीं शताब्दी तक कल्चूरी राजा इस क्षेत्र के भाग्य विधाता रहे, तत्पश्चात लगभग 100 वर्षों तक यह क्षेत्र चैहानों, सेंगरों तथा गोड़ों के हाथो में रहा। तेरहवीं शताब्दी में इस क्षेत्र पर बघेल राजपूतों का अधिपत्य हुआ।

 

 

 

 

बघेलखण्ड के इतिहास का पल्लवन वैदिक सभ्यता और संस्कृति से हुआ है भृगुपुत्र शुक्र दैत्य याजक था। शुक्र की पुत्री देवयानी ययाति को ब्याही थी। देवयानी से यदु और तुर्वशु दो पुत्र पैदा हुए। जीवन के अंतिम पड़ाव में ययाति ने अपना राज्य पुत्रों के बीच बॉटकर भूगु श्रृंग पर तपस्या करने चले गये। “महाराज ययाति चौदह दीपों के स्वामी थे। उन्होंने अपना राज्य इस प्रकार अपने पुत्रों में बाट दिया- दक्षिण-पूर्व के भूभाग का राज्य तुर्वशु को दिया। यहाँ आज कल रीवा रियासत है।
बघेलखण्ड और रीवा रियासत परस्पर पर्यायवाची से है शिव संहिता में इस भूखण्ड का उल्लेख ‘अरुणाचल’ नाम से है। इसे शेषावतार लक्ष्मण राजधानी माना गया है। अंचल में लक्ष्मण की उपासना लोकप्रिय है। सीधी-शहडोल के गोंड आदिवासियों में लछिमन जती का कथानक बहु प्रचलित है। वनवास काल में इस अंचल में राम, लक्ष्मण और सीता को कुछ काल के लिए निवास करना पड़ा था।
इन्द्रकामिनी नामक अप्सरा ने लक्ष्मण का ब्रह्मचर्य व्रत भंग करने का छल किया। उसने लक्ष्मण के बिस्तर पर अपना कर्णाभूषण डाल दिया। प्रातः काल जब सीता लक्ष्मण को भोजन कराने आयी तो उन्हें यह कर्णाभूषण दिख गया। सीता ने इस प्रसंग को राम से उजागर किया। राम ने जैतपुर अंचल के गोंड परिवारों को एकत्र कर कर्णाभूषण की पहचान करायी कर्णाभूषण किसी भी गोंड आदिवासी स्र्त्री के कान में ठीक से नहीं हुआ। अंत में सीता के कानों के साथ कर्णाभूषण का परीक्षण किया गया और वह उपयुक्त पाया गया। इससे राम के मन में लक्ष्मण और सीता के सम्बन्ध के प्रति सन्देह जाग उठा। राम ने गोंडों की सहायता से निकटवर्ती जंगल से लकड़ी इकट्ठा कराकर आग जलवाई और उसी में लक्ष्मण को झोंक दिया। निकला लक्ष्मण को अग्नि न जला सकी किन्तु लक्ष्मण का हृदय आत्मग्लानि से भर गया। भीष्म पर्व अध्याय चार में पाली गाँव के निकट महाभारत कालीन खण्डहरों के अवशेष पाये जाने का उल्लेख है।
पाली शहडोल जिला बघेलखंड-अंतर्गत का एक गाँव है। “बघेलखण्ड के इतिहास के केन्द्र में बान्धवगढ़ है। बान्धवगढ़ रीवा राज्य का सुदृढ़ एवं दुर्गम दुर्ग है। यह दुर्ग सागर सतह से 2664 फीट ऊँचे पर्वत पर स्थित है। पुरातत्व की दृष्टि से भी इसका वैशिष्ट्य उजागर है। बघेल शासकों के पूर्ववर्ती नरेशों के लिए यह महत्वपूर्ण दुर्ग था। तेरहवीं शताब्दी में महाराज कर्ण देव को यह किला कलचुरि नरेश से दहेज के रूप में प्राप्त हुआ था। बघेलों के समृद्धि के केन्द्र बांधवगढ़ ने अनेक युद्धों को देखा था सन 1498-99 में सिकन्दर लोदी ने तत्कालीन शासक से अप्रसन्न होकर इस पर आक्रमण किया था। लेकिन असफलता उसे ही मिली। कहा जाता है कि अकबर का जन्म यहीं पर हुआ था।”

 

The Imperial Gazetteer Vol. VI p. 358 प्राचीन ग्रंथों में बघेलखण्ड का एक नाम ‘कर’ मिलता है करुष का शाब्दिक अर्थ ‘क्षुधा होता है। बघेली लोकजीवन अभावों और संकटों से जस्त रहा। अतः करुप (क्षुधा) नामकरण की सार्थकता सिद्ध होती है। जनश्रुति है कि करुष नाम इन्द्र ने दिया था डॉ. वासुदेव शरण ने भारत सावित्री नामक पुस्तक में उपरोक्त कथन की पुष्टि की है. “बघेलखण्ड का बड़ा भाग करुष जनपद था, जहां अनेक जंगली जातियों पहले और आज भी बसती है।”
प्रागैतिहासिक काल के साहित्यिक और सांस्कृतिक साक्ष्य करुषांचल (बघेलखण्ड) की घाटियों में मौजूद हैं। ऐतिहासिक काल में यह जनपद मगध साम्राज्य के अन्तर्गत आ गया। चाणक्य की चर्चित कृति अर्थशास्त्र में कर जनपद के हाथियों का वर्णन मिलता है मगध साम्राज्य के पतन के बाद गुप्त साम्राज्य का उत्कर्ष हुआ। इस काल में यह अंचल आटवि राज्यों के अधीन था जो समयान्तर में गुप्त साम्राज्य का अंग हो गया। गुप्त साम्राज्य के अनन्तर यह भूखण्ड सम्राट हर्षवर्धन के अधिपत्य में रहा। बघेलखण्ड में वाकाटक नृपतियों का अधिपत्य काल उल्लेखनीय है। 250 वर्षों तक वाकाटक नरेशों का उत्कर्ष काल रहा। वाकाटकों ने गुप्त सम्राटों की शासन व्यवस्था, कला और संस्कृति का अनुसरण किया।
अजन्ता और एलोरा की चित्रकला वाकाटकों की देन है। विन्ध्यशक्ति वाकाटक राज्य का संस्थापक हुआ। विन्ध्य की उपत्यका में स्थित स्थान से विकसित वाकाटक वंश की प्रभुता मालवा से महाराष्ट्र और अरब सागर से लेकर बंगाल की खाड़ी  तक फैली थी। उच्चकल्प महाराज बघेलखण्ड में वाकाटकों के मण्डलीक थे। इन दिनों बघेलखण्ड का उत्तरी भाग परिखजक और दक्षिणी भाग पाण्डुओं के आधिपत्य में था। बघेलखंड में कलचुरियों का आधिपत्य होने पर वाकाटकों का प्रभाव अस्त हो गया। कलचुरी नरेशों के आधिपत्य से गुजरता हुआ यह भूखण्ड तेरहवीं शताब्दी में बघेलों के नियंत्रण में आया।
विन्ध्यपृष्ठाश्रयी जनपद बघेलखण्ड के एक छोर में आम्रकूट (अमरकंटक) और दूसरे छोर में चित्रकूट अवस्थित है। मामीण सभ्यता और संस्कृति वाला यह जनपद अपनी निजता के साथ पर्वत मालाओं से आवेष्टित है। इसके उत्तर में इलाहाबाद, पूर्व सीमा में छत्तीसगढ़ की रियासत और मिर्जापुर के कुछ जिले हैं। पश्चिम में जबलपुर के कुछ जिले तथा दक्षिण में मण्डला बिलासपुर स्थित है। कहा जाता है कि “विलासा’ नाम की मल्लाहिन ने ‘विलसिया’ गांव बसाया था। बघेल राजा विलास देव ने इस गाँव को शहर के रूप में विकसित कर बिलासपुर नाम दे दिया। विलासदेव (लगभग वि.सं. 1300-1325) बघेल वंश की पांचवीं पीढ़ी में आते हैं।

कोठे, सोहावल, मैहर, बरौधा, जसो और नागौद की रियासतें बघेलखण्ड की परिधि में आती हैं सम्प्रति प्रशासनिक दृष्टि से बघेलखण्ड के अन्तर्गत रीवा, सतना, सीधी और शहडोल चार जिले आते हैं। इलाहाबाद से प्रकाशित साप्ताहिक बघेली ‘प्रउत’ में छपे मानचित्र के अनुसार बघेलखण्ड के अन्तर्गत सोनभद्र, मिर्जापुर, इलाहाबाद रीवा, सीधी, सतना, शहडोल, जबलपुर, मंडला, सिवनी और नरसिंहपुर प्रखण्ड आते हैं।
इस जनपद की सभ्यता – कौशम्बी, मातृभाषा -बघेली, लिपि – श्री हर्ष लिपि है। व्याघ्रदेव बघेल वंश के मूल पुरुष हैं।
व्याघ्राकृतिष्यंप्रदेव, स्तास्मात बाघेल वंशभूः । ‘बापेल नम्नि मामेण, बाघेलः शब्दमागतः।’
डॉ. शिव कुमार धर द्विवेदी के अनुसार  (बाघ की आकृति उनकी रूपरेखा थी इसलिए उन्हें व्याध्र देव कहते थे। और इसके बाद का वंश वार्षिक कहा जाने लगा अथवा ‘बघेला’ माम प्राप्ति के कारण बघेल शब्द प्रचलित हुआ।)
बघेलखण्ड नामकरण में निम्नलिखित शब्दों का सांकेतिक सन्दर्भ निहित है –
मेला
बघेलवारी
बघेलान बघेला – अन्हलपाटन के सोलंकी अनाज को सम्वत् 1220 में बघेला या व्याघ्रपाली माम जागीर में मिला था।
सम्वत 1233-34 में व्याघ्रदेव बघेल ने बलवारी की बस्ती बसायी। बघेलान – बघेलवारी बस्ती के 22 किमी. दक्षिण का आंचल बघेलान कहलाया।
फुलवारी -मुगल काल में बघेलखण्ड नाम प्रायः लुप्त रहा। 1853 में ‘मौन’ कवि ने बघेलखण्ड शब्द का प्रयोग किया। इसके बाद बघेलखण्ड नाम की निरन्तरता पाई जाती है। सन् 1862 में बघेल खण्ड का क्षेत्र विस्तार सुनिश्चित हो गया। सन् 1871 में कर्नल एडवर्ड कालबोर्न बाड कोर्ट पोलटिकल एजेन्ट के अनुज्ञा-पत्र में ‘बघेलखण्ड’ शब्द पहली बार प्रयुक्त हुआ।
4 पीढ़ी तक बघेल शासकों की सत्ता रही। महाराजा मार्तण्ड सिंह बघेलवंश के अंतिम नरेश रहे। बघेलराज वंश की रानियों की शौर्यगाथा इतिहास में अमर है। महाराज अजीतसिंह का रानी कुन्दन कुंवरि की ललकार से नैकहाई का युद्ध जीता गया, यशवन्त राव नायक (पूना) का शिरच्छेदन हुआ।
बलाई लाग जबानी सुनिकै, कुन्दन कुंवरि केरि फटकार ।
फरफराइ तो कूदि परे सब, लई-लई, भाला-ढाल-कटार॥
दुपहरिया का सुदिन पाइ कड़, घेरा दिहिन दड़ि कई डारि ।
हाथेकड करछुली करचुली, नायक केर सिर लिहिन उतारि।।
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