बजरंग दे- कछवाहा वंश की वीर राजपूत कन्या

बजरंग दे- कछवाहा वंश की वीर राजपूत कन्या

बजरंग राजस्थान के कछवाहा वंश की वीर राजपूत कन्या थी।इनका विवाह मारवाड़ राज्य के आलनियावास गाँव के ठाकुर विजय के साथ हुआ। ठाकुर विजय सिंह की मृत्यु हो जाने के पश्चात् अपने ठिकाने की रक्षा का भार बजरंग दे ने अपने कन्धों पर उठा लिया। वह मर्दाना वेशभूषा धारण कर सारी व्यवस्था स्वयं देखती थी। उसने केवल मर्दाना वेश भूषा ही धारण नहीं किया, अपितु मर्दो के समान अश्वारोहण तथा शस्त्रचालन की कला में भी निपुणता प्राप्त कर ली। उसने अपने ठिकाने की देख-भाल तथा चौकसी बहुत कुशलता से की और चारों ओर अपनी कार्यकुशलता तथा वीर भावना की धाक जमा दी।

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यह औरंगजेब के शासन काल की घटना है। जोधपुर नरेश जसवंतसिंह प्रथम की मृत्यु हो जाने के पश्चात् मारवाड़ पर मुगल शासन स्थापित हो चुका था। दुर्गादास राठौर जसवंत सिंह के नाबालिठा पुत्र अजीत सिंह की रक्षा करते हुए मारवाड़ राज्य की स्वाधीनता के कार्य में लगा हुआ था। मुगलों का आतंक चारों ओर फैला हुआ था, किन्तु बजरंग दे निर्भीक होकर अपने ठिकाने की रक्षा तथा उन्नति में दत्तचित्त थी। बजरंग दे वीर तथा कुशल नेत्री ही नहीं, स्वाभिमानिनी भी थी। अपने पति की मृत्यु के पश्चात् उसने आलणियावास ठिकाने का कर देना और मारवाड़ राज्य की चाकरी भरना बन्द कर दिया।
इधर अजीत सिंह बालिग होकर शासक बन गया, किन्तु दुर्गादास राठौर राज्य के स्थायित्व तथा समृद्धि के लिए प्राण पण से जुटा हुआ था। उसने राज्य की आय-वृद्धि के लिए आलणियावास ठिकाने के बन्द कर को पुनः प्रारम्भ करने के लिए, बजरंग दे को धमकी-भरा पत्र लिखा, किन्तु बजरंग दे ने निर्भीकता से उसे नकार दिया। अन्त में दुर्गादास ने बजरंग दे को नारी समझकर, भयभीत करने के लिए सैन्य शक्ति का प्रदर्शन किया। बजरंग दल अपनी छोटी, किन्तु संगठित सेना को लेकर रीयां नदी के तट पर दुर्गादास की सेना का मुकाबला करने के लिए मैदान में आ डटी। उसकी वीरता, साहस और कुशल सैन्य-संचालन के परिणामस्वरूप दुर्गादास जैसे इतिहास प्रसिद्ध वीर सैनिक को भी पीछे
हटना पड़ा। इस मुकाबले में बजरंग दे की विजय हुई। उसने जीवन-पर्यन्त अपनी आन-बान तथा मर्यादा पर आँच नहीं आने दी।

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