एक मंदिर जिसका रहस्य विज्ञान भी न जान पाया

हरिहरेश्वर मंदिर में बसाल्ट की चट्टानों कैसे हुआ उपयोग ?  लेथ मशीन के बिना कैसे बनी ऐसी आकृतियाँ? 

जिस पत्थर का उपयोग विज्ञान भी नहीं कर पाया उससे बना डाला एक खूबसूरत मन्दिर

हिन्दू धर्म में, विष्णु (हरि) तथा शिव (हर) का सम्मिलित रूप हरिहर कहलाता है।

इनको शंकरनारायण तथा शिवकेशव भी कहते हैं। विष्णु तथा शिव दोनों का सम्मिलित रूप होने के कारण हरिहर वैष्णव तथा शैव दोनों के लिये पूज्य हैं।



कर्नाटक के हरिहरेश्वर मंदिर में इसी हरिहर देव की पूजा की जाती है । ये मंदिर हरिहर नगर स्थित है ,जो कर्नाटक के दावणगेरे जिले का एक शहर है। मंदिर को बसाल्ट की चट्टानों से काटकर बनाया गया है । इसका निर्माण पल्लव_वंश द्वारा 1223-24 CE (हिजरी सन) में करवाया गया। मंदिर की शैली होयसला वास्तुकला का चमत्कार है, शायद चमत्कार कहना इसका कमतर आँकलन करना होगा; क्योंकि ये उन्नत तकनीकी का एक विशिष्ट उदाहरण है, और Sound Wave के 3d मॉडल से इसकी अकल्पनीय समानता इसे सभी मंदिरों से बहुत विशेष बना देती है ।

इसको बनाने का कारण, तरीका कितना उन्नत रहा होगा। वैज्ञानिक कहते हैं कि इसे लेथ_मशीन पर डाल कर बनाया गया है, तो ये सोचिए कि बसाल्ट चट्टानों को तराशना कितना कठिन रहा होगा! उतनी उन्नत और विशाल लेथ मशीन हमारे पूर्वजों ने विकसित कैसे की? यदि विकसित कर भी ली तो, इसे तराशा कैसे ? उसे मंदिर स्थापना में कैसे इस्तेमाल किया ??

विशेष: ज्वालामुखी विस्फोट के दौरान जब लावा सतह की तरफ फेंक दिया जाता है,तब लावा के सूखने के बाद इन पत्थरों का निर्माण होता है। शीघ्र ठन्डे होने के कारण इन पत्थरों का क्रिस्टलीकरण नहीं हो पाता। बासाल्ट इस प्रकार का पत्थर है। भारत के प्रायद्वीप भाग में डेक्कन पठार में बसाल्ट पत्थर अधिक मात्रा में मिलते हैं। इन पत्थरों में लोहा, एल्युमीनियम एवं मैंगनीज़ के ऑक्साइड पाए जाते हैं,जिससे इनका घनत्व काफी होता है एवं यह गहरे रंग के होते है। ये पत्थर बेहद मजबूत होने के कारण इन्हें शेप देना एक बेहद कठिन कार्य है फिर इसे आकार देना और उससे भी बढ़कर उसका इस्तेमाल करना ।


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