घर जोड़कर रखने मे बशर टूट जाता है – दिनेश मालवीय “अश्क “

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घर जोड़कर रखने मे बशर टूट जाता है
वो अगर टूटे न तो घर टूट जाता है।

तंगहाली मुफलिसी क्या चीज़ है मत पूछ
रिश्ता नाता वास्ता हर टूट जाता है।

टूटता है जब कोई आईना कहीं पर
कुछ कहीं मेरे भी अंदर टूट जाता है।

जब सुख़न की होती है तौहीन बज्म मे
मेरे भीतर का सुख़नवर टूट जाता है।

हो महल कोई बना बुनियाद पर कच्ची
जल्द ही वो भरभरा कर टूट जाता है।

पहले सा रहता नहीं कितनी हो कोशिश
रिश्ता कुछ एक बार अगर टूट जाता है।

होती है क़िस्मत बुरी ही बाज रिन्दों की
हो कभी जो मय तो साग़र टूट जाता है।

 

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