भगवान राम की छवि खराब करने के लिए जोड़े गये “सीता परित्याग”, “शम्बूक वध प्रसंग: दिनेश मालवीय

भगवान राम की छवि खराब करने के लिए जोड़े गये “सीता परित्याग”, “शम्बूक वध प्रसंग

कुमार विश्वास बिल्कुल सही कहते हैं

:दिनेश मालवीय
वर्तमान में हिन्दी काव्यों के महानायक कहे जाने वाले कुमार विश्वास ने रामायण पर बहुत सुन्दर व्याख्यान श्रृंखला शुरू की है. वह इस बात को बहुत तार्किकता से प्रमाणों के साथ बताते हैं कि रामायण में उत्तर रामायण में वर्णित राम द्वारा सीता के परित्याग और शम्बूक वध के प्रसंग शरारतन जोड़े गये हैं. इसका मकसद भगवान राम को स्त्रीविरोधी, दलितविरोधी, आदिवासी विरोधी आदि बताकर उनकी छवि को खराब करना है.

कुमार विश्वास अनेक उद्धरणों के माध्यम से बताते हैं कि राम का जो व्यक्तित्व है, वह ऐसा है ही नहीं कि वह किसी एक व्यक्ति द्वारा कही हुयी बात कारण अपनी प्राणप्रिय पत्नी का परित्याग कर दें. कुमार विश्वास वाल्मीकि रामायण से उधरण देते हुए बताते हैं, जिसमें राम सीता से कहते हैं कि तुम्हारे बिना तो में स्वर्ग में भी नहीं रह सकता. क्या राम इतने निर्दयी और विवेकहीन थे कि अपने लिए सारी सुख-सुविधाओं का त्याग कर पतिधर्म का पूरी निष्ठा से पालन करने वाली पत्नी को एक धोबी या किसी भी अन्य व्यक्ति के कुछ कहने पर त्याग देंगे?

kumar vishvas

शरारती तत्वों ने सीता परित्याग के प्रसंग को इस तरह प्रस्तुत किया है कि सीता को बताया तक नहीं गया कि उनका परित्याग किया जा रहा है. लक्ष्मण उन्हें वन दिखाने के बहाने ले जाते हैं और कहीं जंगल में छोड़ आते हैं, कितनी मूर्खतापूर्ण बात है! यदि वनवास ही देते तो उनके लिए कोई उपयुक्त व्यवस्था अवश्य करते राम भी जानते थे कि सीता गर्भवती हैं. राम दवारा किसी भी कारण से अपनी गर्भवती प्रिय पत्नी को को इस तरह त्यागने की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती.

इसके अलावा "उत्तर रामायण" की भाषा और शैली वाल्मीकि से बिल्कुल मेल नहीं खाती, थोड़ी भी समझ रखने वाले को दोनों में अंतर स्पष्ट नज़र आ जाएगा.

इस झूठी कथा को सुनियोजित रूप से खूब जमकर प्रचारित किया गया. खूब फिल्में भी बनीं. असाधारण रूप से लोकप्रि "रामायण सीरियल के 'रामभक्त" निर्माता भी "उत्तर रामायण बनाकर पैसा कमाने का लोभ संवरण नहीं कर पाए.

"उत्तर कांड काल्पनिक है, यह बात से भी प्रमाणित होती है कि तुलसीकृत रामचरितमानस में भी किसीने बहुत शरारत के साथ "लवकुश काण्ड" जोड़ दिया. तुलसीदास ने खुद लिखा है कि "एहि मह रुचिर सप्त सौपाना", यानी की 'रामचरितमानस में सात अध्याय हैं. सातवे काण्ड के रूप में उत्तर कार्ड" लिखकर उन्होंने रामचरितमानस का समापन कर दिया.


लेकिन "रामचरितमानस" की अनेक प्रतियों में "लवकुश काण्ड” जुड़ा हुआ मिलता है. सीता की पवित्रता को राम से अधिक कौन जानता था? यह संभव नहीं है.

इसी तरह "रामायण में राम द्वारा शम्बूक वध के प्रसंग हो भी राम और सनातन संस्कृति से विरोध रखने वालों ने एक साजिश के तहत जोड़ दिया गया है. जरा सोचकर देखिये कि निषाद, केवट, वानरों आदि को गले लगाने वाले राम किसी एक व्यक्ति के कहने पर शम्बूक का वध कैसे कर सकते हैं? राम ने गिद्धराज को पिता के सामान सम्मान देकर पूरे विधि-विधान से एक पुत्र की तरह उनका अंतिम संस्कार किया. शबरी के प्रेम से वशीभूत होकर उसके जूठे बेर तक खाए. निषाद जैसे व्यक्ति को अपना परम मित्र माना. सच पूछिए तो राम जैसा आदर्श व्यक्ति भारत ही नहीं संसार में कोई नहीं हुआ. उनके जैसा न्यायप्रिय और सत्यनिष्ठ राजा तो कहीं देखा-सुना ही नहीं गया.

Lord Ram-min
इन सारे तथ्यों और सामान्य समझ से यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है कि "रामायण" में उपरोक्त दो प्रसंग सनानत धर्म-संस्कृति के सबसे बड़े आदर्श भगवान् राम की छवि खराब करने के लिए षड्यंत्र के तहत जोड़े गये. हमारे पूर्वज युगों-युगों से उन्हें भगवान् के रूप में पूजते आ रहे हैं. आज भी राम ही सनातन धर्म के सबसे बड़े आदर्श हैं और हमेशा रहेंगे.


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