भगवान् श्रीराम की अद्भुत बाल लीलाएं -दिनेश मालवीय

भगवान् श्रीराम की अद्भुत बाल लीलाएं

-दिनेश मालवीय

यह बात तो हर सनातनधर्मी मानता है कि श्रीराम भगवान श्रीविष्णु के अवतार हैं. उन्होंने रावण और अन्य राक्षसों से धर्म की रक्षा के लिए मानव अवतार लिया था. मानव के रूप में उन्होंने आजीवन मानव जीवन के सभी सुख-दुःख एक सामान्य मानव की तरह भोगे, भले ही वे लीला स्वरूप में हों. उनके जीवन की लगभग सभी घटनाओं के विषय में व्यापक रूप से जानकारी उपलब्ध है, लेकिन उनकी बाल लीलाओं के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं. गरुण के साथ उनकी बाल लीलाओं और क्रीड़ाओं का रामचरित मानस में बहुत सुंदर वर्णन है. उनकी इन लीलाओं में दिव्यता के भी दर्शन होते हैं.

सूरदास ने श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का इतना सजीव चित्रण किया है कि सदियों बाद भी उनकी सरसता वैसी ही बनी हुयी है. संत तुलसीदास ने भी श्रीराम की कुछ बाल लीलाओं का वर्णन किया है. उनका पद “ठुमुक चलत रामचंद्र बाजत पैजनियाँ” तो बहुत लोकप्रिय है. लेकिन बालरूप में श्रीराम की ऐसी बहुत बाल लीलाएं हैं, जिनके बारे में लोग कम ही जानते हैं.

आइये, हम श्रीराम की कुछ अल्पज्ञात बाल लीलाओं का आनंद लेते हैं.

बंदर ही चाहिए

एक दिन एक बंदर वाला आया. उसने राजा दशरथ के महल के द्वार पर बंदर को नचाकर दर्शकों का खूब मनोरंजन किया और पुरस्कार लेकर चला गया. बाल रूप में भगवान श्रीराम ने बालहठ ठान ली कि मुझे बंदर चाहिए. उनके पिता ने दुनियाभर की चीजों के नाम गिना कर कहा कि हम उन्हें मँगवा देते हैं. लेकिन बलहठ तो बालहठ है. तब वशिष्ठजी ने कहा कि किष्किन्धा में रहने वाले सुग्रीव के पास एक बंदर है. उसे मँगवा लेते हैं. राजा ने दूत भेजकर सुग्रीव से अनुरोध किया कि वह वानर अयोध्या भेज दें. सुग्रीव सहर्ष तैयार हो गया और उसने हनुमानजी को भेज दिया. उन्हें देखकर भगवान श्रीराम ने उसे ह्रदय से लगा लिया.

श्रीराम बाल रूप में उस वानर यानी हनुमानजी को अपने साथ रखते थे. हनुमानजी ने भी छोटा-सा रूप रख लिया था.

श्रीराम की पतंग इन्द्र्लोक में

एक बार श्रीराम पतंग उड़ा रहे थे. उड़ते-उड़ते वह पतंग इन्द्रलोक तक पहुँच गयी. इंद्र के पुत्र जयंत की पत्नी ने इस अद्भुत पतंग को देखा और विचार किया कि जिसकी यह पतंग इतनी सुंदर है, वह स्वयं कितना सुंदर होगा. यह विचारकर उसने पतंग पकड़ ली.

श्रीराम ने हनुमान को भेजा कि देखो तो मेरी पतंग किसने पकड़ी है. हनुमानजी ने जाकर देखा और जयंत की पत्नी से पतंग छोड़ने को कहा. उस स्त्री ने कहा कि मैं उसके दर्शन करना चाहती हूँ, जिसकी यह पतंग है. हनुमानजी ने यह बात प्रभु को बतायी. श्रीराम बोले कि उससे जाकर कहना कि उसे चित्रकूट में हमारे दर्शन होंगे. हनुमानजी ने यह उसे बतायी तो उसने पतंग छोड़ दी.

नग कुएं में फैंका

एक दिन एक व्यापारी अनमोल नग बेचने आया. वह राजा को एक नग दिखला रहा था. उसे लेकर श्रीराम ने बाल लीला करते हुए नग कुएं में फैंक दिया. व्यापारी ने कहा कि वही नग चाहिए. तत्काल कुएं से एक वृक्ष उत्पन्न हुआ, जिसमें अनमोल लाल लगे थे. वे फल की तरह गिरने लगे और उन्हें नर-नारी ले जाने लगे. यह लूट सात दिन तक चलती रही, लेकिन वह वृक्ष दिखायी नहीं पड़ रहा था.

अद्भुत पक्षी

एक दिन एक व्याध एक अद्भुत पक्षी लेकर आया. उसने उसे राजा को दिखलाया. श्रीराम ने उसे उड़ा. व्याध ने कहा कि मुझे वही पक्षी चाहिए. यह सुनकर श्रीराम ने पृथ्वी में उसका पंख गाड़ दिया और उसका तुरंत वृक्ष उग आया. उसमें फल लगने लगे और फूटकर उनसे पक्षी निकल कर उड़ने लगे. वे महलों में बैठते और बालकों के संग दौड़ने लगे. पुरवासियों ने भी वे पक्षी पाले. देश-विदेश के राजा भी इन पक्षियों की अद्भुतता को सुनकर उन्हें अपने देश ले गये.

शूकर को दिव्य शरीर

एक दिन एक शूकर घुरघुराता हुआ श्रीराम के सन्मुख आया. उन्होंने उसका पैर पकड़ कर पृथ्वी पर पटक दिया. उसका शरीर तुरंत दिव्य हो गया. उसने स्तुति करके अपनी कथा सुनाई कि मैंने हरिभक्तों को सिर नहीं नवाया, जिसके कारण यह शरीर प्राप्त हुआ. आज आपके दर्शन से मुझे अपना दिव्य शरीर वापस मिल गया.

शेर से गाय की रक्षा

एक दिन एक शेर ने दौड़कर एक ब्राह्मण की गाय पकड़ ली. तब श्रीराम ने उसे पाँच पवित्र वाण मारे. उन वाणों के लगते ही वह सुंदर गन्धर्व हो गया. अपना रूप पाकर उसने बताया कि, मैं एक गन्धर्व था. मैंने नारदजी का उपहास उड़ाया था. उनके शाप से यह देह पायी. आपके दर्शन से मेरे दुःख मिट गये. ऐसा गहकर वह श्रीराम को शीश नवाकर अपने लोक को चला गया.

रावण दारा बालक श्रीराम को मारने का प्रयास

एक दिन भगवान् श्रीराम अपने भाइयों और मित्रों के साथ सरयू नदी में स्नान कर रहे थे. उसी समय रावण का भेजा एक राक्षस मगर रूप में उन्हें निगल गया. प्रभु उसे मार कर उसके शरीर से बाहर आ गये. यह सुनकर सभी पुरवासी सुखी हुए. उसी समय पक्षी का रूप धारण कर रावण आया और उसने घात लगाकर श्रीराम को उठाना चाहा. श्रीराम ने उसे बिना फर का वाण मारा, जिससे वह लंका में जाकर गिरा और मूर्छित हो गया. सात दिन बाद वह मूर्छा से जागा तो उसे श्रीराम का प्रताप समझ मन में बहुत लज्जा हुयी.

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