भक्ति क्यों करें? भजन से क्या मिलेगा? 

भक्ति क्यों करें? भजन से क्या मिलेगा? 

SantanPrayer-Newspuran

धर्म ग्रंथों जहाँ अवसर मिले वहीं श्रीहरि का भजन, स्मरण करने का परामर्श दिया है। यदि  हम देखें तो यज्ञ-याग इतने खर्चीले, समय साध्य व श्रम साध्य है कि इनका सम्पादन करना कलियुगी मानवों के लिये संभव नहीं है यज्ञ-यागादि में सूक्ष्म जीवों का जौहर होना भी संभव है, चाहे कितनी ही सावधानी क्यों न बरती जाये। 

वस्तुतः भगवन्नाम-जप बीज वपन के समान है। बीज वपन करने पर ही खेती से अन्न मिलता है। इसी प्रकार भगवन्नाम-जप करने से ही भगवत्प्राप्ति होती है।

भक्ति की बराबरी करने वाला दूसरा कोई साधन नहीं है 

भगवद्-भजन, भक्ति का ही दूसरा नाम है। जिस प्रकार हाथी के पैर में सभी का पैर समाहित हो जाता है, इसी प्रकार समस्त साधन, ज्ञान, कर्म, योग, यज्ञ, धर्म, पुण्य, तीर्थ, व्रत जितने भी साधन हैं वे सभी भगवन्नाम-जप करने से स्वतः ही सध जाते हैं। इन अन्य साधनों को करने की जरूरत नहीं रहती है।

भगति बराबर को नहीं, भजन भगति के माहिं। खोज ज देख्या खोज्य कर, सब हाथी के पग माहिं। 

भक्ति के अनन्य व्याख्याता रूप गोस्वामी पाद ने भी रागानुगा-भक्ति में स्मरण-भक्ति को ही मुख्य माना है

‘रागानुगायां स्मरणस्य मुख्यता’ 

महर्षि नारद ने भी कहा है

अव्यावृत्त भजनात् 

अखंड-भजन से अनन्य-भक्ति, परा-भक्ति की प्राप्ति होती है। 

पराभक्ति ही ज्ञान है, ऐसा श्रीमद्भगवद्गीता में लिखा है, जिस प्रकार परमानन्दजी ने भगवन्नाम-स्मरण में ही सर्व साधनों के समाने का उल्लेख किया है, वैसा ही लेख श्रीमद्भागवत् में मिलता है-

योगस्त्रयो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयोविधित्सया। ज्ञानं कर्म च भक्तिश्च, नोपायोऽन्योस्तिकुत्रचित्।। निर्विण्णानां ज्ञानयोगो न्यासिनामिह कर्मसु । तेष्वनिर्विण्णचित्तानां कर्मयोगस्तु कामिनाम् ।। यदृच्छया मत्कथादौ जातश्रद्धस्तु यः पुमान्। न निर्विण्णो नातिसक्तो भक्तियोगोऽस्य सिद्धिदः ।। तावत् कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत युवती।

मत्कथाश्रवणादौ वा श्रद्धा यावन्न जायते ।। श्रीमद्भागवत् 

श्री स्वामी रामचरण जी महाराज ने भी कहा है

उपजै ब्रह्म विचार तब, सब साधन को नास। बरतें सकल विव्हार में, जब लग रहिए दास।।

कर्म-मार्ग तब ही तक उपादेय है, जब तक साधक का मन संसार एवं संसार के व्यवहार से विरक्त, राग शून्य न हो जाए। अथवा साधक का चित्त द्रवित होकर भगवद्-भजन की ओर उन्मुख न हो जाए।

अपने इष्ट को बिना किसी व्यभिचार के अनन्यभाव से सतत् स्मरण करना, मनन करना, मनन करते-करते उसी में तल्लीन हो जाना भक्ति है। 

ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल लिखते हैं भक्ति भज सेवायाम् धातु से निष्पन्न होता है जिसका तात्पर्य अपने इष्ट की अनन्यचित्त होकर स्मरण रूप सेवा करना है। यदि स्वेष्ट से अतिरिक्त कोई अन्य तत्व है तो उसकी सेवा-पूजा करना ही पूजा है और यदि इष्ट स्वात्म तत्व है तो उसका तैलधारावत् सतत् स्मरण करते-करते उसी में लीन हो जाना भक्ति है। 

विभिन्न आचार्यों ने भक्ति को अनेकविध परिभाषित किया है किन्तु संत-मतानुसार तो स्वात्मतत्व का व्यभिचार-रहित सतत्-स्मरण करना ही भक्ति कहलाता है। आचार्य शंकर ने भक्ति को निम्न प्रकार परिभाषित किया है

मोक्षकारणसामग्रयां भक्तिरेव गरीयसी।

स्वस्वरूपानुसंधानं भक्तिरित्यभिधीयते ।।32।।

स्वात्मतत्वानुसंधानं भक्तिरित्यपरे जगुः ।।

-विवेक-चूडामणि, श्लोक 32, 33 का पूर्वार्ध

मुक्ति की कारण रूप सामग्री में भक्ति ही सबसे बढ़कर है और अपने वास्तविक स्वरूप का अनुसंधान करना ही भक्ति कहलाता है। कोई-कोई स्वात्म-तत्त्व का अनुसंधान ही भक्ति है, ऐसा कहते हैं। स्वात्म-तत्त्व का सतत् अनुसंधान का तात्पर्य है- आत्म-तत्त्व का सतत् चिंतन करना, मनन करना। 

आत्मा नित्य, अचल, अविनाशी, स्वयं-प्रकाशित है। संसार एवं संसार के समस्त क्रियाकलाप सत्य, भ्रम, अनित्य, चलायमान, विनाशी तथा चैतन्य के आभास से चेतन जैसे प्रतीत होने वाले हैं वास्तव में संसार न तो चेतन है और न जैसा दिखता है, वैसा ही है। वास्तव में, यथार्थ तत्व मात्र मेरी आत्मा है जो त्रिकाल सत्य है। मैं जीव नहीं, जगत् नहीं, सच्चिदानन्द रूप ब्रह्म हूँ इस प्रकार का सतत् चिंतन-मनन ही स्वात्मतत्त्व का सतत् अनुसंधान है। अस्तु!

संत परमानन्दजी कहते हैं- 

हाथ में माला, मुख से हरि-नाम-जप, चित्त-वृत्ति श्रीहरि में लीन, इस प्रकार रात्रि-दिवस हरि-नाम-स्मरण करने से पाप व त्रितापों से मुक्ति मिल जाती है 

श्रीहरि का श्वासोश्वास सदैव स्मरण करो। स्मरण चित्त की वृत्ति को एकाग्र करके प्रेमपूर्वक करना चाहिये 

खाते, पीते, सोते कभी भी हरि-स्मरण को मत भूलो। यदि चित्त-वृत्ति सदैव स्मरण से तादात्म्य करके भजन करे तो परमात्मा का साक्षात्कार प्राप्त होने में कोई संशय नहीं है। 

जिस प्रकार पशु का नाम निश्चित् कर देने पर पशु भी उस नाम से बुलाने पर आ जाता है। मनुष्य भी नाम से बुलाने पर आता है। इसी प्रकार परमात्मा भी निश्चित् ही पुकारने पर भक्तों के सामने प्रकट होता है 

इस सम्बन्ध में संत रज्जब ने बहुत ही सटीक कहा है

नाम निनामे के धरे, संतौ सोध सभाय । रज्जब माने राम, सुमिरौं करी सहाय ।।

परब्रह्म-परमात्मा-निर्गुण-निराकार है। आकार-हीन का नाम कैसा? प्रश्न महत्त्वपूर्ण है। संत रज्जब बड़ा ही सटीक उत्तर देते हैं। परमात्मा का नाम नहीं था। बिना नाम के उसको पुकारें कैसे? तब संतों की परिषद् ने उसका नाम रख दिया। किसी ने ऊँ, किसी ने ‘राम’, किसी ने कृष्ण’। इस प्रकार उक्त अनंत के अनंत नाम हो गये।

नाम अनन्त सत रूप है, लघु दीरघ नहिं कोय। सब अख्यर हरि नो हित, हित सूँ परगट होय।।

पुनः प्रश्न उठता है, संतों की परिषद् ने तो नाम रख दिये, किन्तु परमात्मा ने वे नाम स्वीकार किये अथवा नहीं, इसका क्या प्रमाण है। 

तब संत रज्जब कहते हैं, परमात्मा ने नाम स्वीकार किये, इसके प्रमाण के लिये अन्यत्र जाने की जरूरत नहीं, सर्वत्र सर्व ग्रन्थों में उपलब्ध है। 

जब-जब भक्तों पर आपत्ति-विपत्ति पड़ी और भक्तों ने उस परमात्मा को उन्हीं नामों से याद किया, तब-तब वह अनेक रूप श कर-करके अवतरित होता रहा है तथा भक्तों की भर्तियों का हरण करता रहा है। 

कलियुग में ऐसे अनेक भक्त हुए हैं जिनकी सहायता, मनोकामना भगवान ने की है। नरसी भगत की बेटी के यहाँ माहेरा भरना, मीरां को दिये गये जहर को अमृत में बदलना कलियुग के ही उदाहरण हैं। 

ऐसे उदाहरणों से पूरा भक्तमाल भरा पड़ा है। अतः भगवान, परमात्मा, विष्णु नाम वाला है। भक्तों के सामने प्रकट होता है

महर्षि दयानन्द ने नाम-स्मरण की यह कहकर खिल्ली उड़ाई है कि ‘गुड ‘गड़ कहने से गुड अपने आप हमारे सामने या हाथ में नहीं आ जाता? किन्तु महर्षि का उक्त आक्षेप ठीक नहीं है। गुड़’ निर्जीव है। परमात्मा व परमात्मा का नाम सजीव है, चैतन्य है। 

तुलना सजातीय की हुआ करती है, विजातीय की नहीं। चैतन्य की तुलना अचेतन से नहीं की जा सकती। महर्षि व्याकरण-शास्त्र को सत्य मानने वाले थे। व्याकरण-शास्त्र शब्द को अनादि व नित्य मानता है अनादि व नित्य केवल ब्रह्म है। इसीलिए व्याकरण-शास्त्र ने शब्द को ब्रह्म माना है।

अनादि निघनं ब्रह्म शब्दतत्व यदक्षरम्। निवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतोयत।।

अन्तर्राष्ट्रीय रामस्नेही-सम्प्रदाय के आद्याचार्य स्वामीजी श्रीरामचरणजी महाराज ने भी कहा है

शब्द निरंजण ब्रह्म और अंजण सब माया। घरियादिक कलि जाइ शब्द के काल न खाया । सृष्टि सबद आधार सबद नहिं लिपै छिपाया। गए असेल जुग बीती शब्द कहाँ गया न आया।।

अनैत जुगाँ कै अनंत अधर सबद निरधार ।। रामचरण या शब्द का विरला लहै विचार।।

सोते-जागते, खाते-पीते बिना शुचिताशुचिता का विचार किये विष्णु-नाम जपने से भगवद्दर्शन रूप लाभ होता ही है। जैसे अग्निकण सूखे घास में चाहे ऊपर से गिरे, चाहे अग्निकण के ऊपर घास को डाला जाये, घास जलती ही है, ऐसे ही हरि-नाम-स्मरण से पाप, अधर्म का नाश होकर भगवद्दर्शन होता ही है।

विसन नाम जामिया जप, करै पाप धर्म को नास। जैसे चिनगी अगनि की, पड़ी पुराणे घास।।

भगवन्नाम-जप के शास्त्रकारों ने चार प्रकार बताये हैं। वाचिक, उपांशु, मानसिक व अजपा जाप। 

सर्वश्रेष्ठ जप श्वासोश्वास ही कहा गया है। संतों ने इसको ही अजपाजाप कहा है। इसमें चित्त की वृत्ति का शब्द से तादात्म्य हो जाता है। ऐसा होने पर जप अपने आप होता रहता है। न आसन, न माला, न विधि-विधान, जप स्वयमेव होता है।

 


हमारे बारे में

न्‍यूज़ पुराण (PURAN MEDIA GROUP)एक कोशिश है सत्‍य को तथ्‍य के साथ रखने की | आपके जीवन में ज्ञान ,विज्ञान, प्रेरणा , धर्म और आध्‍यात्‍म के प्रकाश के विस्‍तार की |
News Puran is a humble attempt to present the truth with facts. To spread the light of knowledge, promote scientific temper, inspiration, religion and spirituality in your life.


संपर्क करें

0755-3550446 / 9685590481



न्‍यूज़ पुराण



समाचार पत्रिका


श्रेणियाँ