भीमबैठका की गुफाएं…. भरतीय स्थापत्य कला का अनुपम खज़ाना

मध्यप्रदेश की प्रसिद्ध भीमबेटका या भीमबैठका की गुफाएं भरतीय स्थापत्य कला का अनुपम खज़ाना है | 

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यह चित्र पाषाणयुग में कला और संस्कृति का प्राचीनतम चिन्ह और आदि प्रमाण है। विद्वानों का मानना है जब मानव में भाषा और लिपि चिन्हों का अभिर्भाव नही हुआ था तब रेखाओं के संकेत के द्वारा वे अपनी बातें,विचार अभिव्यक्त करते थे।आत्माभिव्यक्ति मानव की सहज स्वाभाविक और प्राकृतिक प्रवृत्ति है मानव अपनी मनस्तिथि और भावों को प्रकट किए बिना रह नही सकता।इन भावों का आधार होता है परिवेश जिसमें मानव रहता है। आदि मानव जंगलों में जंगली जीवन बिताते थे जो पशुओं के करीब था और मानव का अन्य पक्ष विकसित नही था अतः वे प्राकृतिक साधनों का प्रयोग कर जैसे लाल पत्थर की मिट्टी हेमेटाइट को घिस कर, चुना और चारकोल जैसी वस्तुओं का उपयोग चित्रकारी के लिए किया करते थे और शिला उनका कैनवास था।
भारतीय प्राचीन चित्र इनके द्वारा अंकित मिलते हैं और ये शैलचित्र आदि मानव के कला विकास और संस्कृति का पाषाणयुग या प्रागैतिहासिक काल का सबसे सुन्दर उदाहरण है यह चित्र आदि मानव की कला को दर्शाता है |

भारतीय विद्ववानों की माने तो पाषाणकाल लगभग कांस्य युग से 25 लाख वर्ष ई०पू० के आस पास मानी गई है।तथा भारत तब ही मानवों का निवास स्थान भी बना और इस काल को प्रागैतिहासिक काल ईसलिए कहा गया क्योंकि तब मानव ने प्रगति पथ पर पहला कदम रख दिया था। पाषाण युग इतिहास का वह काल है ।जब मानव का जीवन पत्थरों पर अत्यधिक आश्रित था। उदाहरण के लिए पत्थरों से शिकार करना, पत्थरों की गुफाओं में रहना पत्थरों से आग पैदा करना आदि।

Bhimbaithaka_00आदि मानव की कलात्मकता को यदि समझें तो उन कंदराओं की दीवारों पर उनके जीवन के कार्यशैली का चित्रण मिलता है वे झुंड बनाकर रहते थे अतः बड़ा शिकार करना पड़ता था ताकि भोजन सबको मिल सके।इस पाषाणयुग के कला चित्र मे बृषभ बीस्ट प्रजाति हाथी हिरण आदि का शिकार करते हुए चित्रण किया गया है।

इन मानव चित्रों में कुहाड़ी ,क्लीवर जैसी कोई वस्तु से प्रहार दिखाया गया गया है। चित्र ज्यामितीय आकार के हैं क्योंकि तब उनका चित्रण अलंकृत नही था तथा चित्रों में शिकार को गहरे लाल रंग से और मानव चित्र को हल्के लाल रंगों से दिखाया गया है जो कलाकृति के विकास का पक्ष रखता है। विश्व की सभी प्रागैतिहासिक कलाएँ मानव के सभ्य होने के पूर्व की हैं। उनमें मानव के जन्मोत्थान और उसके क्रमिक विकास की कहानी छिपी है। संघर्षपूर्ण पर्यावरण के साथ ही मानवीय विकास की कड़ियों को जोड़ पाते हैं। पुरातत्त्वीय साक्ष्य-औजार और शैल चित्रों के माध्यम से ही हम उसकी जीवन-शैली से अवगत हो पाते हैं।कला की संस्कृति हज़ारों लाखों वर्ष पुरानी है और इसका कोई लिखित इतिहास नहीं है अतः प्रागैतिहासिक काल की झलक इन्हीं कंदराओं के कलाकृतियों से मिलती हैं और कला संस्कृति की वाहिका होती है।

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