महान धर्मगुरु भगवान गौतम बुद्ध की जीवनकथा |

महान समाज सुधारक, दार्शनिक तथा धर्मगुरु भगवान गौतम बुद्ध की जीवनकथा  ! 

GautamaBuddha

दुनिया को अपने विचारो से नया रास्ता दिखाने वाले भगवान गौतम बुद्ध भारत के महान दार्शनिक, वैज्ञानिक, धर्मगुरु, एक महान समाज सुधारक तथा बौद्ध धर्म के संस्थापक थे. बुद्ध की शादी यशोधरा के साथ हुई. इस शादी से एक बालक का जन्म हुआ था जिसका नाम राहुल रखा था लेकिन विवाह के कुछ समय बाद गौतम बुद्ध ने अपनी पत्नी तथा बच्चे को त्याग दिया. वे संसार को जन्म, मरण तथा दुखों से मुक्ति दिलाने के मार्ग की तलाश व सत्य दिव्य ज्ञान की खोज में रात के समय अपने राजमहल से जंगल की ओर चले गये थे. बहुत सालों की कठोर साधना के बाद बोध गया (बिहार) में बोधी वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई तथा वे सिद्धार्थ गौतम से गौतम बुद्ध बन गये.

“पूरी दुनिया में इतना अँधेरा नही है की वह एक मोमबत्ती के प्रकाश को फीका कर सके।”

 

गौतम बुद्ध जीवन परिचय – GAUTAM BUDDHA HISTORY

नाम – सिद्धार्थ गौतम बुद्ध

जन्म – 563 ईसा पूर्व लुम्बिनी, नेपाल

मृत्यु – 483 ईसा पूर्व कुशीनगर, भारत

पत्नी  – राजकुमारी यशोधरा

बच्चें – राहुल

पिता का नाम – शुद्धोदन (एक राजा तथा कुशल शासक)

माता का नाम – माया देवी (महारानी)

शिक्षा    – गुरु विश्वमित्र के पास वेद तथा उपनिषद पढ़े, राजकाज तथा युद्ध – विद्या की भी शिक्षा ली।

बौद्ध धर्म की स्थापना – चौथी शताब्दी के दौरान हुई थी |

आज पुरे वर्ल्ड में करीब 190 करोड़ बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं तथा बौद्ध धर्म के अनुयायी लोगो की संख्या विश्व में 25% हैं. एक सर्वे के अनुसार इसमें – चीन,  जापान,  वियतनाम,  थाईलेंड,  मंगोलिया, कंबोडिया,  भूटान,  साउथ कोरिया,  हॉगकॉग,  सिंगापूर,  भारत,  मलेशिया,  नेपाल,  इंडोनेशिया,  अमेरिका तथा श्रीलंका आदि देश आते हैं जिसमे भूटान,  श्रीलंका तथा भारत में बौद्ध धर्म के अनुयायी ज्यादा संख्या में हैं.

गौतम बुद्ध का प्रारंभिक जीवन – SIDDARTHA GAUTAMA TALE

गौतम बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व के समय कपिलवस्तु के निकट लुम्बिनी नेपाल में हुआ था. कपिलवस्तु की महारानी महामाया देवी के अपने देवदह जाते हुए रास्ते में प्रसव पीड़ा हुई जिसमे एक बालक का जन्म हुआ था. गौतम गौत्र में जन्म लेने के कारण वे गौतम बुद्ध कहलाये. इनके पिता शुदोधन एक राजा थे इनकी माता माया देवी कोली वंश की महिला थी लेकिन बालक के जन्म देने के बाद 7 दिन के अंदर माया देवी की मृत्यु हो गयी थी. जिसके बाद इनका लालन-पालन इनकी मौसी तथा राजा की दूसरी पत्नी रानी गौतमी ने की तथा इस बालक का नाम सिद्धार्थ रख दिया गया इनके जन्म के समय ही भविष्यवाणी की गई थी, कि यह एक महान राजा या एक महान धर्म प्रचारक होंगे. इस नाम का मतलब होता हैं जो सिद्धि प्राप्ति के लिये जन्मा हो लेकिन इनको बाद में सिद्धि मिली थी. जिसे सिद्धार्थ गौतम/गौतम बुध्द ने अपने कर्मो से सिध्द किया. सिद्धार्थ बचपन से बहुत की दयालु तथा करुणा वाले व्यक्ति थे.

सिद्धार्थ बचपन से ही दूसरों का दुख नहीं देख पाते थे। कहा जाता है कि घुड़दौड़ में जब घोड़े दौड़ते तथा उनके मुंह से झाग निकलने लगता तो सिद्धार्थ उन्हें थका जान कर वहीं रोक देते तथा जीती हुई बाजी हार जाते थे। खेल में भी सिद्धार्थ को खुद हार जाना पसंद था, क्योंकि किसी को हराना तथा किसी का दुखी होना उनसे नहीं देखा जाता था। सिद्धार्थ का एक चचेरा भाई भी हैं जिसका नाम हैं देवदत्त हैं. एक बार देवदत्त ने एक पक्षी को अपने बाण से घायल कर दिया था, तब इन्हें बहुत दुःख हुआ तथा इन्होने उस पक्षी की सेवा कर उसे जीवन दिया. सिद्धार्थ का मन प्रजा पर शासन करने का नहीं था बल्कि वो उनके दुःख को जीते थे तथा प्रजा की तकलीफों में खो जाते थे. यह सब उनके पिता राजा शुद्धोधन को बिलकुल पसंद नहीं था, इसलिए इन्हें सभी प्रकार के ऐशो आराम दिए गए सुन्दर महल बनाकर दिए गये. सिद्धार्थ का मन इन आडम्बरो से दूर ही था.

भगवान गौतम बुद्ध की शिक्षा, विवाह तथा तपस्या

सिद्धार्थ ने अपनी शिक्षा गुरु विश्वामित्र से पूरी की उन्होंने वेद तथा उपनिषद के साथ-साथ युद्ध विद्या की भी शिक्षा प्राप्त की. सिद्धार्थ को बचपन से घुड़सवारी, धनुष – बाण तथा रथ हांकने वाला एक सारथी में कोई दूसरा मुकाबला नहीं कर सकता था. सिद्धार्थ की शादी मात्र 16 साल की आयु में राजकुमारी यशोधरा के साथ हुई थीं तथा इस शादी से एक बालक का जन्म हुआ बेटे के जन्म की खबर सुनने के बाद सिद्धार्थ के मुंह से अचानक निकल पड़ा- ‘राहु’- यानी बंधन। उन्होंने बेटे का नाम राहुल रखा। इसके बाद उन्हें लगा कि सांसारिक बंधन उन्हें परेशान करे तथा वे उसमें बंध जाएं, इससे पहले उन्होंने घर छोड़ने का फैसला किया तथा एक दिन वे बिना बताए घर से निकल गए। आगे चलकर यशोधरा तथा राहुल दोनों ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया तथा भिक्षु हो गए।

पिता तथा राजा शुद्दोधन ने सिद्धार्थ के लिये भोग-विलास का भरपूर इंतजाम भी किया था. पिता ने अपने बेटे के लिए 3 ऋतु के हिसाब से 3 महल भी बनाये थें जिसमे नाच-गान औए ऐसो आराम की सारी व्यवस्था मौजूद थी लेकिन ये चीजें सिद्धार्थ को अपनी ओर नहीं खींच सकी. सिद्धार्थ ने अपनी सुंदर पत्नी तथा सुंदर बालक को छोड़कर वन की ओर चले जाने का निश्चय किया.

सिद्धार्थ ने वन जाकर कठोर से भी कठोर तपस्या करना शुरू कर दिया. पहले तो सिद्धार्थ ने शुरू में तिल चावल खाकर तपस्या शुरू की लेकिन बाद में तो बिना खान-पान के तपस्या करना शुरू कर दिया. कठोर तप करने के कारण उनका शरीर सूख गया था तप करते-करते 6 साल हो गये थे. एक दिन सिद्धार्थ वन में तपस्या कर रहे थें कि अचानक कुछ महिलाये किसी नगर से लौट रही थीं वही रास्ते में सिद्धार्थ तप कर रहे थें. महिलाएं कुछ गीत गा रही थीं उनका एक गीत सिद्धार्थ के कानों में पड़ा था गीत था ” वीणा के तारों को ढीला मत छोड़ दों ” तारों को इतना छोडो भी मत कि वें टूट जायें सिद्धार्थ को यह बात कानों में पड़ गयी तथा  यह अहसास हुआ कि अपने शरीर को कष्ट देकर ईश्वर की प्राप्ति नहीं हो सकती तथा फिर उन्होंने एक नियत तरीके से ध्यान किया. उन्हें इस बात से अहसास हुआ कि अति किसी बात की अच्छी नहीं होती तथा अपने ईश्वर को याद करने के लिए अपने आप को कष्ट देना अपराध हैं.
बताया जाता है कि वैशाख पूर्णिमा के दिन सिद्धार्थ एक पेड़ के नीचे बैठकर ध्यान लगा रहे थे। इसी दौरान सुजाता नाम की एक महिला वहां पहुंची जिसे बेटा हुआ था। महिला ने बेटे के लिए एक वटवृक्ष की मनौती मानी थी। बेटा होने के बाद वो सोने की थाली में गाय के दूध की खीर बनाकर पेड़ के नीचे पहुंची। यहां उन्होंने सिद्धार्थ को देखा तो सोचा कि वृक्ष देवता साक्षात वहां मनुष्य के रूप में बैठे हैं। सुजाता ने उन्हें खीर दिया तथा कहा कि जैसे मेरी मनोकामना पूरी हुई, उसी तरह आपकी भी हो। कहा जाता है कि उसी रात को ध्यान लगाने पर सिद्धार्थ की साधना सफल हुई। उन्हें सच्चा बोध यानी ज्ञान की प्राप्ति हुई तथा तभी से वे बुद्ध कहलाए। ज्ञान प्राप्त होने के बाद बुद्ध 4 सप्ताह तक उसी बोधिवृक्ष के नीचे साधना में लीन रहकर धर्म के स्वरूप का चिंतन करते रहे। इसके बाद वे धर्म का उपदेश करने निकल पड़े।

इस दिन के बाद इन्हें गौतम बुध्द के नाम से जाना जाने लगा तथा इन्होने पालि भाषा में बोध्द धर्म का प्रचार प्रसार किया, यह भाषा उस वक्त की प्रजा की भाषा थी, जिस कारण लोगो ने इन्हें जल्दी ही अपना लिया अन्य प्रवर्तक संस्कृत का उपयोग करते थे जिसे समझना आसान नहीं था. इसलिए गौतम बुद्ध को अधिक प्रेम मिला. बौद्ध धर्म को सभी लोगो ने अपनाया. गौतम बुध्द जीवन के सरल मार्ग को अपनाने का ज्ञान दिया. बौध्द धर्म सभी जाति प्रथा से बहुत दूर था इसे हर व्यक्ति अपना सकता था, चाहे वह किसी भी जाति का हो या नर हो या नारी. हिन्दू धर्म में बुध्द को विष्णु का रूप माना जाने लगा तथा इन्हें भगवान बुध्द कहा जाने लगा. इस्लाम में भी बौध धर्म की अपनी ही जगह थी. बोध धर्म ने अहिंसा को अपनाने तथा सभी मानव जाति एवम पशु पक्षी को समानं प्रेम का दर्जा देने को कहा. राजा शुद्धोधन तथा राहुल दोनों ने बोध्द धर्म को अपनाया.

गौतम बुद्ध की दी गयी शिक्षा – GAUTAM BUDDHA TEACHINGS

गौतम बुद्ध ने तत्कालीन रुढियों तथा अन्धविश्वासों का खंडन कर एक सहज मानवधर्म की स्थापना की। उन्होंने कहा की जीवन संयम, सत्य तथा अहिंसा का पालन करते हुए पवित्र तथा सरल जीवन व्यतीत करना चाहिए। उन्होंने कर्म, भाव तथा ज्ञान के साथ ‘सम्यक्’ की साधना को जोड़ने पर बल दिया, क्योंकि कोई भी ‘अति’ शांति नहीं दे सकती। इसी तरह पीड़ाओ तथा मृत्यु भय से मुक्ति मिल सकती है तथा भयमुक्ति एवं शांति को ही उन्होंने निर्वाण कहा है। उन्होंने निर्वाण का जो मार्ग मानव मात्र को सुझाया था,वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व था, मानवता की मुक्ति का मार्ग ढूंढने के लिए उन्होंने स्वयं राजसी भोग विलास त्याग दिया तथा अनेक प्रकार की शारीरिक यंत्रणाए झेली। गहरे चिंतन – मनन तथा कठोर साधना के पश्चात् ही उन्हें गया (बिहार) में बोधिवृक्ष के निचे तत्वज्ञान प्राप्त हुआ था। तथा उन्होंने सर्व प्रथम पांच शिष्यों को दिक्षा दी थी।
भगवान बुद्ध ने लोगो को मध्यम का रास्ता अपनाने का उपदेश दिया. उन्होंने दुःख उसके कारण तथा निरावरण के लिये अहिंसा पर बहुत जोर दिया. जीवों पर दया करो.. गौतम बुद्ध ने हवन तथा पशुबलि की जमकर निंदा की हैं. बुद्ध के कुछ उपदेशों के सार इस प्रकार हैं-

· महात्मा बुद्ध ने सनातन धर्म के कुछ संकल्पों का प्रचार तथा प्रसार किया था जैसे – अग्निहोत्र तथा गायत्री मन्त्र

· ध्यान तथा अंत-दृष्टी

· मध्य मार्ग का अनुसरण

· चार आर्य सत्य

· अष्टांग रास्तें

बौद्ध धर्म का प्रचार – SPREADING OF BUDDISM

तत्पश्चात अनेक प्रतापी राजा भी उनके अनुयायी बन गये। उनका धर्म भारत के बाहर भी तेजी से फैला तथा आज भी बौद्ध धर्म चीन, जापान आदि कई देशों का प्रधान धर्म है। उनके द्वारा बताये गयी बातो की स्थानिक लोग बड़ी श्रद्धा से मानते थे तथा उनकी मृत्यु के बाद भी लोग उनके द्वारा बताये गए रास्तो पर चलते थे तथा उनकी बातो का पालन करते थे। उनकी बातो को कई लोगो ने अपने जीवन में अपनाकर अपना जीवन समृद्ध बनाया है तथा उनकी मृत्यु के 400 साल बाद भी लोग उन्हें भगवान का रूप मानते थे।

भगवान गौतम बुद्ध का धर्म चक्र तथा परिवर्तन :

वें 80 वर्ष तक अपने धर्म का संस्कृत के बजाय उस समय की सीधी सरल लोकभाषा पली में प्रचार करते रहें तथा धर्म की लोकप्रियता तेजी से बढ़ने लगी. 4 सप्ताह तक बोधिवृक्ष के नीचे रहकर धर्म के स्वरुप का चिंतन करने के बाद बुद्ध धर्म का उपदेश करने निकल पड़े. पहले उन्होंने 5 मित्रों को अपना अनुयायी बनाया तथा फिर उन्हें धर्म प्रचार करने के लिये भेज दिया. पाली सिद्दांत के सूत्र के अनुसार 80 वर्ष की आयु में बुद्ध ने यह घोषणा की. गौतम बुद्ध ने अपना आखिरी भोजन जिसे उन्होंने कुंडा नामक एक लोहार से एक भेंट के रूप में प्राप्त किया था उसे ग्रहण किया, जिसके कारण वे गंभीर रूप से बीमार पड़ गये. गौतम बुद्ध ने अपने शिष्य आनंद को एक निर्दश दिया था कि वह कुंडा को समझाए कि उसने कोई गलती नहीं की हैं, उन्होंने कहा कि यह भोजन महान तथा अतुलनीय हैं.

गौतम बुद्ध के जीवन काल में ही बौद्ध धर्म का प्रचार बहुत हो गया था, उन दिनों पशुओं की हत्या तथा कर्मकांड बड़ी संख्या में हो रहे थे। इसलियें उन्होंने जीव मात्र पर दया कर ये सब रोकने का उपदेश दिया।

गौतम बुद्ध का निर्वाण

बाद में 44 वर्ष तक बिहार तथा काशी के पास के प्रांतों में धर्म प्रचार करने के बाद 80 वर्ष की आयु में गौतम बुध्द  अपने निर्वाण की भविष्यवाणी की तथा समाधी धारण की | ई.पू. 483 में कुशीनगर के पास के एक वन में शाल वृक्ष के नीचे उन्होनें शरीर को त्याग दिया जिसे हम परिनिर्वाण कहते हैं।

उनके समकालीन शक्तिशाली मगध साम्राज्य के शासक बिम्बीसार तथा अजातशत्रु ने बुद्ध के संघ का अनुसरण किया। बाद में सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म को श्रीलंका, जापान, तिब्बत तथा चीन तक फैलाया। ज्ञान प्राप्ति पश्चात भगवान बुद्ध ने राजगीर, वैशाली, लोरिया तथा सारनाथ में अपना जीवन बिताया। उन्होंने सारनाथ में अंतिम उपदेश देकर अपना शरीर त्याग दिया।

अंततः महान गौतम बुद्ध के सुविचार – Gautam Buddha Quotes के साथ ही हम आज अपने लेख को ख़त्म करना चाहेंगे

“हम जो कुछ भी है वो हमारी आज तक की सोच का ही परिणाम है। जब भी कोई काम करते समय बुरा सोचता या बुरा करता है तो उसे कष्ट ही मिलते है। लेकिन यदि कोई इंसान काम करते समय अच्छा सोचता या अच्छा करता है तो ख़ुशी हमेशा परछाई की तरह उसके साथ रहती है।”

PURAN DESK



हमारे बारे में

न्‍यूज़ पुराण (PURAN MEDIA GROUP)एक कोशिश है सत्‍य को तथ्‍य के साथ रखने की | आपके जीवन में ज्ञान ,विज्ञान, प्रेरणा , धर्म और आध्‍यात्‍म के प्रकाश के विस्‍तार की |
News Puran is a humble attempt to present the truth with facts. To spread the light of knowledge, promote scientific temper, inspiration, religion and spirituality in your life.


संपर्क करें

0755-3550446 / 9685590481



समाचार पत्रिका


श्रेणियाँ