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सत्ता का डर इंटेलेक्चुअल बेखबर

सार

चुनाव में पराजय एक बात है, लेकिन ममता की टीएमसी के साथ जो हो रहा है, वह तो किसी गैंग की सफाई जैसा है..!!

janmat

विस्तार

    ममता बनर्जी जो केंद्र सरकार और अदालत तक की नहीं सुन रही थीं, अब उनकी पार्टी के नेता उनकी नहीं सुन रहे हैं. टीएमसी के नेता घर से बाहर निकल रहे हैं. तो उन पर ईंट पत्थर चल रहे हैं. अंडे टमाटर फिक रहे हैं. पश्चिम बंगाल में पार्टी ममता के हाथ से छूट गई है. साठ विधायक असली टीएमसी के नाम पर अलग हो गए हैं.

    इस ग्रुप के नेता को नेता प्रतिपक्ष का दर्जा मिल गया है. अब तो संसदीय दल में टूट की खबरें हैं. इतनी जल्दी टीएमसी टूट जाएगी, इसकी सामान्य रूप से कोई उम्मीद नहीं कर सकता. इसे टूटने से ज्यादा पिघलना कहा जा सकता है.

    उन प्रबुद्ध लोगों पर भी यह बड़ा सवाल है कि पश्चिम बंगाल में इतना बैड गवर्नेंस चल रहा था, इतना अन्याय और अत्याचार लोगों पर हो रहा था और कोई भी उसे देख नहीं पा रहा था. सब उन्हें पीएम नरेंद्र मोदी का बड़ा चैलेंजर स्थापित करने में लगे हुए थे. चुनाव में पराजय के बाद अब टीएमसी के लोगों का घर से निकलना मुश्किल हो गया है. लोग अपने चेहरे छिपाकर घर से निकल रहे हैं. यह दृश्य भी देखने में आया है, जब टीएमसी के नेता अपनी सरकार में आम लोगों से वसूली गई कटमनी वापस कर रहे हैं. 

     सरकारें कई राज्यों में बदलती हैं, लेकिन सरकार से हटे दल के नेताओं के साथ ऐसा व्यवहार तो अब तक भारतीय लोकतंत्र में कहीं भी नहीं देखा गया है. गवर्नेंस में कमी वेसी हो सकती है, लेकिन टीएमसी नेताओं के साथ बंगाल में जो नज़ारे दिखाई पड़ रहे हैं, वह तो यह बता रहे हैं कि वहां जैसे सरकार नहीं चल रही थी. वहां एक गिरोह चल रहा था. सरकार के नाम पर वह गिरोह अपनी गुंडागर्दी, दादागिरी, भ्रष्टाचार लोगों को दबाने-कुचलने का काम कर रहे थे. पॉलिटिकल किलिंग के नाम पर विरोधियों की हत्याएं की जा रही थीं. 

    यह ऐसा उदाहरण है जो लोकतंत्र प्रेमियों को चिंतित कर रहा है. ममता बनर्जी एक ऐसी नेता थीं, जिनकी इमेज एक फाइटर पॉलिटिशियन की थी. उनका रहन-सहन बिल्कुल सामान्य नागरिकों जैसा था. वह सफेद साड़ी और चप्पल में हमेशा रहती थीं. वह सरकारी घर में भी नहीं रहती थीं. अपनी छोटे से मकान में रहती थीं. इससे एक और संदेश निकलता है कि लोकतंत्र में जनता दिखावे पर बह जाती है. जनादेश का दुरुपयोग कुछ दूसरे लोग करते हैं. पश्चिम बंगाल की नई बीजेपी सरकार के सामने वहां व्यवस्थाओं को सामान्य बहाल करना सबसे बड़ी चुनौती है. टीएमसी का सिंडिकेट और कटमनी का नेटवर्क तोड़ना सबसे चुनौती है. फालता का पुष्पा जहांगीर खान गिरफ्तार हो गया है. जनाक्रोश टीएमसी नेताओं के खिलाफ है, लेकिन सरकार को कानून व्यवस्था तो बनाकर ही रखना पड़ेगा.

    ममता बनर्जी की गवर्नमेंट का उदाहरण ऐसा है, कि सत्ता के डर से सच्चाई दबाने का काम होता है. जो इंटेलेक्चुअल है, वह भी अपने कारणों से या तो सच्चाई देख नहीं पाते हैं या देखकर भी अनदेखा करते हैं. जिन कॉकरोचों को मोदी सरकार में कमी दिखाई पड़ती है, उन्हें कभी भी कांग्रेस या विपक्षी दलों की राज्य सरकारों में कोई कमी नहीं दिखाई पड़ती. शायद इसीलिए विरोधियों का नेरेटिव नहीं चल पाता, क्योंकि उनके सारे एक्शन एक तरफा दिखाई पड़ते हैं. मीडिया, पत्रकारिता और बुद्धिजीवी सब बंटे हुए हैं. सबके सच अपने अलग-अलग हैं. जनता के सच से किसी का लेना देना नहीं है. अगर होता तो बंगाल में पंद्रह साल की ममता सरकार ने जिस तरह से काम  चलाया उस पर कोलकाता से लेकर दिल्ली तक तूफान मच गया होता.

    पश्चिम बंगाल सीमावर्ती राज्य है. राष्ट्रीय सुरक्षा उस राज्य से जुड़ी हुई है. घुसपैठ जैसे मुद्दे पर उनकी सरकार ने जिस तरह से काम किया वह तो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरनाक था ही. लेकिन मुस्लिम तुष्टिकरण और डेमोग्राफी में अप्रत्याशित बदलाव को बढ़ावा देकर जिस तरीके से भारतीय संस्कृति और सभ्यता को बदलने का प्रयास किया गया वह भी बेहद खतरनाक है.

    टीएमसी में अप्रत्याशित बगावत देखी जा रही है. अभिषेक बनर्जी सबसे बड़े विलेन बनकर उभरे हैं. अभी भी इंटेलेक्चुअल और वामपंथी विचारकों का बड़ा तबका टीएमसी में हो रही घटनाओं के लिए बीजेपी को जिम्मेदार मान रहा है. अभी भी वह कहने को तैयार नहीं है कि टीएमसी के कुशासन ने उसको इस हालत में पहुंचा दिया है. पश्चिम बंगाल का परिदृश्य तो लोकतंत्र की व्यवस्था पर ही सवाल खड़े कर रहा है. अगर किसी खास समुदाय के वोट को एकजुट करके कोई पार्टी सत्ता पर काबिज रहती है और गवर्नेंस में एकतरफा काम करती है तो फिर उसके नतीजे इसी तरह से होते हैं.

    ममता बनर्जी और उनकी पार्टी का जो हश्र हुआ है, वह राजनीतिक क्षेत्र में काम करने वाले सभी राजनीतिक दलों के लिए बहुत बड़ा सबक है. गवर्नेंस में जिसने भी गड़बड़ी की उसका हश्र ऐसे ही होगा. पर्टियों में एकाधिकार और तानाशाही का माहौल कुछ समय तक चल सकता है, लेकिन उसकी अंतिम परिणीति टीएमसी जैसी ही होने की संभावना बनी रहती है.

    ममता बनर्जी अपनी सुरक्षा के लिए इंडी गठबंधन और कांग्रेस की शरण में पहुंच गई हैं. कांग्रेस को भी ममता बनर्जी से सबक लेना चाहिए. कांग्रेस में बगावत और टूट की सतत प्रक्रिया चलती रहती है, जो भी बड़े नेता कांग्रेस से जाते हैं, सब गड़बड़ी के लिए राहुल गांधी पर दोषारोपण करते हैं. टीएमसी जैसा तो कांग्रेस में अभी तक नहीं हुआ है, लेकिन तानाशाही और अन्याय की प्रवृत्तियां यहां तक कब पहुंचा देंगी कहा नहीं जा सकता है. 

    ममता का हश्र राजनीतिक पंडितों की भूमिका पर भी सवाल खड़े करता है.  सत्ता का इस कदर डर और इंटेलेक्चुअल बेखबर बने रहें तो फिर इन्हें बुद्धिजीवी नहीं परजीवी ही कहा जाएगा. ममता के पतन का सबब सबके लिए सबक है.