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विश्व का सबसे विषम देश– भारत

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Thu , 05 Mar

सार

नये-नये अध्ययन और अनुमान सामने आ रहे हैं, ये ही भविष्य की वैश्विक समृद्धि संरचना के आधार होंगे..!

janmat

विस्तार

नये-नये अध्ययन और अनुमान सामने आ रहे हैं, ये ही भविष्य की वैश्विक समृद्धि संरचना के आधार होंगे | आज जहां विश्व में  एक तरफ 26 करोड़ से अधिक लोगों के लिए भुखमरी के हालात हैं, तो वहीं विश्व को हर 33 घंटे में एक नया अरबपति मिल रहा है | यह निष्कर्ष ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के संगठन ऑक्सफैम ने एक विस्तृत अध्ययन के बाद विश्व को दिया है |परिस्थिति कैसे बदले ? कौन बदले ? इस पर कोई सोच विचार चलता नहीं दिखाई दे रहा है |

वो कहावत गलत साबित हो गई  कि बीमारी का वायरस कभी भेदभाव नहीं करता। कोई बीमारी  जब फैलती है, तो अमीर-गरीब सबको अपना शिकार बनाती है, लेकिन जो बीमारी के वायरस का अर्ध सत्य है, वह वैश्विक अर्थव्यवस्था का सच नहीं है। तमाम रिपोर्टें बताती हैं कि कोरोना दुष्काल के कारण पैदा हुए हालात ने अलग-अलग वर्ग और समाज को अलग-अलग तरह से प्रभावित किया है।

इसने कुछ लोगों को नए अवसर दिए, तो कई सारे लोगों के अवसर लंबे समय के लिए छीन लिए। इस सिलसिले में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के संगठन ऑक्सफैम ने एक विस्तृत अध्ययन के बाद यह बताया है कि महामारी के बाद के दो साल में दुनिया में आर्थिक गैर-बराबरी काफी तेजी से बढ़ी है।

इस दौर ने जहां विश्व में एक तरफ 26 करोड़ से अधिक लोगों के लिए भुखमरी के हालात हैं, तो वहीं विश्व को हर ३३ घंटे में एक नया अरबपति मिल रहा है। पिछले दो साल में महामारी और लॉकडाउन वगैरह से पूरी दुनिया की विकास दर काफी ज्यादा गिरी है।

परंपरागत आर्थिक सोच यही कहती है कि इसका नुकसान सभी को होना चाहिए था| अमीरों को भी और गरीबों को भी, लेकिन तमाम अध्ययन और शोध यही बताते हैं कि नुकसान का ज्यादातर हिस्सा गरीबों के पाले में ही आया है, जबकि अमीर इससे तकरीबन बच ही गए, बल्कि कुछ को तो इस हालात ने और अधिक मालामाल कर दिया। 

इन हालातों में यह भी  सही है कि भारत ने हालात का मुकाबला जिस तरह से किया, उसने एक बहुत बड़ी आबादी को भुखमरी का शिकार होने से बचाया। 80 करोड़ लोगों को लंबे समय तक मुफ्त अनाज उपलब्ध कराने का कोई दूसरा उदाहरण विश्व में शायद  नहीं है। पिछले दिनों विश्व मुद्रा कोष तक ने इसके लिए भारत की तारीफ की थी। लेकिन, इससे  आगे के जो हालात हैं, काफी उलझे हुए हैं।

कुछ दिनों पहले आई ‘वर्ल्ड इनिक्वैलिटी लैब’ की रिपोर्ट के अनुसार, विश्व में सबसे ज्यादा विषमता अगर कहीं है, तो वह भारत में ही है। तकरीबन यही बात अब ऑक्सफैम की रिपोर्ट ने भी कही है। इस दौरान भारत में हर ११  दिन में एक नया व्यक्ति अरबपति बना है। 2020 में अरबपतियों की फोर्ब्स  पत्रिका की सूची में 102 भारतीयों के नाम थे, पर 2022 में इनकी संख्या बढ़कर 166 हो गई।

अरबपतियों के मामले में भारत अब अमेरिका और चीन के बाद तीसरे नंबर पर पहुंच चुका है। गरीबों की संख्या के मामले में तो यह पहले नंबर पर है ही। एक नजर कोरोना दुष्काल के पहले पर - जब कोरोना वायरस ने एक दुष्काल के रूप में हमारे जीवन में प्रवेश नहीं किया था। गरीबी तब भी थी और दुनिया के बहुत सारे हिस्सों में आर्थिक विषमता भी बढ़ रही थी।

महामारी से एक सीधा फर्क यह पड़ा कि समाज की बहुत सारी सच्चाइयां, जिनसे हम मुंह फेर लेते थे, कोरोना दुष्काल ने उन्हें हमारी आंखों के सामने ला खड़ा किया। मसलन, इस वैश्विक महामारी ने बताया कि हमारी स्वास्थ्य सेवाएं कितनी अक्षम व अपर्याप्त हैं और संकट के समय लोगों को सीधी मदद देने में ये असमर्थ हैं।

इसी तरह, महामारी ने यह भी बताया कि हमारी वे आर्थिक नीतियां कितनी अक्षम व अपर्याप्त हैं, जिनके सहारे हम गरीबी-उन्मूलन के सपने देखते हैं! जब बड़ा आर्थिक संकट आया, तब उन तमाम नीतियों के बावजूद सबसे ज्यादा नुकसान गरीब वर्ग को ही उठाना पड़ा। दुर्भाग्य यह है कि विश्व अब भी अपना रास्ता बदलने को तैयार नहीं है। वह अब भी पुरानी लकीर पर ही चल रहा है।