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आप –हम तो ८४ प्रतिशत परिवारों में हैं

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Wed , 14 Apr

सार

उम्मीद थी कि कम से कम कोरोना दुष्काल में गरीबों को ज्यादा मदद दी जाएगी और उनकी आमदनी सुरक्षित रखी जाएगी। मगर ऐसा नहीं हुआ।

janmat

विस्तार

कोरोना दुष्काल में भारत के ८४ प्रतिशत परिवारों की आमदनी कम हो गई है, यह निष्कर्ष वैश्विक संस्था “ऑक्सफेम” का है | “आक्सफेम” गरीबी कम करने की दिशा में काम करने वाली वैश्विक संस्था है | इसकी एक रिपोर्ट में इस तथ्य के साथ यह भी कहा गया है कि इस अवधि में भारत में अरबपतियों की संख्या १०२ से बढ़कर १४२ हो गई है। मार्च २०२० से लेकर३० नवंबर, २०२१ के बीच अरबपतियों की आमदनी में करीब३० लाख करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई है | जो २३.१४ लाख करोड़ रुपये से बढ़कर ५३.१६ लाख करोड़ रुपये हो गई है| इसके विपरीत २०२० में ४.६ करोड़ से अधिक नए भारतीय अति-गरीब बनने को विवश हुए हैं | प्रश्न यह सहज ही उठता है, क्या यही अच्छे दिन हैं ?

 

सरकारी तंत्र द्वारा यही कहा जाएगा कि रिपोर्ट में कोई खास बात नहीं है। ऑक्सफेम तो अरसे से यही बात कह रही है। विश्व आर्थिक मंच के सालाना सम्मेलन के आसपास जारी होने वाली इस रिपोर्ट का मकसद ही यह बताना होता है कि विश्व आर्थिक मंच भले पूंजीपतियों की वकालत करे, पर असमानता की बातें भी उजागर होनी चाहिए। पुरानी रिपोर्ट भी यही बताती है कि अमीरी और गरीबी की खाई बढ़ती जा रही है। उम्मीद थी कि कम से कम कोरोना दुष्काल में गरीबों को ज्यादा मदद दी जाएगी और उनकी आमदनी सुरक्षित रखी जाएगी। मगर ऐसा नहीं हुआ। 

 

बढ़ती असमानता को पाटना बहुत आसान काम है। इसके लिए सरकारों को निचले तबके की आमदनी में इजाफा करने और धनाढ्य तबके से जायज टैक्स वसूलने की कोशिश करनी थी जो नहीं हुई । असमानता घटाने का तरीका ही यही है कि मजदूरों को उनकी वाजिब मजदूरी मिले, खेती करने वालों को अपनी उपज का उचित दाम मिले, मजदूरों को खून-पसीने की कमाई मिले और कोई भी इंसान व्यवस्था का लाभ उठाकर जरूरत से ज्यादा अपनी तिजोरी न भर सके। 

 

असलियत में ऐसा न तो हुआ और हो भी नहीं रहा है। वर्ष २०१९ में केंद्र सरकार ने टैक्स में छूट देकर देश के पूंजीपति वर्ग को दो लाख करोड़ रुपये की माफी दे दी। जबकि, २०१६ में हुई नोटबंदी और२०१७ में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू किए जाने के कारण २०१८ तक हमारी अर्थव्यवस्था काफी कमजोर हो चुकी थी और विकास दर ८.२५ प्रतिशत से घटकर चार प्रतिशत पर आ गई थी। ऐसे में, मदद की जरूरत धनाढ्यों को नहीं, गरीबों को थी। असंगठित क्षेत्र के लोग थे, जिनको सहायता मिलनी चाहिए थी। गरीबो की मदद नहीं हुई और मलाई धनाढ्य ले उड़े। पिछले पांच साल से लोगों की वास्तविक आमदनी नहीं बढ़ी है। मनरेगा की मजदूरी, जो सरकार खुद तय करती है, वह भी बाजार में मिलने वाली मजदूरी से कम है। जबकि शेयर बाजार नित नई ऊंचाइयों पर दिखने लगा है। इन सबसे स्वाभाविक तौर पर असमानता बढ़ रही है।

 

अर्थ व्यवस्था के इस सवाल को हल करने के लिए सबसे जरूरी काम यही है कि लोगों की जेब में पैसे पहुंचे। इसके लिए विशेषकर निम्न एवं मध्य वर्ग की आमदनी को सुरक्षित करना होगा। ऐसी व्यवस्था करनी होगी कि किसानों को उनकी फसलों का पूरा मूल्य मिले। उस नीति को बदलना होगा जो धनाढ्य तबके को बिन मांगे दो लाख करोड़ रुपये की टैक्स छूट दे और लंबा संघर्ष करने के बाद भी किसानों को उनका पूरा-पूरा हक न मिले। अनौपचारिक क्षेत्र हमारी अर्थव्यवस्था की कुंजी है। लोगों को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना और उन्हें बेहतर शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराना भी जरूरी है। हमारे नीति-नियंताओं को समझना होगा कि कोरोना दुष्काल में लोगों ने कर्ज लेकर अपना महंगा इलाज कराया है, उसका बोझ वे कई वर्षों तक उठाने को बाध्य भी हो गए हैं। अगर उनके बोझ को कम नहीं किया गया, तो असमानता घटाने के दावे कतई सच हो सकते ।

 

प्रश्न यह है कि क्या सरकार द्वारा ऐसा नहीं किया जा सकता था? उत्तर सरकार के सोच में छिपा है |दीर्घावधि की योजनाओं में शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और रोजगार पर खर्च करने की जरूरत है। जरूरी है कि सरकार काम करने के अपने तौर-तरीके बदले।