ब्रम्ह एक है तो इतने भेद क्यों .. P अतुल विनोद

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आदिगुरु शंकराचार्य ने इस बात को जोर देकर कहा है कि परमात्मा या ब्रह्म एक ही है और उससे अलग कोई दूसरा कोई नहीं है । वेद पुराण उपनिषदों में परम ब्रह्म के स्वभाव के बारे में और संसार के साथ उनके संबंध को लेकर अनेक तरह की टीकाएँ मौजूद है। समझ के स्तर में कमी के कारण आम व्यक्ति उसका अलग-अलग अर्थ निकालता है। इसी वजह से अलग-अलग तरह के पंथ और संप्रदाय खड़े हो जाते हैं। लिखने वालों ने अपने मत के समर्थन और दूसरे मत के विरोध के लिए एक ही बात को अलग अलग तरह से प्रस्तुत किया और इसी वजह से भ्रम और बढ़ गया।

शंकराचार्य के मुताबिक ये दिखाई पड़नेवाला विविध रूप संसार अपने आपमें रियल नहीं है; यह केवल उन लोगों को वास्तविक लगता है, जो अज्ञान में (अविद्या में) जीवन बिताते हैं। हम इस संसार रूपी बन्धन में फस जाते है जिससे निकलना सम्भव नही होता। ये दुर्दशा हमारी अपनी कोशिशों से से नहीं हटाई जा सकती । एक मत कहता है कि कर्म व्यर्थ हैं और वे हमें इस अवास्तविक संसार से कारण और कार्य की अन्तहीन परम्परा से मजबूती से जकड़ देते हैं । केवल इस ज्ञान से, कि विश्वव्यापी ब्रह्म और व्यक्ति की आत्मा एक ही वस्तु है, हमें मुक्ति मिल सकती है।

जब ये ज्ञान अंदर प्रकट हो जाता है, तब जीव विलीन हो जाता है; भटकना समाप्त हो जाता है और हमें पूर्ण आनन्द और परम सुख प्राप्त होता है।एक मत के मुताबिक ब्रह्म का वर्णन केवल उसके अस्तित्व के रूप में ही किया जा सकता है, क्योंकि वह सब विशेषणों से परे है। विशेष रूप से कर्ता, कर्म और ज्ञान की क्रिया के भेदों से ऊपर है। इसलिए उसे व्यक्ति-रूप में नहीं माना जा सकता और उसके प्रति कोई प्रेम या श्रद्धा नहीं की जा सकती।शंकराचार्य का मत है कि जहां मन को शुद्ध करने के लिए साधन के रूप में कर्म अत्यन्त आवश्यक है, वहां ज्ञान प्राप्त हो जाने पर कर्म दूर छूट जाता है ।

ज्ञान और कर्म एक-दूसरे के ठीक वैसे ही विरोधी हैं, जैसे प्रकाश और अन्धकार ।डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन कहते हैं कि शंकराचार्य का मत ज्ञान-कर्म समुच्चय के दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं करता। उसका विश्वास है कि वैदिक विधियां केवल उन लोगों के लिए हैं, जो अज्ञान और लालसा में डूबे हुए हैं। मुक्ति के अभिलाषियों को कर्मकाण्ड की विधियों का परित्याग कर देना चाहिए ।शंकराचार्य के मतानुसार गीता का उद्देश्य इस बाह्य (नामरूपमय) संसार का पूर्ण दमन है, जिसमें कि सारा कर्म होता है, यद्यपि शंकराचार्य का अपना जीवन ज्ञान-प्राप्ति के बाद भी कर्म करते जाने का उदाहरण है।

शंकराचार्य के दृष्टिकोण का विकास आनन्दगिरि ने, जो सम्भवत: तेरहवीं शताब्दी में हुए, श्रीधर (ईस्वी सन् १४००) ने और मधुसूदन (सोलहवीं शताब्दी) ने तथा अन्य कुछ लेखकों ने किया। महाराष्ट्रीय सन्त तुकराम और ज्ञानेश्वर महान् भक्त थे, यद्यपि अधिविद्या में उन्होंने शंकराचार्य के मत को स्वीकार किया।रामानुज (ईसा की ग्यारहवीं शताब्दी) ने अपनी टीका में संसार की अवास्तविकता और कर्म-योग के मार्ग के सिद्धांत का खण्डन किया उसने यामुनाचार्य द्वारा अपने 'गीतार्थसंग्रह' में प्रतिपादित व्याख्या का अनुसरण किया।

ब्रह्म सर्वोच्च वास्तविकता, आत्मा है। परन्तु वह निर्गुण नहीं है। उसमें आत्मचेतना है और अपना ज्ञान भी है, और संसार के सृजन की और अपने जीवों को मुक्ति प्रदान करने की सचेत इच्छा भी उसमें है। सब आदर्श गुणों असीम और अनन्त का वह आधार है । वह सारे संसार से पहले और सारे संसार से ऊपर है।डॉ राधाकृष्णन अपनी किताब भगवतगीता में कहते हैं संसार कोई माया या भ्रम नहीं है, बल्कि सत्य और वास्तविक है। संसार और परमात्मा ठीक वैसे ही एक हैं, जैसे शरीर और आत्मा एक हैं । वे समूचे रूप में एक हैं, परन्तु साथ ही अपरिवर्तनीय रूप से परस्पर-भिन्न भी है।

सृष्टि से पहले संसार एक सम्भावित (गर्भित या अव्यक्त) रूप में रहता है, जो इस समय विद्यमान और विभिन्न प्रकट रूपों में विकसित नहीं हुआ होता।सृष्टि होने पर यह नाम और रूप में विकसित हो जाता है। संसार को परमात्मा का शरीर बताकर यह सुझाव प्रस्तुत किया गया है कि संसार किसी विजातीय तत्त्व से, जो दूसरा मूल तत्त्व हो, बना हुआ नहीं है, अपितु इसे भगवान् ने स्वयं अपनी प्रकृति में से ही उत्पन्न किया है।परमात्मा इस संसार का बनानेवाला है और स्वयं परमात्मा से ही यह संसार बना भी हुआ है ।आत्मा और शरीर की उपमा संसार की ईश्वर पर पूर्ण निर्भरता को सूचित करने के लिए प्रयुक्त की गई है, ठीक उसी प्रकार जैसे कि शरीर आत्मा पर निर्भर होता है।सब प्रकार की चेतना में यह पूर्वाधारणा विद्यमान है कि एक कर्ता होगा और एक कर्म होगा; और यह उस चेतना से भिन्न है, जिसे रामानुज ने आश्रित तत्त्व (धर्मभूत द्रव्य) माना है, जो स्वयं बाहर निकल पाने में समर्थ है अहं (जीव) अवास्तविक नहीं है और मुक्ति की दशा में वह लुप्त नहीं हो जाता ।उप निषद् के प्रसंग, तत् त्वम् असि, 'वह तू है का अर्थ यह है कि "ईश्वर मैं स्वयं हूँ"; ठीक उसी प्रकार,जैसे मेरी आत्मा मेरे शरीर का आत्मा है।परमात्मा आत्मा को संभालनेवाला, उसका नियन्त्रण करनेवाला मूल तत्त्व है; ठीक उसी प्रकार, जैसे आत्मा शरीर को संभालनेवाला मूल तत्त्व है।

परमात्मा और आत्मा एक है; इसलिए नहीं कि दोनों ठीक एक वस्तु हैं, बल्कि इसलिए कि परमात्मा आत्मा के अन्दर निवास करता है और उसके अन्दर तक प्रविष्ट हुआ हुआ है।वह आंतरिक मार्गदर्शक है, अन्तर्यामी, जो आत्मा के अन्दर खूब गहराई में निवास करता है।रामानुज ने गीता पर अपनी टीका में एक प्रकार का वैयक्तिक रहस्यवाद विकसित किया है।मानवीय आत्मा के सुगुप्त स्थानों में परमात्मा निवास करता है; लेकिन आत्मा उसे तब तक पहचान नहीं पाती, जब तक आत्मा को मुक्ति दायक ज्ञान प्राप्त नहीं हो जाता ।

यह मुक्तिदायक ज्ञान हमें अपने सम्पूर्ण मन और आत्मा द्वारा परमात्मा की सेवा करने से प्राप्त हो सकता है। पूर्ण विश्वास केवल उन लोगों के लिए संभव है, जिन्हें दैवीय कृपा इसके लिए वरण कर लेती है।जागृत कुंडलिनी स्वयं योग मार्ग से परम सत्य का साक्षात्कार कराती है।

 

 


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