रावण की ढा़ल बन गये ब्रह्मा …! रावण की त्रैलोक्य विजय – 48 

रावण की ढा़ल बन गये ब्रह्मा …!
Ravan-Chap48
रावण की त्रैलोक्य विजय – 48 

यमराज और रावण के मध्य सात रात और सात दिनों तक भीषण युद्ध चलता रहा। इन दो बडी़ शक्तियों के बीच युद्ध ने पूरे विश्व का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया था। यमराज के आयुधों की धाक थी। रावण के दुस्साहस और बाहुबल का बोलबाला था।यम उन विष्णु हरि के पुत्र थे,जो युद्ध में शत्रु को कभी जीवित नहीं छोड़ते थे।रावण ब्रह्मा और शिव जी के सौजन्य से सामर्थ्यवान हो चुका था।

तत्कालीन विश्व को अलग अलग रूपों में इन तीन महाशक्तियों... ब्रह्मा, विष्णु और महेश (शिव जी) का संरक्षण प्राप्त रहता। इनमें विष्णु हरि का रुख पूरी तरह स्पष्ट था। वे देवताओं और उनकी समर्थक शक्तियों के पक्ष में ही खडे़ होते थे। जबकि शिव जी त्रिपुर युद्ध को छोड़कर शायद ही कभी दैत्यों अथवा उनके समर्थकों के विरोध में गये हों। हां सबसे अधिक उदार या कहलो ढुलमुल रवैया ब्रह्मा जी का रहता था। रोता धोता ,कोई भी उनके पास आता, वे द्रवित हो जाते। आश्वासन (वरदान) दे डालते। मुश्किलें तो ब्रह्मा जी के ऐसे ही वरदानों से थी।

यमराज और रावण के इस प्रतिष्ठित और विश्व राजनीति को स्थाई रुप से प्रभावित करने वाले युद्ध को ही ले लें। कालदंड नामक अति घातक देवास्त्र जो यमराज के पास था, वह तो स्वयं ब्रह्मा जी का शोध किया हुआ था। कालदंड को इस प्रकार प्रतिष्ठित किया गया था कि उसके प्रहार से युद्ध क्षेत्र में कोई भी जीवित नहीं रह सकता था। दूसरी ओर प्रबल आक्रमणकारी रावण ,ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त था। स्थिति विकट थी। मृत्यु के अंकों का कीर्तिमान बन चुका था। इस भीषण युद्ध से ब्रह्मा जी ही सबसे ज्यादा परेशान थे।इधर गिरो तो कुआ। उधर गिरो तो खाई, वाली स्थिति। कालदंड का उपयोग किया जाता है तो रावण की मृत्यु सुनिश्चित। यदि रावण मर जाये तो ब्रह्मा द्वारा उसको, दिये गये वरदान का क्या....?

'यदि ह्यसमिन निपतिते न म्रियेतैष राक्षस।
म्रियते वा दशग्रीवस्तदाप्युभयतोऽनृतम।।'

अर्थात् ब्रह्मा जी ने सोचा -कालदंड के प्रहार से यदि यह राक्षस रावण न मरा तो अथवा मर गया तो, दोनों ही दशा में मेरी बात झूठी होगी। यम ने कालदंड उठाया...! रावण का क्या हुआ..? इस रोचक घटना पर प्रकाश डालने के पूर्व हम ब्रह्मा जी की ढुलमुल नीति की एक बानगी भी देख लें।ब्रह्मा जी के सचिवालय में जब कोई रोता गाता विनम्र आवेदन लेकर पहुंचता। वे उसको सुनते और नीति पूर्वक न्याय करने की कोशिश करते। परन्तु कई बार तो वे अपनी पुरानी फाइलों में संशोधन भी कर लेते थे।

स्थान- अयोध्या।अवसर -दशरथ द्वारा कराया जा रहा -पुत्रेष्टि यज्ञ। हम यहां यह भी बताते चलें कि पुत्रेष्टि यज्ञ कराने आये महान ऋषि श्रृंगेरी, दशरथ की प्रथम पुत्री शांता के ही पति थे। जन्म के कुछ समय बाद दशरथ ने शांता को अपने ही साढ़ू भाई,अंगदेश (भागलपुर) के राजा लोमपाद को गोद दे दी थी। निःसंतान लोमपाद कौशल्या की सगी बहन वर्षिणी के पति थे।(यह कथा विस्तार पूर्वक मेरी पुस्तक 'पौराणिक महिलायें' में मिलती है।) तो यज्ञ में पधारे सभी महानुभावों में --ब्रह्मा जी का अदृश्य दरबार भी लगा था। उनके आसपास देवता, सिद्ध, गंधर्व और महर्षिगण बैठे हुए थे।

परमपिता का दरबार था। इतना बडा़ मंच। फिर ब्रह्मा जी भी फुरसत में थे। तनाव रहित। देवताओं ने अपने दुखडे़ सुनाना शुरू कर दिये। सभी की एक ही शिकायत थी रावण। सब कह रहे थे -पितामह आपने रावण को अभय कर अच्छा नहीं किया। देख रहे हैं..! वह देवताओं, सिद्ध, ऋषियों, महर्षियों और गंधर्वों की क्या दुर्दशा कर रहा है। उसने हम सब का जीना मुहाल कर दिया है। ब्रह्मा जी ने देव पक्ष की बात को गंभीरता से लिया। चूंकि यज्ञ में आये थे। पूरी फुरसत थी। कोई राजकीय अथवा उलझन भरा काम तो था नहीं। फिर माहौल भी माफिक था। ब्रह्मा जी बोले - एवमुक्तः सुरैः.... ..... ...... वधोपायो दुरात्मनः।

एक उपाय है -उस दुष्ट रावण के वध का। वह मेरी समझ में आ गया। ब्रह्मा जी ने जैसे रावण संबंधी फाइल को गौर से पढ़ते हुए रास्ता निकाला। उसने वरदान मांगते समय यह बात कही थी कि मैं गंधर्व, यक्ष, देवता, तथा राक्षसों के हाथ से न मारा जाऊं। मैंने भी तथास्तु कहकर, उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली थी।
फाइल में अपने पुराने नोट में स्वयं ही कमी ढूंढ कर पितामह बोले -मनुष्यों को तो वह तुच्छ ही समझता था। फिर अपनी गर्दन मटकाते हुए...बोले... ऊंऽऽ ऊं....! सो उसने मनुष्यों की अवहेलना कर उनसे अवध्य होने का वरदान तो मांगा ही नहीं था।अच्छा...! तो यह बात है। फिर संतुष्ट होते हुए बोले -तो अब मनुष्य के हाथ से ही रावण का वध होगा।हम यहां संबंधित श्लोक लिख सकते थे। किंतु फेसबुक की सीमा देखते हुए ऐसा नहीं किया।

 

लेखक भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार व धर्मविद हैं |


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