ब्रहमवैवर्त पुराण संक्षेप: Brahmavarat Purana Brief

ब्रहमवैवर्त पुराण संक्षेप

-दिनेश मालवीय

इस वैष्णव पुराण में श्रीकृष्ण को श्रृष्टि का कारण माना गया है. “ब्रहमवैवर्त” का अर्थ है- ब्रह्म की प्रकृति. इस पुराण में प्रकृति के विविध परिणामों का प्रतिपादन   किया गया है. विष्णु के अवतार कृष्ण का उल्लेख वैसे तो अनेक पुराणों में मिलता है, लेकिन इस पुराण के विषय में कुछ भिन्नता है. इसमें कृष्ण को ही ‘परब्रहम’ माना जाकर उन्हें ही श्रृष्टि का जन्मदाता बताया गया है.

श्रीकृष्ण से ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश और प्रकृति का जन्म बताया गया है. उनके दायें पार्श्व से सत्व, रज और तम तीनों गुण उत्पन्न होते हैं. उसे महत्तत्व, अहंकार और पंच तन्मात्रा की उत्पत्ति हुयी. फिर नारायण का जन्म हुआ, जिनका रंग श्याम है. वह पीताम्बर पहनते हैं और वनमाला धारण करते हैं. उनकी चार भुजाएं हैं. पंचमुखी शिव का जन्म कृष्ण के बाएं पार्श्व से हुआ है. नाभि से ब्रह्मा, वक्षस्थल से धर्म, वाम पार्श्व से लक्ष्मी, मुख से सरस्वती और विभिन्न अंगों से दुर्गा, सावित्री, कामदेव, रति, अग्नि, वरुण, वायु आदि देवी-देवताओं की उत्पत्ति हुयी है.

श्रृष्टि के निर्माण के बाद रास मण्डल में उनके अर्ध वाम अंग से राधा का जन्म हुआ, रोमकूपों से ग्वाल-बालों और गोपियों का जन्म हुआ. गायें, हंस, तुरंग और सिंह प्रकट हुए. शिव वाहन के लिए बैल, ब्रह्मा के लिए हंस, धर्म के लिए अश्व और दुर्गा के लिए सिंह प्रदान किये गए.

इस पुराण के अनुसार ब्रह्माण्ड में असंख्य विश्व हैं, हर एक विश्व के अपने-अपने विष्णु, ब्रह्मा और महेश हैं. इन सभी विश्वों से ऊपर गोलोक है, जहाँ श्रीकृष्ण का निवास है.

इस पुराण के चार खण्ड हैं-ब्रह्म खण्ड, प्रकृति खण्ड, गणपति खण्ड और श्रीकृष्ण खण्ड.इसमें कुल 218 अध्याय हैं.

ब्रहम खण्ड में कृष्ण की विविध लीलाओं और श्रृष्टि क्रम का वर्णन है, कृष्ण के शरीर से ही सभी देवी-देवताओं का आविर्भाव माना गया है. इस खण्ड में भगवान सूर्य द्वारा संकलित एक स्वतन्त्र “आयुर्वेद संहिता” का भी उल्लेख मिलता है. आयुर्वेद समस्त रोगों को जड़ से समाप्त करता है. इसी खण्ड में श्रीकृष्ण के अर्धनारीश्वर स्वरूप में राधा को दर्शाया गया है.

प्रकृति खण्ड में विभिन्न देवियों के आविर्भाव और उनकी शक्तियों तथा चरित्रों का सुंदर विवरण मिलता है. इस खण्ड के प्रारम्भ में “पंचदेवीरूपा प्रकृति”का वर्णन है. ये हैं-यशदुर्गा, महालक्ष्मी, सरस्वती, गायत्री और सावित्री. इनके अलावा, सबसे ऊपर रासेश्वरी राधा हैं. इस खण्ड में राधा-कृष्ण चरित्र और राधा की पूजा-अर्चना का उल्लेख है.

गणपति खण्ड में गणेशजी के जन्म की कथा और पुण्यक व्रत की महिमा का वर्णन मिलता है. गणेशजी की लीलाओं का वर्णन भी इसी खण्ड में है. इसमें गणेशजी के आठ विघ्ननाशक नाम दिए गये हैं- विघ्नेश, गणेश, हेरम्ब, गजानन, लम्बोदर, एकदंत, शूपकर्ण और विनायक. इसी खण्ड में ‘सूर्य कवच” और “सूर्य स्तोत्र” का भी वर्णन है. इसमें बताया गया है कि गणेशजी की पूजा में तुलसी दल कभी अर्पित नहीं करना चाहिए. परशुराम और राजा सुचंद्र के वध का प्रसंग भी इसी खण्ड में है, जिसमें “दशाक्षरी विद्या”, “काली कवच” और दुर्गा कवच” का वर्णन है..

श्रीकृष्ण जन्म खण्ड सबसे बड़ा अध्याय है, जिसमें उनकी लीलाओं का विस्तार से वर्णन किया गया है. इसमें योगनिद्रा द्वारा वर्णित “श्रीकृष्ण कवच” का उल्लेख है, जिसके पाठ से दैहिक, दैविक और भौतिक भयों का समूल नाश होता है.  इसमें श्रीकृष्ण के 33, बलराम के 9 और राधा के 16 नामों का वर्णन है. इसमें उन सौ वस्तुओं,अनुष्ठानों और द्रव्यों के नाम दिए गये हैं, जिनके दर्शन मात्र से सौभाग्य की प्राप्ति होती है. इसी खण्ड में तिथि विशेष में विभिन्न तीर्थों में स्नान और पुण्य लाभ पाने का उल्लेख किया गया है. “कार्तिक पूर्णिमा” में राधा की पूजा को विशेष फलदायी बताया गया है.

इस खण्ड माना कहा गया है कि “अन्नदान” से बढ़कर कोई दूसरा दान नहीं है. भगवान के राम, नारायण, अनंत, मुकुंद, मधुसूदन, कृष्ण, केशव, कंसारि, हरे, वैकुण्ठ और वामन, इन ग्यारह नामों को बहुत पुण्यदायक माना गया है.  इस में रासलीला का वर्णन भागवत से काफी अलग है.

इस पुराण में श्रीकृष्ण को श्रृष्टि का मूल भले ही बताया गया हो, लेकिन ब्रह्म निरूपण के दार्शनिक विवेचन में वेदांत-सिद्धांत को ही स्वीकारा गया है. इस पुराण में पूतना, कुब्जा, जाम्बवती और कृष्ण की मृत्यु के प्रसंग दूसरे पुराणों से अलग हैं. इस पुराण में पर्वत, नदी, वृक्ष, ग्राम, नगर आदि की उत्पत्ति, मनु-शतरूपा की कथा, ब्रह्मा की पीठ से हरिद्रा का जन्म, मालावती और कालपुरुष संवाद, दिनचर्या, श्रीकृष्ण, शिव और ब्रह्माण्ड कवचों का वर्णन, गंगा वर्णन और शिव स्तोत्र आदि का उल्लेख भी विशेष रूप से शामिल है.


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