ब्राह्मण नहीं होता शोभा की सुपारी, सामाजिक गुरुत्वाकर्षण है ब्राह्मण.. सरयूसुत मिश्रा

ब्राह्मण नहीं होता शोभा की सुपारी, सामाजिक गुरुत्वाकर्षण है ब्राह्मण.. सरयूसुत मिश्रा
उत्तर प्रदेश, राजनीतिक रूप से देश का सबसे जागरूक प्रदेश. जातियों की राजनीति का सिरमौर प्रदेश. देश को सर्वाधिक प्रधानमंत्री देने वाला प्रदेश. आजादी के 75 साल में 58 साल से अधिक समय तक भारत के प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश के निर्वाचित जनप्रतिनिधि रहे. यूपी ने देश को 9 प्रधानमंत्री दिए. वर्तमान प्रधानमंत्री भी उत्तर प्रदेश से ही निर्वाचित हैं. राजनीति इस प्रदेश में रची बसी है. यूपी की हवा और राजनीति राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली को भी प्रभावित करती है. नोएडा गाजियाबाद नक्शे पर उत्तर प्रदेश के हिस्से हैं लेकिन दोनों शहर दिल्ली का ही रिहायशी इलाके हैं. यूपी और केंद्र में जब-जब अलग-अलग दलों की सरकार रही तब-तब यूपी को तमाम सुविधाओं और संसाधनों के लिए छटपटाना पड़ा है. आज उत्तर प्रदेश और केंद्र में भाजपा की सरकारें हैं. जुलाई 2018 में विधानसभा चुनाव में यूपी के मतदाताओं ने भाजपा को छप्पर फाड़ कर विधानसभा की सीटें दी. वर्ष 2007 से 12 तक यूपी में सरकार चलाने वाली बसपा विधानसभा की एक भी सीट नहीं जीत सकी थी. अगले साल उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं. जुलाई 2022 से पहले यूपी में नई विधानसभा का गठन हो जाएगा. चुनाव में लगभग 9 महीने का समय बचा है. यूपी विधानसभा चुनाव की तैयारियां सभी दलों ने शुरू कर दी हैं. सभी दलों ने चुनाव प्रभारियों की तैनाती कर दी है.



 
जाति, धर्म  और क्षेत्र के जिताऊ समीकरण बनाने की कोशिशों में सभी लग गए हैं. उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण को छोड़कर लगभग सभी दलों के नेता अपने समाज के नेतृत्व का दावा करते हैं. समाजवादी पार्टी यादवों का नेतृत्व करती है, तो दलितों की नेता मायावती हैं. निषाद, मौर्य, कुर्मी, पटेल ऐसी जितनी भी प्रमुख जातियां हैं, उनके नेता अपने समाज के बल पर सत्ता में अथवा राजनीतिक दल में हिस्सेदारी कर रहे हैं. केवल ब्राह्मण एक ऐसी जाति है, जिसका कोई भी नेता पूरे समाज के नेतृत्व का दावा नहीं कर सकता. विवेकशील ब्राह्मण समाज देश-काल की परिस्थितियों के आकलन के आधार पर अपनी राजनीतिक दिशा तय करता है. समाज के स्तर पर नहीं, व्यक्तिगत स्तर पर अपनी सोच के आधार पर ब्राह्मण अपने मताधिकार का उपयोग करता है. आजादी के बाद राज्यों के पुनर्गठन के बाद नवगठित उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत बनाए गए थे. उत्तर प्रदेश में 23 साल तक ब्राह्मण मुख्यमंत्री रहे हैं. इनमें कमलापति त्रिपाठी, नारायण दत्त तिवारी, हेमवती नंदन बहुगुणा, श्रीपत मिश्रा प्रमुख थे. यह वह दौर था जब उत्तर प्रदेश की राजनीति का नेतृत्व ब्राह्मण समाज के नेता करते रहे. वर्ष 1990 के बाद ओबीसी और दलित राजनीति के उभार के बाद किसी ब्राह्मण नेता को मुख्यमंत्री बनने का मौका नहीं मिला.

पार्टी पोस्टर UP


विधानसभा के आने वाले चुनाव और सरकार के  गठन में  ब्राह्मण निर्णायक भूमिका में होंगे. मायावती 2007 में जब सत्ता में आई थीं तो उन्हें ब्राह्मणों का भरपूर समर्थन मिला था. इसके बाद अखिलेश यादव की पार्टी को भी ब्राह्मणों ने साथ दिया था. भाजपा के प्रति ब्राह्मणों का स्वाभाविक रुझान रहा है. भाजपा की हिंदुत्व की राजनीति और राम मंदिर का अभियान भाजपा को स्वाभाविक रूप से ब्राह्मणों की वृत्ति बुद्धि और स्वभाव से जोड़ती है. यूपी चुनाव में सभी प्रमुख दल- कांग्रेस, भाजपा, सपा, और बसपा ब्राह्मणों को लुभाने में लगे हुए हैं. सभी दल प्रबुद्ध सम्मेलन के नाम पर आयोजन कर रहे हैं. इन कार्यक्रमों का नाम ब्राह्मण सम्मेलन इसलिए नहीं रखा जा रहा है, क्योंकि उत्तर प्रदेश में जाति सम्मेलन पर रोक है. बसपा ने अपने ब्राह्मण चेहरे सतीश चंद्र मिश्रा की अगुवाई में अयोध्या से प्रबुद्ध सम्मेलन शुरू किया. सपा और भाजपा भी ब्राह्मणों को लुभाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं. कांग्रेस यूपी में अब बहुत ज्यादा प्रासंगिक नहीं रह गई है. रायबरेली और अमेठी भी कांग्रेस के हाथ से निकल रहे हैं. विधानसभा चुनाव में ब्राह्मण इतने महत्वपूर्ण क्यों हो गए हैं, यह समझना जरूरी है. यूपी में जाति के आधार पर ही दल बने हुए हैं. हर दल का वोट बैंक कोई न कोई जाति है. दलित बसपा का वोट बैंक है ,तो यादव एकमुश्त सपा के साथ माने जाते हैं. मुस्लिम सपा, बसपा और कांग्रेस के बीच विभाजित होते हैं. बंगाल के चुनाव में ममता बनर्जी ने मुस्लिमों का वोट बंटने नहीं दिया. मुस्लिम वोट एकमुश्त तृणमूल को मिले, इसलिए इतने बहुमत से उनकी सरकार दोबारा बनी. यूपी में भी मुस्लिम समाज एकमुश्त वोट करें, ऐसा प्रयास सपा और बसपा का होगा. यह केवल संभावना है. वैसे यूपी में मुस्लिमों का एकमुश्त वोट पढ़ना संभव नहीं लगता. सपा या बसपा अपनी जाति के आधार पर  सत्ता पर काबिज नहीं हो सकती.




यूपी में ब्राह्मण 12 से 18% तक विभिन्न जिलों में हैं. ब्राह्मण विधानसभा चुनाव में जिस दल के साथ जाएंगे, उसी दल की सरकार बनने की संभावना होगी. इसीलिए ब्राह्मण इस समय यूपी की राजनीति में किंग मेकर की भूमिका में आ गए हैं. बाकी जातियां तो मतों की दृष्टि से पहले से ही विभिन्न दलों के बीच विभाजित एवं फिक्स हैं. केवल ब्राह्मण हैं, जिन्हें कोई दल अपने साथ सुनिश्चित नहीं मान रहा है. यही जाति चुनाव के समय लुभाने के लिए बची है. बाकी जातियों को तो राजनीतिक दल 5 साल ही निभाते रहते हैं. पिछले चुनाव में ब्राह्मणों ने एकमुश्त भाजपा का साथ दिया था, लेकिन सरकार बनने के बाद ब्राह्मणों को ज्यादा तवज्जो नहीं मिली. अटल बिहारी वाजपेई के बाद भाजपा में कोई सर्वमान्य ब्राह्मण नेता नहीं है. लखनऊ से दिनेश शर्मा उपमुख्यमंत्री हैं, लेकिन उन्हें ब्राह्मणों का नेता नहीं माना जाता. भाजपा ने जितिन प्रसाद को को भाजपा में लाकर संदेश दिया है. ब्राह्मणों में भाजपा की सरकार के प्रति खिन्नता है.

 

 
प्रशासन में ठाकुरवाद के भी आरोप लगते रहे हैं. योगी आदित्यनाथ वस्त्र और आचरण के हिसाब से तो ब्राह्मण को सूट करते हैं. ब्राह्मण सरकार पर नजर रखता है. यूपी में भाजपा सरकार से रुष्टता के बावजूद राम मंदिर का निर्माण ब्राह्मणों को भाजपा से जोड़े रखने के लिए फेवीकोल से मजबूत सिद्ध हो रहा है. ब्राह्मणों में सामाजिक गुरुत्वाकर्षण होता है. आरक्षण और तमाम सरकारी सुविधाओं में पिछड़ने के बाद भी गांव की इकाई के स्तर पर विभिन्न जातियों को जोड़े रखने में ब्राह्मणों की भूमिका रही है. कोई कितना भी बड़ा आदमी हो, अमीर हो या गरीब, धर्म और पूजा-पाठ सभी के जीवन का हिस्सा है.  समाज के इन कार्यों में ब्राह्मण एक अहम किरदार है. यूपी की भाजपा सरकार का कामकाज तो संतोषजनक बताया जा रहा है. पूरे देश में ही ब्राह्मणों का झुकाव भाजपा की ओर देखा जा रहा है .यूपी के ब्राह्मण सत्ता की चाबी अपने हिसाब से घुमाएंगे. ब्राह्मणों की राजनीतिक जागरूकता कई बार नुकसान पहुंचाती है, क्योंकि ब्राह्मण जहां भी रहता है र अपना स्थान बनाए रखता है .ब्राह्मण शोभा की सुपारी नहीं बन सकता. ब्राह्मणों ने बहुत चतुराई से आरक्षण की व्यवस्था पर रोने पीटने की बजाए व्यवसाय के क्षेत्र में अपने कदम आगे बढ़ाए हैं. छोटे शहरों और कस्बों में छोटी-छोटी दुकानें और धंधे ब्राह्मणों ने पकड़ लिए हैं. इस तरह ब्राह्मण अपने वजूद को ऐतिहासिक संदर्भों के अनुरूप बनाए रखने में सफल होते दिखाई पड़ रहे हैं.

 


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